ऑस्कर विजेता पैरासाइट: एशियाई संकटों और साहित्य की परंपरा की फिल्म

ऑस्कर विजेता पैरासाइट: एशियाई संकटों और साहित्य की परंपरा की फिल्म
फिल्म पैरासाइट.

बॉंग जून हू निर्देशित 2019 की कोरियाई फिल्म पैरासाइट ने ऑस्कर समेत कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोहों में झंडे गाड़ दिये हैं. जानिए इस फिल्म के बारे में...

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 17, 2020, 8:39 AM IST
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नई दिल्ली. होना तो हमें परस्पर आश्रित था (मानें न मानें हैं ही) लेकिन हम परजीवी बन जाते हैं, तो कई तरह की समस्याएं खड़ी होती हैं. दूसरी तरफ, परजीवी बन जाने के कारणों में भी कई तरह की समस्याएं हैं. बॉंग जून हू निर्देशित 2019 की कोरियाई फिल्म पैरासाइट ने ऑस्कर समेत कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोहों में झंडे गाड़ दिये हैं इसलिए बेहद चर्चा में है. इसके इतर यह फिल्म अगर इतने प्रतिष्ठित पुरस्कार न भी जीतती, तो भी यह उन चुनिंदा और कालजयी फिल्मों में शुमार होती, जिनमें समय का एक बड़ा सच कला के जीवंत सांचों में शाहकार बन जाता है.

अगर आपसे कहा जाये कि फिल्म अमीर—ग़रीब के बीच के अर्थात वर्ग संघर्ष पर आधारित है, तो यह ज़्यादा संक्षेप हो जाता है और आप कहानी की आत्मा तक नहीं पहुंचेंगे. कुछ यूं समझें —

"यह फिल्म एक ग़रीब परिवार और एक अमीर परिवार की कहानी है. ग़रीब परिवार के सदस्य पहले रोज़ी रोटी और फिर लालच के चलते अमीर परिवार के यहां नौकरी हासिल करते हैं, बग़ैर ये बताये कि चारों ही एक परिवार हैं. ये जानते हुए भी कि कभी इन अमीरों की दौलत उन्हें हासिल नहीं हो सकती, ये उस दौलत से खरीदे गये साज़ो—सामान के ज़रिये अय्याशी की हसरतें पूरी करते हैं. उधर, अमीर परिवार का जीवन इन गरीबों के बग़ैर चल नहीं सकता, लेकिन इनकी ग़रीबी से एक चिढ़ भी बनी हुई है. बहरहाल, ग़रीब परिवार की जान पर तब बन आती है जब ख़ुलासा होता है कि इस बंगले में एक गुप्त तहख़ाना है, जिससे उनके पूर्ववर्ती नौकरों यानी एक और ग़रीब परिवार की कहानी के राज़ छुपे हैं. फिल्म तनाव से इस क़दर जूझती है कि एक के बाद एक चार क़त्ल होते हैं और पहले ग़रीब परिवार का मुखिया यानी एक क़ातिल हमेशा के लिए अपने परिवार से जुदा और दुनिया के लिए ग़ायब हो जाता है."



