जब सब लड़कियां शरमा गईं, श्यामा ने कहा- मैं करूंगी

इकबाल रिजवी | News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 3:25 PM IST
जब सब लड़कियां शरमा गईं, श्यामा ने कहा- मैं करूंगी
श्यामा
इकबाल रिजवी | News18Hindi
Updated: November 15, 2017, 3:25 PM IST
अपने ज़माने की बेहद क़ातिल अदाओं वाली 82 साल की अभिनेत्री श्यामा अब वहां चली गई हैं, जहां से कोई वापस नहीं आता है. बढ़ती उम्र की वजह से श्यामा लंबे समय से लोगों से मिलना-जुलना छोड़ चुकी थीं. जानते हैं कैसा था उनकी जिंदगी का फिल्मी सफर -

खुर्शीद था बचपन का नाम
12 जुलाई 1935 में लाहौर में पैदा हुई श्यामा का असली नाम खुर्शीद था. उनके पिता की फलों की दुकान थी. 1938 में पिता मुम्बई आ गए. ख़ुर्शीद की उम्र करीब 9 साल थी, जब उनके स्कूल के पास फ़िल्म "ज़ीनत" (1945) की शूटिंग हुई. नूरजहां उस फ़िल्म की हिरोइन थीं.

वहां एक कव्वाली का सीन था, जिसमें कुछ एक्स्ट्रा कलाकारों की ज़रूरत थी. फ़िल्म के डायरेक्टर शौकत हुसैन रिज़वी ने देखा कि सेट पर कुछ स्कूली लड़कियां हैं, उन्होंने पूछा इस फ़िल्म में तुम में से कौन काम करेगा. सारी लड़कियां शरमा गईं, लेकिन खुर्शीद ने बड़ी बेबाकी से कहा मैं काम करूंगी.

उन्हें इस काम का मेहनताना मिला चालीस रुपये. घर की आर्थिक दशा ठीक नहीं थी, उनके नौ भाई-बहन थे. बस तभी से ख़ुर्शीद बाल कलाकार के तौर पर फ़िल्मों में एकस्ट्रा और कोरस गर्ल के रूप में काम करने लगीं.

80 फिल्में में बनीं एक्स्ट्रा कलाकार
उन्होंने 'तराना', 'सज़ा', 'पतंगा', 'गृहस्थी', 'शायर', 'शबनम' और 'नाच' सहित करीब 80 फ़िल्मों में एक्स्ट्रा और सहायक कलाकार के रूप में काम किया. तब तक ख़ुर्शीद का नाम श्यामा हो चुका था. डायरेक्टर बीजू भाई ने उन्हें श्यामा नाम दिया था.

आकर्षक व्यक्तित्व की मलिका श्यामा थोड़ी बड़ी हुईं तो आईएस जौहर ने उन्हें अपनी फ़िल्म 'श्रीमतीजी' में बतौर हिरोइन पेश किया. इसमें हीरो थे दिलीप कुमार के भाई नासिर खान. फ़िल्म 'लहरें' (1950) में वह किशोर कुमार की नायिका बनी.

बिमल राय की फ़िल्म 'मां' में काम करने के बाद तो श्यामा स्टार बन गईं. उस साल उन्होंने 19 फ़िल्में साइन कीं. 1952 में उनकी एक और उल्लेखनीय फ़िल्म 'आर पार' रिलीज़ हुई. इसमें वह गुरु दत्त की हिरोइन बनीं.

ऐसे मिला शादी की प्रस्ताव
ये फिल्म श्यामा के करियर में मील का पत्थर मानी जाती है. श्यामा का जादू ऐसा चला कि सत्रह साल की उम्र में फ़िल्म इंटस्ट्री में उनके दीवानों की ख़ासी तादाद हो गई. लेकिन श्यामा खुद तलत महमूद की दीवानी थीं.

एक दिन फिल्म सजा के सेट पर उन्हें पसंद करने वाले कैमरामैन फली मिस्त्री ने उनके सामने प्यार का इस तरह इजहार किया कि श्यामा हक्की-बक्की रह गईं. फली मिस्त्री ने सबके सामने उन्हें किस करने के बाद कहा कि वह उनसे शादी करना चाहते हैं. फिर श्यामा ने फली मिस्त्री से शादी कर ली.

शादी के बाद भी कीं फिल्में
श्यामा की शादी उनके फ़िल्मी कैरियर पर कोई असर नहीं डाल पाई और श्यामा फ़िल्में करती रहीं. अभिनेत्री के रूप में सिक्का जमाने के बावजूद उन्होंने चरित्र अभिनेत्री के रोल भी किए. फ़िल्म 'छोटी भाभी', 'मां बाप', 'भाई भाई' और 'हम लोग' ने उन्हें चरित्र अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया.

"शारदा" में सहायक अभिनेत्री के रूप में उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया. इसके बाद श्यामा ने खलनायिका के रूप में पर्दे पर अवतार लिया. उनकी आंखों से झलकती कुटिलता और मोहक सौंदर्य का फ़िल्मों में भरपूर इस्तेमाल किया गया. दिलीप कुमार अभिनीत "दिल दिया दर्द लिया" और सुनील दत्त की "मिलन" उनकी आखरी उल्लेखनीय फ़िल्में थीं.

इसके बाद 1969 से 1977 के बीच श्यामा ने 'गोमती के किनारे', 'प्रभात', 'नया दिन नयी रात', 'चैताली', "खेल खेल में" और "खेल खिलाड़ी" का सहित 19 फ़िल्में कीं.

'हथियार' के बाद श्यामा ने डाल दिए हथियार
बरसों बाद उनके जे.पी.दत्ता ने अपनी फ़िल्म "हथियार" के लिए श्यामा को चुना. जब फ़िल्म की शूटिंग ख़त्म होने वाली थी, तब दत्ता ने उनसे कहा कि आप रिहर्सल में तो बहुत अच्छी एक्टिंग करती हैं, लेकिन पर्दे पर आपकी एक्टिंग में जान नहीं आती.

ऐसी बात तो श्यामा से किसी ने तब भी नहीं कही थी, जब वह एक्स्ट्रा के रूप में काम करती थीं. श्यामा को अचानक लगा कि फ़िल्मी दुनिया बहुत बदल गई है.

उस शाम श्यामा कभी भी फ़िल्मों में काम न करने की क़सम खाकर बोझिल क़दमों के साथ घर लौट आईं. 1989 में रिलीज़ हुई "हथियार" उनकी आख़िरी फ़िल्म साबित हुई.

ऐसे भरा अकेलापन
पति की मौत के बाद श्यामा अपना अकेलापन अपनी सहेलियों निरूपा राय, सितारा देवी, बेगम पारा, शकीला और नादिरा के साथ महफिलें जमाकर दूर करती रहीं, लेकिन धीरे-धीरे सब सहेलियां भी श्यामा को छोड़ दूसरी दुनिया में चली गईं.

श्यामा के दोनो बेटे अपनी दुनिया में मगन हैं और बेटी मुंबई में ही अपने परिवार में व्यस्त है.

पिछले कुछ सालों में श्यामा से मिलने वाले एक ही बात बताते थे कि तन्हाई को इस शान से जीने वाले कम ही लोग होते हैं जैसी श्यामा हैं.

कई सालों से उनकी हसरत थी कि वे हज पर जाएं, लेकिन उनकी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी. 14 नवंबर को मुंबई में उनका निधन हो गया.
First published: November 15, 2017
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