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एक वकील, जो बन गया बॉलीवुड का बेमिसाल खलनायक!

इकबाल रिजवी | News18India.com
Updated: April 22, 2016, 11:07 AM IST
एक वकील, जो बन गया बॉलीवुड का बेमिसाल खलनायक!
कुदरत ने उन्हें गरजदार आवाज दी थी, भाव भंगिमाओं को खास आकार देने की शैली उन्होंने खुद विकसित की और इन दो चीजों के मेल ने भारतीय फ़िल्म जगत को बेमिसाल खलनायक दिया।

कुदरत ने उन्हें गरजदार आवाज दी थी, भाव भंगिमाओं को खास आकार देने की शैली उन्होंने खुद विकसित की और इन दो चीजों के मेल ने भारतीय फ़िल्म जगत को बेमिसाल खलनायक दिया।

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नई दिल्ली। कुदरत ने उन्हें गरजदार आवाज दी थी, भाव भंगिमाओं को खास आकार देने की शैली उन्होंने खुद विकसित की और इन दो चीजों के मेल ने भारतीय फ़िल्म जगत को बेमिसाल खलनायक दिया। कृष्ण निरंजन सिंह उर्फ केएन सिंह जब पर्दे पर अपनी आंखों को उतार चढ़ाव देते हुए सधी हुई आवाज में संवाद बोलते थे तो वाकई लगता था कि इस शख़्स से ज्यादा खतरनाक और कोई नहीं हो सकता।

सुअर के बच्चों, कमीने या इसी तरह की गालियां दिए बिना और चीखे चिल्लाए बग़ैर केएन सिंह भय और घृणा की भावना दर्शकों के मन में पैदा कर देने का हुनर रखते थे। न कभी अभिनय का शौक़ रहा न फ़िल्मों में काम करने की तमन्ना लेकिन बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले ना भीख की कहावत ने एन सिंह के जीवन में महत्वपूर्ण रोल अदा किया।

देहरादून के विख्यात वकील चंडी प्रसाद सिंह के घर एक सितंबर 1909 को जन्मे के एन की पढ़ाई देहरादून और लखनऊ में हुई। लामाटीनियर लखनऊ से सीनियर कैम्ब्रिज करने के बाद वे बैरिस्टर की पढ़ाई के लिये इंग्लैंड जाना चाहते थे, लेकिन गए नहीं क्योंकि वकील बाप की औलाद होकर भी वकीलों की झूठ को सच साबित करने की कोशिशें उन्हें नाजायज़ लगने लगी।

लखनऊ में ही उनकी दोस्ती अपने एक हमउम्र कुंदन लाल सहगल से हुई। आगे चल कर इस दोस्ती ने रिशतों के कई पड़ाव तय किये। पढ़ाई खत्म कर केएन देहरादून आ गए उनके पिता चाहते थे कि केएन जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़े हों। उन्होंने कई काम किए कभी लाहौर जा कर प्रिंटिग प्रेस स्थापित की कभी राजों रजवाड़ों को पालने के लिये जंगली जानवर स्पलाई किये तो कभी चाय बागान में काम करने वालों के लिये ख़ास तरह के जूते बनवाए, तो कभी फ़ौज में खुखरी की सप्लाई की हर धंधा शुरू में चला लेकिन केएन सिंह का स्वभाव व्यवसायिकता के लिए बना ही नहीं था।

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पिता परेशान थे और केएन का खुद का आत्मविश्वास भी लगातार असफ़लताओं से डिगने लगे था। उन्हें लग रहा था कि इससे बेहतर तो लंदन जाकर बैरिस्टर की पढ़ाई ही कर ली होती। पिता को लगने लगा कि बेटे को जीवन की कठोरताओं से मुक़ाबला करवाने के लिये उस पर ज़िम्मेदारी लादनी ही होगी। 1930 में मेरठ के फ़ौलादा गांव की आनंद देवी से केएन का विवाह करवा दिया गया।

विवाह के कुछ दिनों बाद केएनसिंह ने ज़ाफ़रान की सप्लाई का काम शुरू किया। धंधा फूलने फलने लगा तो केएन का आत्मविश्वास भी लौटा और घरवालों का उन पर भरोसा भी बढ़ा इसी दौरान केएन की पत्नी बीमार पड़ गयीं।
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उस दौर में जब इंजेक्शन की पहुंच आम आदमी तक नहीं हुई थी और ऑपरेशन को मौत का दूसरा नाम समझा जाता था इलाज की व्यापक सुविधाएं नहीं थीं। जब तक पत्नी की बीमारी की सही वजह पता चलता उनका निधन हो गया। उधर बीमारी की वजह से उलझे केएन सिंह अपने धंधे पर भी ध्यान नहीं दे पाए और उनके व्यवसाय पर उनके भागीदारों ने कब्ज़ा जमा लिया।

