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पर्दे पर स्मिता से ज्यादा उनकी आँखे बोलती थीं और ये उन्हें मालूम था : इक़बाल

स्मिता पाटिल (फाइल फोटो)

स्मिता पाटिल (फाइल फोटो)

स्मिता पाटिल बेहद खास थीं क्योंकि उनसे ज्यादा उनकी आँखे बोलती थीं

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अपनी जिंदगी के कुछ ही साल तो स्मिता पाटिल दे पायी थीं फिल्मों को और इन चंद सालों में ही वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर की अभिनेत्री बन कर छा गयीं.

कला फिल्मों की तो वे महारानी थीं हीं कमर्शियल फिल्मों में भी स्मिता का चेहरा गजब ढाता था. हैरत की बात ये हैं कि निजी जीवन में शर्मिली और शांत स्मिता पाटिल ने कभी नहीं चाहा था कि वे फिल्मों में काम करें. उनकी फिल्म बाजार में हसन कमाले का एक गीत हैं “करोगे याद तो हर बात याद आएगी” और 17 अक्टूबर को उनके जन्म दिन के मौके पर उनकी हर बात याद आ रही है.

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री रह चुके शिवाजी राव पाटिल की स्मिता पाटिल ने मुंबई से पढ़ाई की और फिर मुंबई दूरदर्शन पर समाचार पढ़ने लगीं. तभी कुछ छात्रों ने स्मिता से उनकी फिल्म में काम करने का अनुरोध किया. पुणे फिल्म संस्थान के ये छात्र डिप्लोमा फिल्म बना रहे थे. इनमें से कुछ स्मिता को जानते थे. 1974 में बनी इस फिल्म का नाम था तीव्र माध्यम.

टीवी पर स्मिता को समाचार पढ़ते देख चुके श्याम बेनेगल ने जब तीव्र माध्यम देखी तो पर्दे पर स्मिता को देख गहरे तक प्रभवित हुए. उन दिनो वे बच्चों की एक फिल्म चरण दास चोर बना रहे थे. उन्होंने स्मिता को इस फिल्म में राजकुमारी का किरदार निभाने को कहा. गहरी सांवली, ग्लैमर विहीन, संकोची, शर्मीली और बेहद आम सी दिखने वाली स्मिता हैरान थीं कि उनके साथ ये क्या हो रहा है.

सफर जो शुरु हुआ

वो श्याम बेनेगल को मना नहीं कर सकी. फिल्म बनने के दौरान वे श्याम बेनेगल के व्यवहार से बहुत प्रभावित हुईं. यही वजह है कि जब श्याम बेनेगल ने उन्हें अपनी फिल्म निशांत (1975) में कास्ट किया तो स्मिता खुशी खुशी राजी हो गयी. निशांत कला फिल्म थी इसको समीक्षकों ने खूब सराहा.

smita patil
स्मिता पाटिल की बोलती आंखें


पर्दे पर स्मिता की आंखों और चेहरे के भाव दर्शकों के सीधे दिल में उतर जाते थे. श्याम बेनेगल स्मिता के चेहरे की इस ताकत से अच्छी तरह वाकिफ हो चुके थे. इस बार उन्होंने स्मिता को लेकर फिल्म मंथन बनायी. यही वो फिल्म थी जिसके अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में प्रदर्शन के बाद स्मिता भारतीय और विदेशी फिल्मकारों की नजरों में चढ़ीं.

जल्द ही स्मिता को फिल्मों के ऑफर मिलने लगे और 1980 उनके लिये महत्वपूर्ण वर्ष रहा. इस साल केतन मेहता की भवनी भवई, सईद मिर्जा की अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है, मृणाल सेन की बंगाली फिल्म अकालेर सधाने, श्याम बेनेगल की भूमिका रवींद्र धर्म राज की चक्र और गोविंद निहलानी की आक्रोष में स्मिता ने काम किया.

इन सभी फिल्मों ने किसी ना किसी फिल्म समारोह में पुरूस्कार हासिल किया. आक्रोष और चक्र को तो आम दर्शकों के बीच भी सराहा गया. हांलाकि फिल्मी शब्दावली में इनमें से कोई फिल्म हिट नहीं हुई लेकिन स्मिता के चेहरे ने पर्दे पर बार बार गजब ढाया. इससे पहले इतनी विविधता का प्रदर्शन करने वाली और कोई अभिनेत्री नहीं थी.

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स्मिता पाटिल


स्मिता के बारे में कहा जाने लगा कि कला फिल्मों की तो वे महारानी हैं लेकिन कमर्शियल फिल्मों वाला ग्लैमर और अदाएं उनके पास नहीं हैं.स्मिता ने इस चुनौती को स्वीकर किया. दिले नादां (1981) से उन्होंने कमर्शियल फिल्में स्वीकारनी शुरू कर दीं, फिर बदले की आग, भीगी पलकें, नमक हलाल, शक्ति, शराबी, सितम, दर्द का रिश्ता, कयामत, हादसा, आज की आवाज, मेरा दोस्त मेरा दुश्मन, पेट पाप और प्यार जैसी फिल्मों में वो सब किया जो मसाला फिल्मों में हिरोइन को करना होता है लेकिन महत्वपूर्ण यह रहा कि इस दौर में भी वे गमन, बाजार, अर्थ, अर्ध सत्य, भूमिका, गिद्ध और मिर्च मसाला जैसी फिल्में भी करती रहीं.

कला और कमर्शियल फिल्मों का ऐसा संतुलन फिर किसी और अभिनत्री ने नहीं दिखाया. यह उनकी उपलब्धि थी कि अपने अभिनय से वे एक आम से किरदार को भी अहम बना देती थीं.

बोलती आँखे

स्मिता की आंखें उनकी जबान से ज्यादा बोलती थीं. उनकी आवाज भी बेहद खास थी. इसका एहसास स्मिता को भी था. वो अपनी आवाज को बहुत सोच समझ कर इस्तेमाल करती थीं. फिल्म बाजार के निर्दशक सागर सरहदी ने उनकी आवाज में एक नज़्म रिकॉर्ड की जिसे फ़िल्म में तो इस्तेमाल नहीं किया गया. लेकिन बाजार के गीतों के कैसेट में स्मिता की आवाज में वो नज़्म सुनी जा सकती है जो सुनने वाले के दिल को गहरी उदासी में डुबो देती है.

उदासी तो स्मिता के मन में भी थी. भीड़ में तन्हा होने की उदासी. इसी उदासी से लड़ते लड़ते वे राज बब्बर के इतने करीब पहुंच गयीं कि शादी शुदा और दो बच्चों के पिता राज से उन्होंने शादी कर ली.

हालांकि वह सब आसानी से नहीं हुआ. स्मिता को बहुत तनाव, पीड़ा और आलोचनों के गतिरोधों को पार करना पड़ा. वे मां बनना चाहती थीं और बन भी गयीं. तभी जिंदगी ने उनके कान मे कहा कि बस बहुत हुआ और फिर मौत उन्हें अपने साथ ले गयी. महज़ 31 साल मिले स्मिता पाटिल को जीने के लिए. वो अपने बच्चे को दुलार भी नहीं कर पायीं क्योंकि उसे जन्म देते ही उनकी तबियत बिगड़ने लगी और 14 दिसंबर 1986 को उनकी मौत हो गयी.

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