सोशल मीडिया फॉलोवर्स ना होने पर प्रोड्यूसर ने नहीं दी वेब सीरीज, पीके-बाटला हाउस में कर चुके हैं काम

अभिनेता आलोक पांडेय.

'एम धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी', 'पीके' और 'बाटला हाउस' जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके आलोक पांडेय (Alok Pandey) एक वेब-सीरीज में केवल इसलिए नहीं चुना गया कि उनके सोशल मीडिया फॉलोवर्स अधिक नहीं थे.

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नई दिल्ली. 'पीके', 'प्रेम रतन धन पायो', 'एमएस धोनीः द अनटोल्ड स्टोरी', 'लखनऊ सेंट्रल' और 'बाटला हाउस' जैसी सुपरहिट फिल्मों में काम कर चुके अभिनेता आलोक पांडेय (Alok Pandey) इस साल इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर बन रही फिल्म 'हुड़दंग (Hurdang)' और फरहान अख्तर की वेब सीरीज 'डोंगरी टू दुबई' में दिखाई देंगे. वे इंडस्ट्री के एक उभरते हुए कलाकार हैं. अपने अभिनय के दम पर इंडस्ट्री में बीते आठ सालों से टिके हुए हैं. हालांकि अब भी उन्हें एक ऐसी फिल्म की तलाश है, जो उन्हें उनकी मेहनत और लगन का प्रतिफल दे. वे एक ऐसे एक्टर हैं जिनके अभिनय की सरहाना फरहान अख्तर, जॉन अब्राहम जैसे अभिनेता भी कर चुके हैं. अपने 10 फिल्मों के करियर में उन्होंने बॉलीवुड के टॉप डायरेक्टर्स अनुराग कश्यप (दैड डे आफस्टर एवरी डे), राजकुमार हिरानी, सूरज बड़जात्या, नीरज पांडेय, निखिल आडवाणी के साथ काम कर लिया है. लेकिन वो खुद कहते हैं कि अभी तो शुरुआत भी नहीं हुई है, अभी तो बहुत कुछ कर के दिखाना बाकी है. News 18 Hindi से हाल ही में आलोक ने बात की और अपनी दिली बाते शेयर कीं.

आलोक उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर जिले के रहने वाले हैं. उनके पिता एक किसान हैं और मां गृहणी. पढ़ाई के दौरान उन्होंने थ‌िएटर जाना शुरू किया. वहीं से अभिनय मन में घर कर गया और एक्टिंग के क्षेत्र में पूरी तरह से कूद पड़े. शाहजहांपुर में कई प्ले करने के बाद वो बॉलीवुड फिल्मों में काम करने की तमन्ना लेकर साल 2012 में मुंबई पहुंचे. इसके बाद क्या हुआ, आइए जानते हैं उन्हीं की जुबानी-

आलोक मुंबई आने से पहले आपके क्या खयालात थे? क्या सोच कर मुंबई आए थे?
मैं अपने शहर में भी एक्टिंग ही कर रहा था. मैंने भारतेंदु नाट्य अकादमी और सत्यजीत रे से भी अभिनय की बारीकियां सीखीं. सही कहूं तो इन दोनों संस्‍थानों ने मेरे अभिनय को संवारने का काम किया. करीब पांच सालों तक अभिनय करने के बाद मैं मुंबई आया था. मुझे एक्टिंग में ही किस्मत आजमानी थी तो मैं आ गया.

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डायरेक्टर राजकुमार हिरानी के आलोक पांडेय.


अच्छा. इसके बाद?
इसके बाद तो (हंसते हुए). मैंने अपनी प्रोफाइल बनाई थी. ऑडिशन के लिए जाने लगा. जो भी काम मिला, सबको हां बोल दिया. लेकिन एक शख्स ने काम करा के पैसे ही नहीं दिए. बल्कि इतने बुरे बर्ताव किए मैं डिप्रेशन में चला गया. महीनों-महीनों दौड़ाने भगाने के बाद भी लोग कहते ऐसे कहते हैं कि अभी नहीं पैसे, जब हो जाएंगे तब दे देंगे.

