जॉन अब्राहम समेत कई स्टार्स ने दी पर्यावरण को हरा-भरा रखने की नसीहत

जॉन अब्राहम समेत कई स्टार्स ने दी पर्यावरण को हरा-भरा रखने की नसीहत
अभी ज्यादा लोगों के कृषि कार्य से जुड़ने से जहां उत्पादन आवश्यकता से ज्यादा होंगे. इस वजह से कृषि फसलों के दाम गिरने के भी आसार होंगे.

अभी ज्यादा लोगों के कृषि कार्य से जुड़ने से जहां उत्पादन आवश्यकता से ज्यादा होंगे. इस वजह से कृषि फसलों के दाम गिरने के भी आसार होंगे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 25, 2020, 3:41 AM IST
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हम जिन प्रगतिशील किसानों को देख रहे हैं जिन्होंने कृषि क्षेत्र में सफलता का तमगा हासिल किया है, वो खाद्यान्न की ओर नहीं बल्कि फल, सब्जी, फूल, औषधीय पौधों इत्यादि के उत्पादन की ओर झुक चुके हैं. इस क्षेत्र में अभी भी बहुत जरूरत और संभावनाएं हैं. इसके साथ पेड़ लगाने के लिए जागरूकता और सहयोग के लिए कार्यक्रम चलें तो इस समय किये गए मेहनत से आने वाले समय में देश की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को काफी तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है. हमें इस समय खाद्यान्न पर फोकस करने के साथ साथ पेड़ लगाने पर फोकस करना चाहिए क्योंकि खाद्यान्न की आपूर्ति उतनी ही होगी मार्केट में ज्यादा माल होने से रेट भी गिरेंगे. पेड़ लगाने से और पेड़ों के तैयार होने के बीच में मार्केट की जरूरत नहीं होती तब तक लॉकडाउन के बाद जब मार्केट पूरी तरह से खुलेगा तो इनके उत्पाद भी मार्केट में आकर किसानों के साथ-साथ देश के आय का बड़ा जरिया बनेंगे कुल मिलाकर आज जमा की गई मेहनत भविष्य में काफी फलदाई होगा. यह कहना है पीपल नाम से मशहूर पर्यावरणकर्मी प्रेम परिवर्तन का.

पीपल बाबा के अुनसार, लॉकडाउन के चलते गावों की तरफ लोगों के लौटने से इनके कृषि कार्य से जुड़नें की सम्भावना भी बढती गईं. ढेर सारे युवा कोरोना काल में दूसरे शहरों से अपने गांव पहुच चुके हैं. ये युवा गांव में ही कृषि से जुड़े उद्योगों में ही अपने भविष्य की सम्भावनाएं तलाश रहे हैं. ऐसे युवाओं को एक समूह बनाकर सामूहिक वानिकी का कार्यक्रम चलाना चाहिए. सरकार भी ऐसे समूहों को बंजर जमीनें मुहैय्या कराए तो काफी फायदा मिलेगा. इससे मिलने वाले उत्पादों (लकड़ी, फूलों, और फलों....) के एक बड़े हिस्से पर इनका अधिकार दिया जाय अगर ऐसा प्रावधान करके सरकार ऐसे युवाओं को आगे लेकर आती है तो कोरोना काल में ही आने वाले समय के लिए देश में हरियाली क्रांति का आधार बनाया जा सकता है.

अभी ज्यादा लोगों के कृषि कार्य से जुड़ने से जहां उत्पादन आवश्यकता से ज्यादा होंगे. इस वजह से कृषि फसलों के दाम गिरने के भी आसार होंगे. प्रति व्यक्ति कृषि आय कम होगी ऐसे में अगर लोगों अपने जमीनों के चारों और पेड़ लगायें या फिर कुछ जमीन के हिस्से में पूरा पेड़ लगाकर उसकी देखभाल करें तो वो उनका फिक्स डिपोजिट होगा क्योंकि 20 साल बाद ये पेड़ तैयार होकर अर्थव्यवस्था और पर्यावरण सुधार में चार चांद लगायेंगे.



कोरोना परिदृश्य में पौधारोपण ज्यादा जरूरी
भारत में कोरोना संकट के कारण करोडो मजदूर बेरोजगार हुए हैं, वहीं निजी प्राइवेट नौकरी करने वाले लोगों के सामने भी रोजगार बचाने का गम्भीर संकट है. इस परिदृश्य में शहरों से निराश लौट चुके लोग अपने रोजी के रास्ते को अपने गावों में तलाश रहे हैं. लॉकडाउन में हुई असुविधाओं और दूसरे सरकारों द्वारा कमजोर प्लानिंग की वजह से खड़ी होनें वाली दिक्कतों की वजह से ढेर सारे लोगों ने यह मन बना लिया है कि वो लौटकर वापस शहर नहीं जायेंगे. कोरोना काल में कृषि से जुड़ने वाले लोगों की तादाद काफी रही है इनमें भी युवाओं की संख्या काफी है. जो लोग शहरों में रोजगार कर रहे थे वो गांवों में आकर खेती में लग गए हैं नतीजतन खेती में उत्पादन के बढ़ने के काफी आसार हैं.

इस परिस्थिति में हमे बड़े बाजार की जरूरत होगी अगर हमारे उत्पादन को खरीदने के लिए निर्यात संवर्धन इकाइयों का विकास नहीं किया जाएगा तब तक इस बढे़ उत्पादन से किसानी के कार्य में लगे लोगों को को कोई फायदा नहीं होगा. बाजार की अनुपलब्धता की वजह से दाम गिरेंगे. खेती के लागत और खेती से मिलने वाली रकम में ज्यादा अंतर नहीं होगा. इस परिस्थिति में किसान अगर अपनी सोच को प्रगतिशील करते हुए खेती के साथ साथ पौधारोपण का कार्य करे तो खेती जहां पर तात्कालिक तौर पर जीविका का साधन बनेगी. इसके लिए किसान खेती के साथ -साथ अपने खेतों के किनारे पर पेड़ (सागौन, शीशम, पोपुलर, सफेदा ) लगायें या फलों (आम, अमरुद, केला, नीबू और मौशामी ..) आदि के बगीचे लगायें. आज उनके द्वारा की गई फिक्स डिपोजिट आने वाले 15 से 20 साल में मिलेगा. जबतक रोजगार नहीं है तब तक लोगों को कृषि के साथ-साथ कीमती लकड़ियों व फलदार वृक्षों की खेती करनी चाहिए.
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