इस फिल्म की जो समीक्षाएं पश्चिम में हुई हैं, उनमें इसे 'ट्रैजिकॉमिक' कहा गया है. किसी ने इसे शेक्सपियरियन क्लाइमेक्स ज़्यादा माना है बजाय हिचकॉकियन क्लाइमेक्स के. दूसरी समीक्षाओं में 'लेयर्ड' शब्द का बहुधा प्रयोग है, जो यह साबित करता है फिल्म में कई परतें हैं. उधर, ख़ुद फिल्म निर्देशक जून हू ने कई तरह से अपनी इस चर्चित फिल्म की कहानी और विचार को लेकर चर्चाएं करते हुए इस फिल्म को 'स्टेयरवे मूवी' यानी 'सीढ़ियों के ज़रिये' कहानी कहती फिल्म माना है. कोरिया के पहाड़ीनुमा शहर के वातावरण में ग़रीब परिवार की रिहाइश जहां सड़क के नीचे एक बेसमेंट में है, वहीं अमीर परिवार पहाड़ीनुमा शहर की ऊंचाई पर बसे इलाके में स्थित बंगले में रहता है. पुलों, सड़कों के बीच कई सीढ़ियां हैं. बेसमेंट और सड़क के बीच कई सीढ़ियां हैं. और उस बंगले से तहख़ाने में उतरती कई सीढ़ियां हैं. ये वर्गों और वर्ग संघर्ष का रूपक फिल्म में कलात्मक तरीक़े से गढ़ती हैं. लेकिन ऐसा क्यों है? क्या सिर्फ़ ऐसा ही है? पश्चिमी फिल्म रिव्यू और फिल्म निर्देशक हू के इस रूपक के अलावा हम इस फिल्म पर कोई बात नहीं कर सकते? बेशक़ कर सकते हैं अगर हम अपनी ज़ाती समझ का इस्तेमाल करें.



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पैरासाइट का एक दृश्य


एशिया की समस्याएं और संघर्ष
अमेरिका, यूरोप यानी पश्चिम पुरस्कार, यश, धन और बड़े अवसर देते हैं इसलिए उनका कहा सुनने की रिवायत रही है. होता भी है कि किसी आंचलिक फिल्म का फिल्मकार अपनी फिल्म की किसी सत्ह की तुलना पश्चिमी समाज या परिस्थितियों की किसी सत्ह के साथ कर यह जताता है कि उसने कामयाब मेटाफर रचा है. लेकिन, बात निज संसार की समझ की है. एशिया के गिने—चुने मुल्क़ों को अगर छोड़ दिया जाये, तो ज़्यादातर या तो प्रगतिशील हैं या फिर तथाकथित 'थर्ड वर्ल्ड'. फिर इस 'थर्ड वर्ल्ड' में थर्ड क्लास की कितनी परतें हैं, इसका अंदाज़ा तक पश्चिम के बस की बात नहीं.

एशिया के कई देशों की मूलभूत समस्या यह रही है कि वे लंबे समय तक ग़ुलामी के शिकार रहे हैं. औपनिवेशिक साम्राज्यों की लूट के शिकार होने के बाद इन अधिकतर देशों की दूसरी समस्या यह रही है कि आर्थिक विकास की दौड़ में इनकी रफ़्तार और इनकी सफलता को उन पैमानों पर आंका जाता है, जो इनके हैं ही नहीं, न इनके हिसाब से उचित लगते हैं. कहीं लोकतंत्र की बहाली के लिए जंग जारी है, कहीं मानवाधिकारों के लिए तो कहीं अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए. सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक जैसे तमाम मोर्चे अधिकतर एशियाई देशों में समस्याओं के भी पर्याय हैं.

दक्षिण कोरिया की बात करें तो दूसरे विश्व युद्ध के अंत में जापान ने जब समर्पण किया, उसके बाद कोरिया की स्वाधीनता की राह बनी. इसके बाद अपने आंतरिक संघर्षों से कोरिया जूझा और दोफाड़ हुआ. उत्तर और दक्षिण कोरिया के बीच तनाव के साथ ही, विश्व स्तर पर अपने विकास के लिए एक संघर्ष करते दक्षिण कोरिया में लोकतंत्र के लिए लंबी बहस छिड़ी तो 'कड़ी सेंसरशिप' के कारण अभिव्यक्ति की आज़ादी के लिए भी कलाकारों ने संघर्ष किया. दक्षिण कोरियाई सिनेमा का ये करीब 70 साला सफर देखा जाये तो इनके मूल स्वरों में कोरिया में जापानियों का दौर, कोरियाई युद्ध और आंतरिक संघर्ष के मुद्दे साफ उभरते दिखायी देते रहे हैं. बेसिरपैर की सेंसरशिप ख़त्म होने के बाद 90 के दशक के बाद दक्षिण कोरियाई सिनेमा में एक पुनर्जागरण काल देखा जाता है.