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इस हादसे के कुछ दिनों बाद केएन की मुलाक़ात एक अंग्रेज़ लड़की से हुई जिसके साथ मिल कर उन्होंने रूढ़की में एक स्कूल खोला, लेकिन साल भर में ही स्कूल ठप हो गया। इससे पहले उन्होंने होटलों में बासमती चावल की सप्लाई की धंधा भी किया, लेकिन जल्द ही वो ख़त्म हो गया।

केएनसिंह की एक बहन की शादी कोलकाता में हुई थी। उनकी अचानक तबियत ख़राब हो गयी। उनकी देखभाल के लिए किसी को जाना था। केएनसिंह खाली थे उन्हें ही यह ज़िम्मेदारी सौंपी गयी। उनके कोलकाता जाने की बात सुनकर देहरादून में उनके एक दोस्त नित्यानंन्द खन्ना ने उन्हें पृथ्वी राजकपूर के नाम एक पत्र दिया। पृथ्वी राज उन दिनों कोलकाता में रह कर फिल्मों में व्यस्त थे और नित्यानंद उनके फुफेरे भाई थे। कोलकाता सफर के दौरान केएनसिंह को याद आया कि उनका लड़कपन का दोस्त कुंदन लाल तो फिल्मों में स्टार हो गया है शायद मिलने पर वह पहचान ले।

सहगल भी उन दिनों कोलकाता में ही थे क्योंकि उस समय कोलकाता फिल्म निर्माण का सबसे प्रमुख केंद्र था।  कोलकाता में केएन दिन भर तो बहन के पास अस्पताल में रहते और शाम को कुछ समय किसी पब या बार में बिताते थे। एक दिन एक बार में उनकी एक शख़्स से मुलाकात हुई। उनकी नाम था इजरा मीर। वो उन दिनो इंद्रपुरी स्टूडियों के डायरेक्टर थे।

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मीर ने केएन सिंह को स्टूडियो में आने निमंत्रण दिया। वहां केएन की मुलाकात उस समय की कई फ़िल्म हस्तियों से हुई। एक दिन केएन सिंह कुंदन लाल को ढूंढते हुए एक स्टूडियो पहुंचे। वो कुंदन लाल से मिलने में झिझक रहे थे, लेकिन कुंदन लाल ने उन्हें देखते ही दौड़ कर गले लगा लिया। इसके बाद केएनसिंह की पृथ्वी राज कपूर से मुलाकात हुई। उन्होंने केएन को फ़िल्मी दुनिया में रोज़गार ढूंढने का सुझाव दिया।

पृथ्वी राज के सुझाव पर केएन निर्देशक देवकी बोस के असिस्टेंट बन गए। उन्हें फ़िल्मी दुनिया और वहां का काम बहुत दिलचस्प लगा। देवकी बोस उस समय एक फ़िल्म बना रहे थे 'सुनहरा संसार' जिसके हीरो थे गुल हमीद। के एन सिंह का हिंदी, उर्दी और अंग्रेजी का शुद्ध उच्चारण देखते हु्ए इस फ़िल्म में उन्हें एक डाक्टर का रोल दिया गया। इसके बदले उन्हें मिले 300 रूपए। यह फ़िल्मों से उनकी पहली कमाई थी। के एन सिंह के काम को देवकी बोस के अलावा पूरी यूनिट के लोगों ने पसंद किया।

अब केएन के सामने ये साफ़ हो गया था कि उन्हें फिल्मी दुनिया में ही अपना भविष्य मज़बूत करना है। केएन सिंह के इस फ़ैसले की मदद उनकी क़िस्मत ने भी की। 'सुनहरा संसार' के बाद देवकी बोस ने 'हवाई डाकू' नाम की फ़िल्म पर काम शुरू किया। इसके हीरो भी गुल हमीद चुने गए। लेकिन शूटिंग के वक्त गुल हमीद बुरी तरह बीमार हो गए। देवकी बोस ने केएन सिंह से गुल हमीद का रोल करवाया। खलनायक थे मज़हर खां। फ़िल्म फ़्लॉप हो गई, लेकिन केएन हीरो बन गए। उनके फ़िल्मों में काम करने को लेकर उनके पिता ख़ुश नहीं हुए उस समय शरीफ घरों के लोगों का फिल्मों में काम करना ही क्या फिल्म देखना तक बुरी बात समझा जाता था लेकिन फिर भी उन्हें इस बात का संतोष था कि के एन सिंह कोई काम तो कर रहा है।

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उन्हें इस बात की भी चिंता थी कि कहीं के एन सिंह फ़िल्मों में काम करने वाली किसी महिला से शादी न कर लें। इसलिए घरवालों ने केएन की शादी तय कर दी और उन्हें कोलकाता से बुलवा कर शादी कर दी गई। केएनसिंह का सिक्का फ़िल्मों में चल निकला। शादी से पहले वे देवकी बोस की एक फ़िल्म विद्यापति में नायक बने और शादी के बाद जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो हिट साबित हुई। कई और फ़िल्मों में काम करते करते केएन को फ़िल्म 'मिलाप' में काम करने का मौक़ा मिला।

