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इंडियन ऑफ़ दि ईयर भी बन गया, हर रोल में घुस जाने वाला 'राजकुमार'

राजकुमार राव बॉलीवुड के सबसे ताकतवर एक्टर्स में से एक हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 1, 2017, 1:14 PM IST
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सीएनएन न्यूज़ की तरफ़ से मिले प्रतिष्ठित इंडियन ऑफ़ दि ईयर अवॉर्ड (मनोरंजन) के इस साल के विजेता राजकुमार राव हैं.

अपने अभिनय से राजकुमार ने बॉलीवुड के साथ-साथ विदेशी फ़िल्मकारों को भी प्रभावित किया है और उनकी फ़िल्म न्यूटन के ऑस्कर में जाने के बाद साबित हो गया है कि वो बॉलीवुड के अगले दिग्गज हैं.

राजकुमार के बारे में कहने के लिए कई किस्से हैं लेकिन इंडियन ऑफ़ दि ईयर बनने वाले इस शख़्स को नहीं लगता कि उसके पास कोई कहानी है.



‘न तो मेरे पास कोई जूसी स्टोरी है न ही किसी दर्दनाक स्ट्रगल की कहानी. मेरे पास देने के लिए कोई हेडलाइन नहीं हैं. हां मैंने मेहनत की, धक्के खाये और रिजेक्शन सहे, पर मुम्बई में मेरे लिए क्यों कोई बांहें फैलाकर खड़ा हो जाता!’
अगर ये डॉयलाग है तो राजकुमार राव इन्हें बड़े खालिसपन के साथ डिलीवर करते हैं. जैसे वह उन संवादों को कहते हैं, जो उनके अलग अलग रोल्स उनसे कहलवाते हैं. फ़र्क सिर्फ ये है कि ये उनकी अपनी ज़िंदगी के बारे में है. दिल्ली-गुड़गांव में पले बढ़े राजकुमार राव की रेंज और डेप्थ आप पर हर बार छाप डालती है, भले ही वह ‘शाहिद’ का वकील हो या ‘सिटीलाइट्स’ में स्ट्रगलर या ‘क्वीन’ में कंगना रनौत का पति, ‘अलीगढ़’ का जर्नलिस्ट, ‘न्यूटन’ का इलेक्शन ऑफिसर या ‘लव सेक्स और धोखा’ में सेल्समैन.

राजकुमार राव मैथड एक्टर है जो एक- एक सीन के लिए भी कई बार महीनों तक भी मेहनत करता है.

दिल्ली के आत्मा राम सनातन धर्म स्कूल से ग्रैजुएट राजकुमार को शुरू से एक्टर बनना था, "ना मुझे कुछ लिखना है, ना ही कोई अभी कोई फ़िल्म बनानी है, अभी मैं एक्टिंग करना चाहता हूं. कर रहा हूं". करीब सात साल पहले एकता कपूर के बैनर एएलटी एंटरटेनमेंट बालाजी मोशन पिक्चर्स के साथ ही उदय हुआ राजकुमार राव का.

दिल्ली से पुणे फ़िल्म इंस्टीट्यूट तक एक्टिंग सीखने आए और कोर्स के ख़त्म होते-होते निर्देशक दिबाकर बैनर्जी का एक विज्ञापन देखा जिसमें कुछ युवा एक्टर्स की डिमांड की गई थी. राजकुमार ऑडिशन तो दे ही रहे थे, यहां उनका सिलेक्शन हो गया और फिर उन्हें ज़्यादा परेशान नहीं होना पड़ा.

वो खुद कहते हैं कि उनके पास कोई परेशान करने वाली मार्मिक कहानी नहीं है. ज़ाहिर है कि होगी भी नहीं क्योंकि राजकुमार एक ऐसे कलाकार हैं जिन्हें अपनी फ़िल्म में हर कोई लेना चाहता है.

शाहिद, सिटीलाइट्स जैसी फ़िल्मों में राजकुमार के साथ काम कर चुके हंसल मेहता कहते हैं, "वो एक डायरेक्टर्स डिलाइट है, उसे समझाना मुश्किल नहीं है. आप कोई भी सीन उसे दो और आपकी हिस्से की भी मेहनत उस दृश्य पर वो कर लेता है"

राजकुमार राव के बारे में राजीव मसंद कहते हैं, "तलाश में वो आमिर के साथ थे, आमिर के साथ स्पेस शेयर करते वक़्त आप यूं भी पृष्ठभूमि में चले जाते हैं, लेकिन राजकुमार अपनी स्क्रीन प्रेजेंस दर्ज कराते हैं और वो साबित करते हैं कि अच्छे एक्टर को सिर्फ़ एक सीन भी दिया जाए तो भी वो अपनी काबिलियत को दिखा सकता है."