फिर आप डिप्रेशन से कैसे उबरे, पैसे कहां से आए?
मैं इस मामले में थोड़ा लकी रहा. मेरी फैमिली ने मुझे बहुत सपोर्ट किया. मैं घर में छोटा लड़का हूं. मेरे माता-पिता और सभी बड़े भइयों ने मुझे काफी सपोर्ट किया. इसी बीच अनुराग कश्यप की शॉर्ट फिल्म 'दैट डे आफ्टर एवरी डे' में छोटा सा काम मिला. यह मेरे लिए बड़ी बात थी. लेकिन हां, ये मैं एक्सेप्ट करना चाहूंगा कि वो दिन इतने आसान नहीं थे.

जब कठिन दिनों से गुजर रहे थे तब कुछ और करने या कोई नौकरी कर लेने का मन नहीं हुआ?
पता नहीं जनार्दन, मैं सच कहूं तो एक्टिंग के अलावा आज तक कभी कोई खयाल मन में आया ही नहीं. ना ही मैंने आज तक कभी कुछ और किया ही है. अब आठ साल से ज्यादा हो गए. हां, बहुत बुरे दिनों में मैंने बस ये सोचा था कि वापस शाहजहांपुर जाऊंगा और वहीं पर अपना थ‌िएटर ग्रुप ओपेन करूंगा. फिर पूरी जिंदगी इसी में गुजार दूंगा.

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एमएस धोनी की कास्ट के साथ आलोक. बायें से दूसरे नंबर पर.


एक तरफ आप कह रहे हैं कि जबर्दस्त स्ट्रगल रहे हैं, दूसरी तरफ आपके करियर को देखें तो बड़ी-बड़ी फिल्में, बड़े-बड़े डायरेक्टर, ये कैसे?
(थोड़ी देर हंसने के बाद) एक लाइन में कहूं तो मेहनत. इसके अलावा मेरे पास कुछ नहीं है. दरअसल, सच कहूं तो मैंने अभी तक थ्री सीन, फोन सीन या आठ-दस सीन्स ही किए हैं. लेकिन मैं अपनी इस छोटी भूमिका में ऐसे एक्टिंग करने की कोशिश करता हूं जैसे पूरी फिल्म मेरी है. मुझे किसी फिल्म में एक सीन का मौका लगता है तो भी मैं उसे फिल्म के लीड एक्टर की तरह एक्ट करने की कोशिश करता हूं. बस एक वजह यही है कि अच्छे लोग याद करते हैं.

अब देखिए, मैंने फरहान अख्तर के साथ साल 2017 में लखनऊ सेंट्रल की थी. लेकिन मैं उनको याद था. जब उन्हें कोई ऐसा किरदार दिखा तो उनकी तरफ से मुझे सीधा बुलाया गया. उनके ऑफ‌िस फोन आया, बताया कि फरहान ने कहा है, आलोक को बुला लो. कुछ ऐसा ही रिश्ता 'बाटला हाउस' के बाद जॉन अब्राहम से भी है.

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फरहान अख्तर के साथ आलोक.


फिर बात कहां अटक रही है? अब तो आपको बड़ी भूमिकाएं मिलनी शुरू हो जानी चाहिए?
मुंबई आए आठ साल हो गए. इस फ़ील्ड में करीब 13 साल हो गए.बीच मे कई अच्छे प्रोजेक्ट हाथ मे आते आते रह गए .कहीं प्रोड्यूसर को नोन फेस चाहिए तो कहीं हमारा स्टेटस उनको पसंद नही आया . सच कहूं तो लाइमलाइट और पीआर जैसी चीजों से मैं जूझ रहा हूं. असल में आजकल जो चमकता है वही काम पाता है.

क्या आप स्टारकिड्स की बात कर रहे हैं? क्या आपको लगता है कि आप जैसे मेहनती एक्टर्स के बजाए बॉलीवुड स्टारकिड्स को ज्यादा तरजीह दे रहा है?
नहीं, नहीं मुझे उनसे कोई परेशानी नहीं है. कोई भी शख्स अपने लोगों को तो आगे बढ़ाना ही चाहेगा. लेकिन थोड़ी झुंझलाहट तब होती है जब वो लोग भी हमसे मुंह मोड़ लेते हैं, जो हमारी तरह मेहनती बैकग्राउंड से आए हैं. जो स्ट्रगल के मायने जानते हैं.

