संगीतकार मदन मोहन की पुण्यतिथि आज, लता मंगेशकर ने ऐसे किया याद

संगीतकार मदन मोहन की पुण्यतिथि आज, लता मंगेशकर ने ऐसे किया याद
लता मंगेशकर

बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार मदन मोहन (Madan Mohan) की आज पुण्यतिथि है. उनको याद करते हुए स्वर कोकिला लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) ने ट्वीट किया है.

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मुंबई. लेजेंड्री गायिका लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. उन्होंने मंगलवार को बॉलीवुड के मशहूर संगीतकार मदन मोहन (Madan Mohan) को याद करते हुए ट्वीट किया है. दरअसल,  'आंधी', 'मदहोश', 'अंजाम' जैसी फिल्मों में संगीत देने वाले मदन मोहन की आज पुण्यतिथि है.

मदन भैया हमेशा याद आते हैं
लता मंगेशकर ने इमोशनल ट्वीट करते हुए लिखा, ''कुछ लोग दुनिया से जल्दी चले जाते हैं लेकिन अपनों के पास हमेशा रहते हैं. इसी तरह मदन भैया उनके बच्चों के साथ और मेरे साथ हमेशा रहते हैं. हमेशा याद आते हैं. आज उनकी पूण्यतिथि पर मैं उनको विनम्र अभिनंदन करती हूं.''





बता दें कि इराक में बगदाद के नजदीक कुर्दिस्तान में मदन मोहन का जन्म 5 जून 1924 को हुआ. पिता राय बहादुर चुन्नीलाल और मां भगवती. रायबहादुर अकाउंटेंट जनरल थे. आसान शब्दों में समझ लें कि वहां की पुलिस का हिस्सा थे. 1932 में मदन मोहन जी का परिवार अपने देश वापस आ गया. अपने शहर चकवाल, जो पंजाब के झेलम जिले में था. दरअसल, इराक को ब्रिटिश राज से आजादी मिली. मदन जी के पिता को विकल्प दिया गया कि वो जॉब छोड़ दें या इराक. उन्होंने इराक छोड़ने का फैसला किया. चकवाल में ही उन्होंने गाना शुरू किया. फिर परिवार लाहौर आ गया. यहां मदन मोहन ने क्लासिकल म्यूजिक सीखा.

कुछ समय बाद मदन मोहन का परिवार मुंबई आ गया. वे मुंबई में मरीन ड्राइव के पास रहने लगा. वहां से जद्दन बाई का घर बहुत करीब था. जद्दन बाई यानी प्रख्यात अदाकारा नरगिस जी की मां. जद्दन बाई बहुत अच्छी गायिका थीं. उनके घर पर महफिल जमा करती थी. मदन जी अपने पिता से छुपकर रात में गाने सुनने चले जाया करते थे. लगभग सुबह हो जाती थी. मदन जी पीछे के दरवाजे से चोरी-छुपे वापस अपने कमरे में चले जाया करते थे. मां-बाप को कभी पता नहीं चला कि उनका बेटा पूरी रात घर में नहीं रहता.

1943 में एक साल की मिलिटरी ट्रेनिंग के बाद उन्होंने आर्मी जॉइन कर ली. वहां दो साल काम किया. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ी. उन्होंने आकाशवाणी लखनऊ में नौकरी की. बात है 1946 की. 1947 में उनका ट्रांसफर दिल्ली हो गया. लेकिन काम लखनऊ से अलग था. यहां पेपरवर्क का काम था, संगीत से जुड़ा नहीं. उन्होंने फिर बंबई आने का फैसला किया. वो भी एक्टर बनने. लेकिन कुछ समय बाद समझ आ गया कि एक्टिंग नहीं, उनकी मंजिल संगीत निर्देशन है.

संगीतकार मदन मोहन को असली पहचान उन्हें 1958 में आई फिल्म अदालत से मिली. जाना था हमसे दूर, यूं हसरतों के दाग, उनको ये शिकायत है कि हम... जैसे अमर गीत और गजल इसमें थे. 1964 का साल मदन मोहन के लिए खास था. इसमें आप की परछाइयां, गजल, हकीकत, जहांआरा, पूजा के फूल, सुहागन और वो कौन थी जैसी फिल्में आईं. वो कौन थी में एक गाना था- नैना बरसे रिमझिम रिमझिम.. इसकी धुन मदन मोहन के दिमाग में 12 साल से थी. सही शब्दों का इंतजार था, जो इस फिल्म में मिले. 1970 में फिल्म आई दस्तक. इसमें उन्हें बेस्ट म्यूजिक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. बैंया ना धरो, माई री मैं कासे कहूं और हम हैं मता-ए कूचा-ओ... जैसे गाने उन्हें अलग स्तर पर ले गए.
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