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पैरासाइट का सीन


जून हू निर्देशित ताज़ा फिल्म पैरासाइट कोरियाई सिनेमा के इसी दौर की एक श्रेष्ठ कलात्मक कृति है. अपनी कहानी, पटकथा, संवाद, संगीत और छायांकन के माध्यम से यह फिल्म अनेक प्रकार के आंतरिक संघर्षों और वैश्विक चिंताओं को ज़ाहिर करती है.

अमीरी—ग़रीबी की खाई का नैरेटिव
इस मुद्दे पर फिल्म बनाना, कहानी लिखना या नाटक खेलना अपने आप में चुनौतीपूर्ण भी है और जोखिम भरा भी. अस्ल में, हम आम जनजीवन में जो दृश्य हर जगह पसरे हुए देखते हैं, उन्हें संपूर्ण सार्थकता, चौंकाते संदर्भों, आकर्षक कल्पनाशीलता और अनेक स्तरों का समायोजन कर एक जस्टिफाइड संदेश के साथ किसी कलाकृति में उतारना बेहद मुश्किल काम है. यह काम बेहद संजीदगी से पैरासाइट कर दिखाती है.

एक—एक पाई के लिए रोज़ाना संघर्ष करते एक युवक को एक संपन्न परिवार के आलीशान बंगले में जाकर एक टीनेजर लड़की का पढ़ाने का मौका मिलता है. वह उस संपन्नता की चकाचौंध के मोहपाश में बंधता है और एक—एक कर उस युवक की बहन और मां—बाप उस परिवार में विभिन्न नौकरों के तौर पर आ जाते हैं. संपन्न परिवार को यह भनक तक नहीं कि ये चारों एक ही परिवार के सदस्य हैं. इतनी कहानी से आप लालच का मनोविज्ञान तो साफ़ समझ सकते हैं, लेकिन एक बारीक़ नज़र रखें तो दक्षिण कोरिया ही नहीं बल्कि एशिया के कई देशों की एक साझा समस्या को भी भांप सकेंगे.

बेरोज़गारी की समस्या बेहद भयावह और रोज़गार के वातावरण, भुगतान और परिस्थितियों को लेकर भी कई तरह के संकट हैं. दक्षिण कोरिया के युवाओं या मिलेनियल्स के बीच ऐसी समस्याओं को लेकर एक शब्द बेहद प्रचलित है, 'हेल चोज़ुन' या 'हेल कोरिया'. रोज़गार संबंधी समस्याओं को लेकर एक पूरा जहन्नुम है. ऐसे जहन्नुम में अगर एक मामूली से झूठ से कुछ वक़्त की राहत मिलती है, तो इसे समाज का नैतिक पतन कहना कहां तक उचित है? यह अक्षम राजनीति से उपजी सामाजिक स्थिति की विकृति क्यों न मानी जाये?

इस फिल्म में सामाजिक—आर्थिक मोर्चे पर जो दूसरा संकट उभारा गया है, वह भी एशिया के कई देशों का हाले—हालिया है. अमीरी और ग़रीबी के बीच बेहद चौड़ी खाई. ग़रीबी इतनी कि एक परिवार सड़क के नीचे उस बेसमेंट में रह रहा है, जिसके रोशनदान में शराबी पेशाब कर रहे हैं और बारिश होती है तो वह बेसमेंट इस तरह भर जाता है कि फिर इस परिवार को अपना आशियाना नये सिरे से बसाने की जद्दोजहद करनी पड़े. उधर, अमीरी इतनी कि एक परिवार को अपने ही भीमकाय बंगले के गुप्त ठिकानों का पता नहीं और उन्हें अपने ग़रीब नौकरों की मौजूदगी में एक बदबू परेशान करती है.

यह तो पटकथा की बात है, फिल्म के तक़रीबन हर फ्रेम में फिल्मकार ने सामाजिक आर्थिक संकट के नैरेटिव को ख़ासी तवज्जो दी है, ग़ालिबन फिल्म इसी स्तंभ पर टिकी है. अलबत्ता, फिल्म दूसरे कुछ और ज़रूरी पहलुओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती.