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आलोक पांडेय के बारे में फरहान अख्तर ने क्या कहा.


अब देखिए ना, कुछ दिनों पहले ही एक काम लगभग फ़ाइनल हो गया था. ऑडिशन हुआ, फिर कई राउंड ऑडिशन हुए. सबको पसंद आ गया. इसके बाद प्रोडक्‍शन ने अलग-अलग एंगल्स से मुझसे कई सेल्फी मांग लीं. फ़ायनल होने से ठीक पहले एक दिन अचानक प्रोडक्‍शन हाउस की ओर से कॉल आई मुझे बताया गया कि प्रोड्यूसर ने मुझे प्रोजेक्‍ट में ना लेने को कहा है. इसके पीछे कारण बताया गया कि इंस्टाग्राम और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मेरे फॉलोवर इतने ज़्यादा नहीं हैं. फ़ेसबुक पर मेरा पेज नहीं है. मेरे सोशल मीडिया हैंडल्स देखने के बाद मुझे वेब-सीरीज में ना लेने का फैसला किया गया है.

क्या वाकई? आपको इंस्टाग्राम के फॉलोवर ना होने के चलते वेब-सीरीज़ में नहीं लिया?
मुझे तो यही बताया. वैसे भी, जब मैंने पूरा रिव्यू किया तो मुझे यही समझ आया कि शायद मुझे पीआर ना रखने का नुकसान हो रहा है. मैंने इधर कुछ सालों से महसूस किया है कि अब बॉलीवुड इंडस्ट्री में पीआर बहुत प्रभावशाली हो गया है. लेकिन सच कहूं तो अभी मैं पीआर के बारे में नहीं सोच रहा हाँ वो अलग बात है कि कुछ घटनाएं मुझे सोचने पे विवश कर दें . मैं कोशिश करता हूं कि अच्छे काम करने वाले और काम की अहमयित रखने वाले लोगों के टच में रहूं.

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धोनी के रील और रीयल दोस्त. रील किरदार निभया था आलोक पांडेय ने.


निज़ी तौर पर मैं बॉलीवुड पार्टीज़ को बहुत पसंद नहीं करता. इसलिए मैं जाता नहीं हूं. मेरे जैसे लोगों के लिए यही तोड़ है कि एक सीन मिले तो उसकी तैयारी भी मैं ऐसे करता हूँ कि जैसे मेरा ये क़िरदार उस फ़िल्म का लीड कैरेटक्टर है. काम के दम पर ही फ़रहान और जॉन के दिल में जगह बनाई है. ऐसे ही आगे बढ़ेंगे.

आगे किस तरह का काम करना चाहते हैं?
फिलहाल तो मैं अब ये 8-10 सीन्स वाले क़िरदारों से उबरना चाहता हूं. असल में पिछली कुछ फ़िल्मों 'बाटला हाउस', 'वनडे', 'लखनऊ सेंट्रल' में मेरे किरदार टेरेरिस्ट या इससे मिलते-जुलते किरदार रहे. तो मुझे इन दिनों ज़्यादातर ऐसे ही किरदार ऑफर होने लगे हैं. लेकिन मैं मना कर रहा हूं. फिलहाल 'हुड़दंग' और 'डोंगरी टू दुबई' टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकती हैं.

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आलोक अब 'हुड़दंग' और 'डोंगरी टू दुबई' में दिखाई देंगे.


एक आखिरी सवाल, आपकी शादी हो गई है?
हां. अब तो मेरी शादी के पांच साल हो गए. मेरी शादी यूपी में मेरे शहर के पास ही हुई है. कई सालों तक फाइनेंसली प्रॉब्लम की वजह से पत्नी को मुंबई नहीं ला पा रहा था. अब हालात सुधर रहे हैं तो पिछले साल उन्हें ले आया. आप सवाल पूछें, इससे पहले ही मैं बता देता हूं, मेरा परिवार और मेरी पत्नी मेरी बैकबोन हैं. उन्होंने हमेशा मुझे प्रोत्साहित किया है, कभी निरुत्साहित नहीं किया. लेकिन यह भी सच है कि अब परिवार को भी लगता है ‌कि कुछ अच्छा होना चाहिए.

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