राजकुमार ने नेशनल अवॉर्ड जीत लिया है, उनकी फ़िल्म ऑस्कर में जा रही है एक एक्टर को इससे ज़्यादा क्या चाहिए ही होता है.

गुड़गांव कि एक गैर फ़िल्मी परिवार से आने वाले राजकुमार यादव साल 2013 तक अपने नाम में यादव का इस्तेमाल करते रहे थे लेकिन फ़िर शाहिद के दौरान उन्होनें अपना नाम बदलने का फ़ैसला लिया और 'राव' नाम अपना लिया.

क्या ऐसा करने का कोई ख़ास कारण रहा है. इस पर वो साफ़ साफ़ बात नहीं करते लेकिन फ़िल्मी दुनिया में नाम बदलने का इतिहास बहुत पहले से रहा है.

ज्योतिष के फेर में कई कलाकारों ने अपने नाम में एक एक्सट्रा शब्द जोड़ा या घटाया है, जैसे अजय देवगन ने अंग्रेज़ी में अपना नाम Devgn रख लिया है. आयुष्मान खुराना के नाम की स्पेलिंग अपने आप में किसी पहेली से कम नहीं है.

इसी तरह राजकुमार ने भी अपने अंग्रेज़ी नाम में पहले एक M जोड़ा और फिर यादव की जगह राव सरनेम का इस्तेमाल शुरू कर दिया. अगर यह ज्योतिष की सलाह रही होगी तो भी यह सलाह उनके काम आई क्योंकि नाम बदलने के बाद उनकी फ़िल्मों की परफ़ॉर्मेंस और बेहतर हो गई.

राजकुमार के अनुसार नाम बदलने के पीछे उनकी मां का हाथ रहा क्योंकि उनकी मां ने ही उन्हे सुझाव दिया था कि अपने नाम में उन्हें कुछ बदलाव करने चाहिए और वो बदलाव उन्होनें कर के देखे.

बॉलीवुड में एक कॉमन मैन की छवि को पर्दे पर सजीव करने के लिए मशहूर राजकुमार को अपने रोल्स के लिए खुद को ट्रांसफ़ॉर्म करने में कोई ग़ुरेज़ नहीं होता. वो 33 साल के हैं लेकिन हाल ही में आई फ़िल्म राब्ता में एक गेस्ट अपीरियेंस के लिए 300 साल के बूढ़े का रोल करने में उन्होनें कोई झिझक नहीं दिखाई.

फ़िल्म 'ट्रैप्ड' के लिए उन्होनें 7 दिनों में अपना 22 किलो वज़न कम किया था. और बताया था कि पूरे दिन वो सिर्फ़ एक कॉफ़ी और एक गाजर पर गुजार देते थे.

लेकिन सिर्फ़ शारीरिक बदलाव ही इस एक्टर की ख़ासियत नहीं है. गैंग्स ऑफ वासेपुर में शमशाद के रोल के लिए वो वासेपुर जाकर वहां की बोली को समझ कर आए थे.

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ये भी एक लुक हुआ करता था.


इस बात को कहती हुई ख़बरें आपको मिलेंगी जिनमें राजकुमार राव को अगला बड़ा स्टार कहा गया है. आने वाला बॉलीवुड का सितारा कहा गया है और आज नास्त्रेदामस की भविष्यवाणियों की तरह वो सच होती दिख रही हैं.

राजकुमार की ज़िंदगी में एक बड़ा हाथ उनकी मां कमलेश यादव का भी है. कमलेश ने अपने बेटे के सपनों को कभी रोका नहीं और एक ज्वाइंट फ़ैमिली में पले बढ़े राजकुमार राव को कभी किसी रोकटोक का सामना नहीं करना पड़ा.

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजकुमार के स्कूल की फ़ीस कई बार उनके टीचरों ने भरी. अपनी अंग्रेज़ी अच्छी करने के लिए उन्होने एक प्राइवेट स्कूल में एडमिशन लिया. इसके अलावा वह मार्शल आर्ट्स और डाँस क्लासेस में भी गए. एक्टर बनने का जूनून उनपर सवार था और इसे उन्होनें पूरा किया.