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पैरासाइट.


सीढ़ियां ऊपर से ज़्यादा नीचे की तरफ़!
दक्षिण कोरिया हो या एशिया के और कथित प्रगतिशील/पिछड़े मुल्क़, हर दीये तले अंधेरा कुछ ज़्यादा ही है. निर्माण के नाम पर वर्टिकल तरक़्क़ी के अंधेपन में हम यह देख भी नहीं पा रहे कि ज़मीन से आसमान की तरफ़ हम कम जा रहे हैं, ज़मीन से पाताल की तरफ़ ज़्यादा गिर रहे हैं. पैरासाइट अपनी परतों में विकास के दो भयानक नतीजों 'प्रॉपर्टी बाज़ार का कपट' और 'लोन शार्क्स की क्रूरता' के डरावने दृश्य देती है.

जो परिवार बंगले में झूठ से घुस आया है, उससे पहले घर में एक हाउसकीपर सालों से थी. उस औरत ने अपने पति को खूंखार साहूकारों से बचाने के लिए बंगले के गुप्त तहख़ाने में सालों से छुपा रखा. संपन्न परिवार जब छुट्टियों पर गया है, तब नौकर परिवार के सामने यह औरत आती है और कहती है कि उसे इतनी जल्दबाज़ी में नौकरी से निकाला गया कि वह अपनी एक ज़रूरी चीज़ लेना ही भूल गयी. जब यह औरत इस बंगले में दाख़िल होकर तहख़ाने में अपने पति से मिलती है, तब उसका राज़फ़ाश होता है और नाटकीय ढंग से उस औरत के सामने भी यह राज़फ़ाश होता है कि चारों नौकर एक ही परिवार हैं, जो झूठ बोलकर इस घर में अय्याशी कर रहे हैं.

इसके अलावा बाद में इसी बंगले में चार क़त्ल होते हैं. मनहूस घोषित हो जाने के बाद भी इस घर को अनजान विदेशियों को बेच दिया जाना दर्शाया गया है. इन तमाम प्रसंगों को लेकर फिल्मकार एक मतलबी दुनिया का चित्र रचता है. ऐसी दुनिया, जहां हर कोई दूसरों का खून चूसकर अपनी तरक़्क़ी का हामी है. झूठ, लालच, हवस, नफ़रत और मौक़ापरस्ती जैसे हथियार हैं, जो वैश्वीकरण के बाज़ार में विकास का सिक्का चला रहे हैं. पैरासाइट का फिल्मकार इस पूरी व्यवस्था के लिए भी सीढ़ियों का अनूठा रूपक बांध गया है, क्योंकि ज़्यादातर दृश्यों में सीढ़ियां उतर रही हैं, चढ़ती हुई बहुत कम हैं.

क्लाइमेक्स दर्शन है या एक और समस्या?
जून हू निर्देशित पैरासाइट का अंत चर्चा का विषय बन गया है. किसी के लिए अबूझ, किसी के लिए दार्शनिक तो किसी के लिए एक और समस्या का इशारा. इसे थोड़ा समझना ज़रूरी है.

हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तहख़ाने में बंद कर दिया गया आदमी छूटता है और उस नौकर परिवार की हत्या पर उतारू हो जाता है. पहले लड़के को मारता है और फिर लड़की पर जानलेवा हमला करता है. फिर वह परिवार उस आदमी को मारता है और मरने, मारने और बचाने के शोरगुल के बीच अमीर परिवार का मुखिया जब नाक बंद कर ग़रीबी की उसी बदबू का आभास कराता है तो नौकर परिवार का मुखिया उसे भी मार डालता है. लेकिन ऐसा हुआ क्यों?