इस फ़िल्म का निर्देशन ए आर कारदार कर रहे थे। यह कारदार की पहली फ़िल्म थी। 'मिलाप' हिट ही नहीं सुपर हिट हुई। तब तक मुंबई फिल्म निर्माण के बड़े केंद्र के रूप में उभर रही थी। कोलकाता में कई फ़िल्म कंपनियां आर्थिक संकट से जूझ रही थीं। कारादार ने केएन के सामने मुंबई चलने का प्रस्ताव रखा। केएन ने दोस्तों से सलाह की और देहरादून हो कर मुंबई पहुंचे। कारदार को मुंबई जाते ही बाग़बान फ़िल्म के निर्देशन की ज़िम्मेदारी मिल गई, उन्होंने केएन को फ़िल्म में एक रोल ऑफ़र किया, लेकिन ये रोल खलनायक का था।

कारदार का मानना था कि डील डौल के मुताबिक भी केएन सिंह खलनायक के रेल के लिए फ़िट रहेंगे। अब केएन सिंह को फ़ैसला करना था कि वो खलनायक बने या नहीं। उस समय के सबसे चर्चित खलनायक मज़हर खां केएन के दोस्त थे, उन्होंने केएन को राय दी कि उन्हें खलनायक या चरित्र अभिनेता जिसका भी रोल मिले करना चाहिए क्योंकि किसी हीरो की दो फिल्में फ्लॉप होने के बाद उसकी मांग घट जाती है। लेकिन खलनायक या चरित्र अभिनेता पर फिल्म फ्लॉप होने का सीधा असर नहीं पड़ता।

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खुद मज़हर खां भी हीरो थे और अपनी मर्ज़ी से खलनायक के किरदार करने लगे। केएन सिंह ने 'बाग़बान' में खलनायक का रोल किया। फ़िल्म सुपर हिट रही और इसी के साथ फ़िल्मी दुनिया को 6 फुट दो इंच उंचा एक ऐसा खलनायक मिला जिसकी रहस्यमयी मुस्कान उसका अचूक हथियार था जो सिर्फ़ आंखों को खास अंदाज़ में हरकत दे कर सिहरन पैदा कर देता था। केएन के खलनायक रूप से उस समय के प्रसिद्ध खलनायक याकूब इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने खलनायक के रोल लेने बंद कर दिए और वे हास्य अभिनेता बन गए। केएन का खलनायकी का सफ़र शुरू हो चुका था एक के बाद एक फिल्में वो करते गए। उस दौर में पौराणिक फ़िल्में बड़ी संख्या में बनती थीं। अपने डील डौल और सधे हुए अंदाज़ में संवाद आदायगी की वजह से वे प्रोड्यूसर डायरेक्टर के मनपसंद दुर्योधन साबित हुए।

1951 में बनी राजकपूर की फ़िल्म 'आवारा' में केएन ने एक डाकू की भूमिका निभाई फिल्म रिलीज़ होने के बाद केएन के रोल की जमकर प्रशंसा हुई। बरसों तक उनके प्रशंसक उन्हें जग्गा डाकू के नाम से याद करते रहे। मगर यह केएन सिंह का बड़प्पन था कि उन्होंने अपनी इस उपलब्धी का श्रेय अकेले ही नहीं लिया। उन्होंने हमेशा कहा कि ख़्वाजा अहमद अब्बास ने जग्गा डाकू का रोल इतना असरदार लिखा था कि वह यादगार बन गया।

शक्ति सामंत को लगता था कि केएन के बिना उनकी फ़िल्म अधूरी रहेगी इसलियए उन्होंने अपनी फ़िल्मों इंस्पेक्टर, हावड़ा ब्रिज,इवनिंग इन पेरिस में केएन को दोहराया। धीरे-धीरे पर्दे पर प्राण, कन्हैयालाल और जीवन जैसे खलनायक उभरे, लेकिन केएन ने खलनायकी में अपना जो अंदाज़ और स्थान बनाया था वह हमेशा बना रहा। यहां तक की प्रेम चोपड़ा, रंजीत, अजित,अमजद खान,डैनी और अमरीशपुरी जैसे खलनायकों के दौर में भी केएन की मांग बना रही।