दिल्ली के दिनों से ही वो थिएटर के लिए पागल थे. धौला कुआँ से मंडी हाउस जाते समय वह बस में मौजूद लोगों को अपना दर्शक मानते थे. वो किसी कलाकार की तरह बस में घुसते, कभी गूंगा बहरा, कभी एक गुस्से वाला आदमी, कभी एक स्टाइलिश नौजवान इस बस में वो अपना टेस्ट खुद लेते और लोगों के चेहरे के एक्सप्रेशन उनका रिव्यू होता.

इन्ही बसों में उन्हें कई किरदार भी मिले जिनके हाव भाव को राजकुमार ने अच्छे से दर्ज कर लिया.

राजकुमार की एक ख़ास बात है कि वह बॉलीवुड में कई लोगों को जानते हैं. लेकिन इस बात का गुमान उन्होनें अपने सिर नहीं चढ़ने दिया.

वो कहते हैं,"मैं हर फ़िल्म को वैसे ही करता हूं, जैसे ये मेरी पहली फ़िल्म हो. मैंने ऑडिशन दिए हैं और हर रोल के लिए मेहनत की है ताकि किसी से काम मांगना नहीं पड़े. लोग आपको काम लेकर ढूंढे."

स्टारडम के बोझ तले दबे बॉलीवुड में राजकुमार राव किसी ताज़ी हवा के झोंके जैसे हैं. वो किसी हीरो की इमेज नहीं लगते, वो सुपरस्टार नहीं लगते. उनकी ख़ास बात है कि वो आपकी हमारी तरह लगते हैं. एक हीरो जो मार खा सकता है, जो अपने घर में बंद हो सकता है, जिसके पैसे छीने जा सकते हैं, जिसके पीछे 100 डांसरो की भीड़ अचानक से नाचना शुरु नहीं कर देती, जो थोड़ा सा तुतला कर भी बोलता है.

वो किसी हीरो जैसा नहीं है और यही उस हीरो की ख़ास बात है - हंसल मेहता राजकुमार को ऐसे ही बयान करते हैं.

"मैं शुरुआती दिनों में बॉडी बना कर खूब मेहनत कर रहा था कि मैं किसी हीरो का रोल कर सकूं लेकिन धीरे-धीरे मुझे समझ आ गया कि मुझे हीरो का रोल नहीं मिलेगा. कुछ एड फ़िल्मों और रोल्स के रिजेक्शन के बाद मैंने समझ लिया की शक्ल पर नहीं एक्टिंग पर काम करना होगा" राजकुमार राव स्ट्रग्ल के बारे में बात करते हुए बताते हैं.

राजकुमार जब काम ढूंढ रहे थे तब बॉलीवुड में अनुराग कश्यप, दिबाकर बैनर्जी और हंसल मेहता जैसे निर्देशकों ने भी अपने पैर जमा लिए थे. अच्छी फ़िल्मों के लिए अच्छा एक्टर होना ज़रुरी था और अब ऐसी फ़िल्में बन रही थीं जिन्हें अच्छे एक्टर चाहिए थे.

राजकुमार राव ने शाहिद के बाद सिटी लाइट्स, अलीगढ़ जैसी फ़िल्में की जिन्हें भले ही मेगा बजट के साथ शूट नहीं किया गया था. लेकिन जिन फ़िल्मों में राजकुमार ने साबित कर दिया कि वो बॉलीवुड के दिग्गज कलाकारों में से एक हैं.

ये है टीम न्यूटन


वो शादी में ज़रुर ज़रुर आना में पल्लो लटके जैसे गानों पर नाच लेते हैं. वहीं न्यूटन जैसी फ़िल्मों के किरदारों को भी बखूबी निभाते हैं. न्यूटन में राजकुमार के साथ काम करने वाले पंकज त्रिपाठी कहते हैं,"वो होता है न, एक आदमी घुसकर अपना रोल करता है. ये वैसा ही है, एकदम घुसकर रोल में रोल करता है."

इस समय एकता कपूर की वेब सीरीज़ बोस - डेड और अलाइव में सुभाष चंद्र बोस का किरदार निभा रहे राजकुमार ने कहा, "मुझे किरदार के लिए शक्ल और रुप बदलने में ज़ोर नहीं लगता. मेरी कोई इमेज नहीं है और यही मेरी सबसे बड़ी ताकत है. मैं किसी के जैसा भी हो सकता हूं. एक समय में मैं भी बॉडी बनाकर घूम रहा था लेकिन अब नहीं. अब मैं वैसा हूं जैसी मेरे किरदार की मांग है."