ये ख़ून ख़राबा फिल्मकार की मनावैज्ञानिक पकड़ दर्शाता है. ग़रीबी, दुत्कार, धिक्कार, गालियां और दुख ही दुख जब जीवन भर सहा जाता है तो एक दबाव के बाद वह हिंसा में ही व्यक्त होता है... फिर वह बदले के रूप में हो, अपराध के रूप में या घिनौने कृत्यों के रूप में. क़त्ले—आम के इन दृश्यों पर किसी तरह फिल्म ख़त्म हो सकती थी. लेकिन यह एकस्तरीय या लीनियर अंत कहलाता और फिल्म साफ तौर पर ट्रैजडी कहलाती.

ऐसा न करते हुए फिल्मकार इसके बाद कुछ दृश्य जोड़ता है. नौकर परिवार का मुखिया ग़ायब है. बेटी मर चुकी है. जानलेवा हमले के बेटा ब्रेन इंजरी का इलाज करवाने के बाद ठीक होता है और इसी बीच इस बेटे और मां पर जालसाज़ी का मुक़द्दमा भी चलता है. ठीक होने के बाद बेटा अपने पिता की तलाश करता है, जिसका किसी को कुछ पता नहीं. तहख़ाने से बंगले के एक बल्ब का कनेक्शन है. उस बल्ब को स्काउट कोडिंग में जलता—बुझता देख लड़का समझ जाता है कि उसके बाप ने ख़ुद को बंगले के उसी तहख़ाने में बंद किया हुआ है. वह अपने पिता से मन ही मन कहता है कि एक दिन वह बेहद अमीर होकर यह बंगला खरीदेगा और अपने पिता को मुक्त कराएगा.

कुछ समीक्षकों का मत है कि नौकर पिता ने हत्या के जुर्म में ख़ुद को जेल की सज़ा दे दी है. ये भी कहा जा रहा है कि यह आजीवन कारावास है क्योंकि उसके बेटे के पास कभी इतनी दौलत नहीं होगी. समस्या यह है कि दक्षिण कोरिया (तक़रीबन पूरे एशिया) में आर्थिक विषमताएं इस तरह की हैं कि जो ग़रीब पैदा होगा, वह ग़रीब ही मरेगा. चमत्कार लाखों में एक हो तो हो. वहीं, कोई कह रहा है कि इस फिल्म के सीक्वल में वह बेटा किसी किस्म के जीवट या करिश्मे से इस बंगले तक पहुंचेगा और अपने पिता को छुड़ाएगा. लेकिन, विचारणीय है कि अपने अपराध बोध से दबा और अपने मामूली लालचों का वीभत्स अंजाम देख चुका लड़का क्या अब किसी अनैतिक या जोखिम भरे रास्ते का रुख कर सकेगा?

भारतीय और एशियाई साहित्य की परंपरा
पैरासाइट के अंत को आशावाद के तौर पर भी समझा जा सकता है कि 'वो सुब्ह कभी तो आएगी'. दक्षिण कोरिया हो या भारत या एशिया का कोई अन्य देश, वास्तव में जहां बुनियादी मुद्दों पर संघर्ष हैं, वहां इस तरह का आशावाद बेमानी नहीं है. घुप अंधेरे और लंबी काली रात में सुब्ह की कल्पना भी शायद ताक़त दिया करती है. अपने पिता को काली कोठरी से आज़ाद करवाने की बेटे की इच्छा यथार्थ के धरातल पर दिवास्वप्न मात्र हो, लेकिन एक आशा का संचार करती है.

