बेहद उतावले थे आर. डी. बर्मन, जल्दबाजी में गर्म चाय को ऐसे कर लेते थे ठंडा

एक बार गुलज़ार ने बताया था कि आरडी बर्मन बेहद उतावले इंसान थे. जब वह संगीत रच रहे होते थे तो काफी बैचेन रहते थे.

News18Hindi
Updated: June 27, 2019, 7:54 AM IST
बेहद उतावले थे आर. डी. बर्मन, जल्दबाजी में गर्म चाय को ऐसे कर लेते थे ठंडा
आर. डी. बर्मन
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Updated: June 27, 2019, 7:54 AM IST
प्रसिद्ध संगीतकार आर.डी. बर्मन उर्फ पंचम दा का आज (27 जून) जन्मदिन है. उन्हें इस नश्वर जगत से कूच किए दो दशक से अधिक समय हो गया, लेकिन उनकी सुरमय विरासत आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है. 'आर.डी. बर्मानिया-पंचमेमॉयर्स' किताब लिखने वाले चर्चित फिल्म पत्रकार चैतन्य पादुकोण का कहना है कि पंचम दा लोगों की नब्ज पहचानने वाले एक 'अत्याधुनिक गुणवान' व्यक्ति थे.

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चैतन्य कहते हैं कि वह एक अत्याधुनिक गुणवान व्यक्ति थे, जो जान जाते थे कि क्या लोकप्रिय होगा. यह चीज उनमें नैसर्गिक थी. वह संगीत निर्माता या निर्देशक के सामने चार से पांच आप्शन रखते थे. अगर निर्माता को संगीत की समझ नहीं होती थी, तो स्थिति उलट हो जाती थी. उसी वक्त वह एक बेहतर धुन सुझाते थे.



विनम्र व आडंबरहीन
पंचम दा बहुत ही 'विनम्र व आडंबरहीन' थे. चैतन्य ने ये भी बताया कि आर.डी. बर्मन को मिर्ची खाने का शौक था और वह अपने नर्सरी गार्डन में अलग-अलग तरह की मिर्ची उगाते थे. पंचम दा के बारे में बात करते हुए एक बार उन्होंने झट से कहा, 'उन्हें बहुत तीखा खाना पसंद था, जो वह हमें भी खिलाते थे.'


बेहद उतावले थे पंचम दा
वहीं एक बार गुलज़ार ने बताया कि आर डी बर्मन बेहद उतावले इंसान थे. जब वह संगीत रच रहे होते थे तो काफी बैचेन रहते थे. अगर उस वक़्त उन्हें गर्मागर्म चाय पेश की जाती तो वह उसके ठंडा होने का इंतज़ार भी नहीं करते थे. पानी में डालकर उसे पी जाते थे, लेकिन इतने उतावले होने के बाद भी उनके संगीत में एक ठहराव था.



जब धीमी मौत मर रहा था संगीत
भारत में 80 का दशक एक ऐसा दौर था जब सिनेमा में अच्छा संगीत धीमी मौत मर रहा था, मेलोडी के कद्रदान तेज़ी से कम हो रहे थे. ये वो दौर था जब 'संगीत' से ज्यादा एहम 'हीरो का एक्शन' था और अमिताभ बच्चन सरीखे अभिनेता फिल्मी पर्दे पर छा गए थे ऐसे में अच्छे संगीत की ज़रूरत पर अच्छा एक्शन और डॉयलॉग हावी होने लगा था. ये वही वक़्त था जब बप्पी लहरी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल भी हिट संगीत देने लगे थे और इसका खामियाजा 'पंचम दा' को भुगतना पड़ा था.



रीमेक का दौर
80 के दशक वो समय था जब दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक आने लगे और हीरो हीरोइन के भड़कीले डांस को ज्यादा जगह मिलने लगी और मेलोडी पर भारी भरकम म्यूजिक आ गया. यहां तक कि आरडी बर्मन के बेहद करीबी किशोर कुमार भी अब नए संगीतकारों के लिए दोयम दर्जे के गाने गा रहे थे, ये सब देखना आरडी बर्मन के लिए बहुत मुश्किल भरा था और वो ज्यादा खुश नहीं थे. साल 1987 में किशोर कुमार की मौत ने आरडी बर्मन को और भी दुख पहुंचा दिया, वो बुरी तरह से टूट गए.



गिरते स्तर से परेशान थे पंचम दा
इन सभी बातों की पुष्टि आशा भोंसले अपने पहले दिए इंटरव्यूज़ में कर चुकी हैं कि आर डी बर्मन बॉलीवुड में संगीत के गिरते स्तर से परेशान थे भी. हालांकि इस बीच उन्होंने गुलजार की कुछ फिल्मों जैसे 'लिबास', 'इजाजत', 'अंगूर', 'नमकीन' और 'मासूम' में अच्छा संगीत दिया. आरडी बर्मन के संगीत ने सनी देओल (बेताब) संजय दत्त (रॉकी) और कुमार गौरव (लव स्टोरी ) की लॉन्चिंग में मदद भी की लेकिन फिर भी आरडी बर्मन खुश नहीं थे, वो खुद को दर्शकों की बदली हुई पसंद के मुताबिक ढालने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही थी.



जब विधु विनोद ने मांगा आर डी टच
आर डी बर्मन की आखिरी फिल्म '1942 एक लव स्टोरी' के संगीत को लेकर एक किस्सा बेहद मशहूर है. निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा इस फिल्म के संगीत के लिए पंचम दा के पास गए. पंचम दा ने उन्हें फिल्म का स्कोर सुनाया लेकिन विधु को वो पसंद नहीं आया, विधु बताते हैं कि उन्होनें कहा कि इस संगीत से 'आर डी' गायब हैं. तब पंचम दा ने उन्हें कुछ वक़्त देने के लिए कहा और फिर जब विधु वापस आए तो वो कुछ नई ही धुनों को सुन रहे थे और वो आरडी की आखिरी और शानदार परफॉर्मेंस भी थी.

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