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जल्द ही राजकुमार नेताजी सुभाषचंद्र बोस के किरदार में नजर आएंगे


एकता कपूर की रागिनी एमएमएस के बाद राजकुमार राव ने बैठ कर किसी रोल का इंतज़ार नहीं किया उन्होनें छोटे रोल करना मंजूर किया और यही बात राजकुमार के पक्ष में रही.

तलाश में आमिर के साथ एक छोटा सा रोल उन्हें बड़ी हाईलाइट दिला गया, फिर गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में शमशाद का रोल एक प्रभावी रोल रहा.  वो शमशाद का किरदार ही था जिसके बाद अनुराग ने हंसल मेहता को उनकी अगली फ़िल्म के लिए राजकुमार का नाम सुझाया.

हंसल कहते हैं,"शाहिद के लिए वो परफ़ेक्ट था, हालांकि हर निर्देशक की तरह किसी नए कलाकार के साथ काम करने में जो झिझक होती है वो मुझे हो रही थी लेकिन फिर जो हुआ वो इतिहास है."

वो शाहिद ही थी जिसके लिए राजकुमार राव को उनका नेशनल अवॉर्ड मिला और फिर हंसल के साथ एक ऐसी दोस्ती शुरु हुई कि हंसल की फ़िल्मों का वो अभिन्न हिस्सा बन गए.

हालांकि एक बड़ी कमर्शियल हिट के लिए राजकुमार को अभी भी इंतज़ार है. बरेली की बर्फ़ी, शादी में ज़रुर ज़रुर आना जैसी फ़िल्मों को करने के बाद भी मास ऑडियंस में राजकुमार को वो पहचान नहीं मिली है जिससे सिर्फ़ उनके नाम से लोग थिएटरों में खिंचे चले आए.

राजकुमार खुद मानते हैं कि काइ पो चे जैसी फ़िल्में भी एक एक्टर के करियर में बहुत ज़रुरी हैं क्योंकि कई नामी गिरामी एक्टर्स को सिर्फ़ इसलिए बॉलीवुड से एग्ज़िट लेनी पड़ी क्योंकि उनके नाम पर थिएटर एक्टर का ठप्पा लग गया था.

वो किसी बड़े अभिनेता से कम नहीं है, उनके पास एक फ़िल्मफ़ेयर अवॉर्ड है, एक नेशनल अवॉर्ड है और एक ऑस्कर में जाने वाली फ़िल्म भी है. पैसे को तरक्की का नज़रिया मानने वाले पाठकों के लिए ये जानना दिलचस्प होगा कि उनके पास एक ऑडी कार भी है, लेकिन फिर भी वो आपको सुपरस्टार वाले नखरों के साथ दिखाई नहीं देंगे.

हां वो अब अपने रोल्स को लेकर चूज़ी हो गए हैं. एक अभिनेत्री, पत्रलेखा के साथ उनका लॉन्ग टाइम अफ़ेयर भी है, जिसे वो शादी में बदलेंगे या नहीं ये उनकी मर्ज़ी पर निर्भर करता है लेकिन इस सबके बावजूद वो आज भी बोस जैसे प्रोजेक्ट के लिए तैयार हो जाते हैं और यही उन्हें ख़ास बनाता है.
राजकुमार अपने एक इंटरव्यू में कहते हैं, "मैं कभी कभार सचिन तेंदुलकर के बारे में सोचता हूं, अमित (अमिताभ) जी के बारे में सोचता हूं. आज भी वो इतने विनम्रता से पेश आते हैं, तो अगर वो अपनी सारी ज़िंदगी इतने विनीत रह सकते हैं तो राजकुमार राव को ज़मीन से जुड़ा रहने में कोई परेशानी नहीं आनी चाहिए."

हाल ही में राजकुमार राव के अपनी फ़ीस बढ़ा लेने की बात भी सामने आई जिसके लिए वो सिर्फ़ इतना कहते हैं कि मैं पैसों के लिए काम नहीं करता हूं और ये सब ख़बरें कहा से और क्यों आ रही हैं, इन्हें छापने वाले ही जानते होंगे.
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