सरोज खानः मां स्टोव पर बर्तन में पानी भर कर ढंक देती, कहती- सो जाओ, पकेगा तो जगा दूंगी

सरोज खानः मां स्टोव पर बर्तन में पानी भर कर ढंक देती, कहती- सो जाओ, पकेगा तो जगा दूंगी
सरोज खान (Photo Credit- sarojkhanofficial/Instagram)

सरोज खान (Saroj Khan) ने बताया था कि उनकी मां स्टोव पर एक बर्तन में पानी भर कर ढंक देती थीं. बच्चों से कहती थीं कि सो जाओ, जब पक जाएगा तो जगा दूंगी. पढ़िए पूरी कहानी...

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मुंबई. सरोज खान (Saroj Khan) के पिता अविभाजित भारत में कराची में रहने वाले एक रईस हिंदू कारोबारी थे मगर विभाजन के दौरान जब वह मुंबई आए तो उनके पास सिर्फ एक चटाई थी. यहां माहिम में 1948 में सरोज का जन्म हुआ और तीन साल की उम्र से ही उन्होंने फिल्मों में बाल कलाकार के रूप में काम करना शुरू कर दिया. उनकी तीन बहनें और एक भाई था, जिनकी देखभाल सरोज के ही जिम्मे थी. उनके पिता तभी गुजर गए, जब सरोज ने होश भी नहीं संभाला था. बैकग्राउंड डांसर के रूप में काम करते हुए करीब 12 साल की उम्र में सरोज उस दौर के दिग्गज नृत्य निर्देशक बी. सोहनलाल की सहायक बन गईं. लेकिन गरीबी से पीछा नहीं छूटा.

अपने जीवन पर बनी एक डॉक्युमेंट्री द सरोज खान स्टोरी में खुद उन्होंने बताया कि घर में सुबह खाने को होता था तो शाम का पता नहीं रहता था. सरोज खान ने बताया कि उनकी मां स्टोव पर एक बर्तन में पानी भर कर ढंक देती थीं. बच्चों से कहती थीं कि सो जाओ, जब पक जाएगा तो जगा दूंगी. सरोज के अनुसार उनका एक पड़ोसी मलाबार हिल्स का रहने वाला था, जो भजिये का स्टॉल लगाया करता था. दिन भर के कारोबार के बाद वह दिन भर का बचा हुआ भजिया और ब्रेड मां को दे दिया करता था. मां इंकार करती थीं तो वह भला आदमी कहता था कि तुम भूख बर्दाश्त कर सकती हो, मगर बच्चों ने क्या गुनाह किया है. सरोज उन दिनों को याद करते हुए कहती थीं कि हम भाई-बहन प्याज के भजिये और ब्रेड खाकर बड़े हुए.

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अपने गरीबी के दिनों को ही याद करते हुए सरोज खान इस डॉक्युमेंट्री में बताती हैं कि शशि कपूर की एक फिल्म में वह ग्रुप डांसर थीं. उस दिनों उनके पास एक पैसा तक नहीं था. शशि कपूर स्टार थे. सरोज के अनुसार, ‘मैं शशि जी के पास गई और उनसे कहा कि शशि जी मेरे पास कुछ भी नहीं है. थोड़ी देर पहले ही हमारा एक ग्रुप डांस खत्म हुआ था. वह अपने मेकअप रूम में थे और मैं बिना कुछ सोचे समझे वहां चली गई. पता नहीं मेरे दिमाग में क्या चल रहा था. मैंने उनसे सीधे कह दिया कि कल दीवाली है और मेरे घर में कुछ भी नहीं है. यहां से पैसा मुझे सात दिन बाद मिलेगा. मेरी बात सुन कर उन्होंने अपने अंदाज में कहा मेरे पास सरोज जी इस वक्त दो सौ रुपये है, आप ले लीजिए. और उन्होंने तुरंत वह रुपये मुझे दे दीजिए.’ सरोज हंस कर बताती हैं कि उन दो सौ रुपयों से मेरी कितनी मदद हुई, कोई सोच नहीं सकता. लेकिन मैंने वह दो सौ रुपये मैंने शशि जी को कभी नहीं लौटाए. मैं चाहती थी कि उनका यह कर्ज, यह आशीर्वाद हमेशा मेरे साथ बना रहे.
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