लेकिन सत्तर के दशक में केएन महसूस करने लगे थे कि अब पहले वाला ज़माना नहीं रहा। हीरो और हिरोइन का इतना दबदबा बढ़ चुका था कि निर्देशक और प्रोड्यूसर भी उनके सामने हाथ जोड़ कर खड़े रहने लगे। केएन ने जब फ़िल्मों में क़दम रखा था तब सभी लोग किसी कंपनी या स्टूडियो के वेतन भोगी कर्मचारी होते थे वहां निर्देशक का हुक्म अंतिम होता था। फिर आगे के दौर में स्टूडियो परंपरा टूटी और कलाकार फ़्री लांस के तौर पर किसी भी बैनर में काम करने लगे तब भी फ़िल्म में निर्देशक का स्थान सर्वोपरी होता था।

उस समय सेट पर एक परिवार जैसा माहौल होता था। साथी कालाकर एक दूसरे के साथ समय बिताया करते थे, लेकिन स्टार सिस्टम के उदय ये बाद सब कुछ ध्वस्त होने लगे। उसूल और आदर के अर्थ बदलने लगे। केएन ने कभी रोल को पसंद या नापसंद करना नहीं सीखा खलनायकी के साथ साथ उन्होंने यादगार चरित्र अभिनय भी किया। इसलिए उन्हें काम तो मिलता रहा फिर भी उन्हें लगने लगा कि अब उनकी या उनके दौर के लोगों को वह आदर सम्मान नहीं मिल पाएगा जिसके वे हक़दार थे।

अपने साथी कलाकारों पृथ्वी राज, कुंदनलाल सहगल, मजहर खान, जयराज,मोती लाल आदि के साथ परिवार की तरह रहने वाले केएन ने अभिनेता पी जयराज और लेखक निर्देशक पीएल संतोषी की शादी खुद करवायी। कई साथियों के बच्चे जब फ़िल्म निर्माण में उतरे तो केएन ने उन्हें हर तरह का सहयोग दिया, लेकिन फिर केएन को महसूस हुआ कि यह युवा नस्ल अंकल कह कह कर उनसे काम तो करवा लेती थी, लेकिन पैसे देने के नाम पर चुप्पी साध लेते थे। के एन को कई फ़िल्मों में काम करने के एवज़ में कभी कुछ नहीं मिला।

फ़िल्मों में कई पीढ़ियां उनके सामने जवान हुईं। उन्होंने पृथ्वी राज कपूर के साथ काम किया फिर राजकपूर के साथ और 1975 में राजकपूर के बेटे ऋषी कपूर की फ़िल्म 'रफ्फूक्कर' में भी केएनसिंह ने काम किया। सहगल और मोती लाल से लेकर दिलीप, राजकपूर, देवानंद त्रयी सहित गुरूदत्त, सुनील दत्त, मनोज कुमार, धर्मेंद्र और राजेश खन्ना से लेकर अमिताभ बच्चन तक फ़िल्मों के हर दौर के नायकों के मुक़ाबले में केएन सिंह अकेले खड़े नजर आते हैं।

बरसात की रात (1960), वो कौन थी (1964), मेरा साया (1966), मेरे हुज़ूर (1968), दुश्मन , हाथी मेरे साथी (1971) लोफ़र, कच्चे धागे (1973) बढ़ती का नाम दाढ़ी (1974) जैसी भारतीय सिनेमा की यादगार फ़िल्मों का एक लंबी सूची है, जिनमें एक बात सामान्य है और वह है इन फ़िल्मों में केएन सिंह का अभिनय।

धीरे-धीरे केएन का मन इस नई फिल्मी दुनिया से खिन्न होने लगा। अमिताभ बच्चन स्टारर कालिया( 1983) तक पहुंचते पहुंचते केएन का मन अभिनय से उचाट हो गया। तभी उनके साथ एक हादसा यह हुआ कि उनकी आंखों की रोशनी जाती रही। और जीवन के संध्याकाल में केएन कैमरा, लाइट, एक्शन और कट की दुनिया से पूरी तरह कट गए। 1987 में उनकी पत्नी का निधन हो गया।

केएन की कोई संतान नहीं हुई इसलिए उन्होंने अपने भतीजे पुष्कर को बेटे की तरह पाला। पत्नी के निधन के बाद केएन की आवाज़ में तो पहले जैसी ही खनक बरकरार रही, लेकिन अंदर से टूट से गए। 1999 में वे फिसल कर गिर गए जिससे उनके पैर की हड्डी टूट गयी तब से वे 31 जनवरी 2000 में मृत्यु होने तक पलंग पर ही पड़े रहे। उनकी रिलीज़ होने वाली अंतिम फ़िल्म अजूबा (1991 ) थी।

आज की पीढ़ी केएन सिंह को नहीं जानती हैं लेकिन लंबे समय तक फ़िल्मी पर्दे पर उनकी तूती बोलती रही। अनकी उपलब्धियां आने वाली पीढ़ियों के लिए फ़िल्म की रीलों और डीवीडी में सुरक्षित हो चुकी हैं।

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First published: April 22, 2016, 11:06 AM IST
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