वास्तव में, पैरासाइट कोई अनोखी फिल्म नहीं है बल्कि पूर्ववर्ती कुछ एशियाई फिल्मों का नवीनतम संस्करण कही जानी चाहिए. चेतन आनंद निर्देशित नीचा नगर को याद करना चाहिए. थीम की सत्ह पर ये दोनों फिल्में काफ़ी समान दिखती हैं लेकिन पैरासाइट बेशक़ 60—70 बरस आगे का सिनेमा मालूम होता है. हयातुल्लाह अंसारी की कहानी 'नीचा नगर' रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की की कहानी 'लोअर डेप्थ्स' पर आधारित थी अर्थात 20वीं सदी के मध्य में रूस भी कमोबेश इसी तरह के सामाजिक आर्थिक संकट से जूझ रहा था. या 2017 की फिल्म 'बियॉण्ड द क्लाउड्स' का पहला शॉट, जिसमें स्कायस्क्रेपर्स के बीच बने एक पुल पर दौड़ती महंगी गाड़ियों को दर्शाते हुए कैमरा नीचे उतरता है और पुल के नीचे बेतहाशा ग़रीबी की इबारत बिछी हुई है. तो, जिसे जून हू 'स्टेयरवे मूवी' कह रहे हैं, वह कोई हालिया पैदा हुआ विचार नहीं बल्कि एशियाई साहित्य की एक परंपरा का नया चरण है और इससे यह नहीं समझना चाहिए कि पैरासाइट में कुछ भी मौलिक नहीं है.

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पैरासाइट.


मौलिकता के बावजूद फिल्मांकन और साहित्य के नज़रिये से पैरासाइट आपको कई तरह की रचनाएं याद बरबस दिलाती चलती है. किसी स्तर पर साहिर की वो नज़्म 'रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा', तो किसी जगह फ़ैज़ की नज़्म 'हम देखेंगे', तो कहीं ईरानी काव्य की कुछ झलकियां और कहीं रूसी साहित्य के किसी शाहकार का अक़्स आपके ज़ेह्न में उतर सकता है. अलावा इनके, वियतनाम, बर्मा, फलीस्तीन और चीन से आती रही ग़रीबी, आंदोलनों, दमन और अभिव्यक्ति की आज़ादी की मांग संबंधी ख़बरों के साथ ही कुछ चित्र भी पैरासाइट में घुले—मिले लगते हैं, लेकिन पहली नज़र में नज़र आना मुश्क़िल है.

आख़िर में बात पैरासाइट के अंत की, तो जिसे पश्चिमी समीक्षक 'ट्रैजिकॉमिक' या 'हिचकॉकियन' जैसे नये शब्दों में समझाने का जतन कर रहे हैं, उसके लिए हिंदी साहित्य में सुखांत, दुखांत के साथ ही प्रसादांत के सिद्धांत के रूप में बेहतर व्याख्या पहले से है. इस फिल्म के क्लाइमेक्स को हमें प्रसादांत समझना चाहिए. वैसे इस फिल्म की विषय वस्तु के हिसाब से इसका ज़ॉनर तय करने में भी समीक्षक उत्सुक दिख रहे हैं. डार्क कॉमेडी, कॉमेडी थ्रिलर, सोशल सटायर आदि शब्दों में इस फिल्म को समझाने की कवायद हो रही है, लेकिन यह सिर्फ़ समीक्षकों का काम है, इससे फिल्म देखने और उसका आनंद लेने में कोई फ़र्क नहीं पड़ता.

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अंतत: हमें इस फिल्म के बहाने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनावैज्ञानिक समस्याओं पर विचार करना चाहिए. एशिया के पूरे परिदृश्य को समझते हुए इत्तिहाद क़ायम कर किसी हल के लिए साझा कोशिश करना चाहिए. और समझना चाहिए कि इस ब्रह्मांड में हर कण एक दूसरे से संबद्ध है और अन्योन्याश्रित संबंध के कारण ही सृष्टि की रचना हुई है. ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में हमें पूरी दुनिया को ग्लोबल मार्केट के तौर पर कथित 'विकसित' करना है या पूरी दुनिया को एक घर की तरह समझने के संस्कार आगे बढ़ाने हैं. लोकतंत्र, आज़ादी, विकास जैसे तमाम जुमलों के पीछे जो हक़ीक़त है, उसे बेहतर करने के लिए कोई कलाकृति किस स्तर पर आपको आंदोलित कर सकती है, इसका अंदाज़ा किसे है? इसलिए हर श्रेष्ठ कलाकृति से रूबरू होना ही चाहिए.
First published: February 17, 2020, 8:39 AM IST
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