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बॉलीवुड की वो महिला निर्देशक, जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बाद भी नहीं मानी हार और...

News18Hindi
Updated: December 14, 2019, 12:40 PM IST
बॉलीवुड की वो महिला निर्देशक, जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बाद भी नहीं मानी हार और...
बॉलीवुड में अभिनेत्रियों के साथ महिला निर्देशकों ने हर दम अपने काम से अपना लोहा कायम रखा.

हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) में लंबे समय तक पुरुष निर्देशकों का वर्चस्व रहा है. 70-80 के दशक में सई परांजपे, अरुणा राजे और सिमी ग्रेवाल जैसी महिला निर्देशकों को छोड़ दें तो बॉलीवुड (Bollywood) में महिला निर्देशक न के बराबर थीं.

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  • Last Updated: December 14, 2019, 12:40 PM IST
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मुंबई: भारत पुरुष प्रधान देश है. सोच कल भी कायम थी और आज भी यही सोच कायम है. हालांकि महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं, बाबजूद इसके आज भी उन्हें अपने को साबित करने के लिए लाख जतन करने पड़ रहे हैं. बॉलीवुड (Bollywood) में अभिनेत्रियों ने हर दम अपने काम से अपना लोहा कायम रखा. लेकिन उसके पीछे संघर्षों की एक लंबी कहानी रही है. हिंदी सिनेमा (Hindi Cinema) में लंबे समय तक पुरुष निर्देशकों का वर्चस्व रहा है. 70-80 के दशक में सई परांजपे, अरुणा राजे और सिमी ग्रेवाल जैसी महिला निर्देशकों को छोड़ दें तो बॉलीवुड में महिला निर्देशक न के बराबर थीं.

राह में बहुत कांटे थे. लेकिन कुछ करने ने जुनून में रात को दिन समझकर काम करने के बाद महिला फिल्म निर्देशकों ने अपनी फिल्मों से जाहिर कर दिया कि वह हर काम में पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलकर चल सकती है. फातिमा बेगम, शोभना समर्थ, जद्दनबाई ऐसी निर्देशक हैं, जिन्होंने बॉलीवुड के उस दौर में फिल्मों का निर्देशन किया जब महिलाओं का फिल्मों की दुनिया में कदम रखना भी खराब माना जाता था.

फातिमा बेगम (Fatma Begum)

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साल 1926 से फातिमा बेगम वह बॉलीवुड की पहली महिला निर्देशक थीं, जिन्होंने यह संघर्ष शुरू किया. लेकिन उनके बाद लंबे समय तक कहीं कुछ आहट सुनाई नहीं दी. उन्होंने अपने करियर की पहली फिल्म 'वीर अभिमन्यू' बनाई. इस फिल्म के बाद उन्होंने एक के बाद कई फिल्मों का निर्देशन किया. बुलबुल-ए-परिस्तान (1926), गॉडेस ऑफ लव (1927), हीर रांझा (1928), चन्द्रावली (1928), शकुन्तला (1929), मिलन (1929), कनकतारा (1929). जिस दौर में इन्होंने फिल्म बनाई, उस दौर में महिलाओं पर हमारा समाज काफी प्रतिबंध लगाकर रखता था. 1926 के बाद फातिमा ने अगले चार सालों में कई फिल्मों की कहानियों को लिखा और निर्देशित किया. उन्होंने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस खोला, जिसका नाम 'फातिमा फिल्म्स' रखा गया.

जद्दनबाई (Jaddanbai)

Bollywood, female director, Fatma Begum, Jaddanbaiजानी-मानी हिंदी अभिनेत्री नरगिस की मां और संजय दत्त की नानी जद्दनबाई वह नाम जो अपने जमाने में बड़ी कलाकार थीं और फिल्मों के हर फन में माहिर थीं. जद्दनबाई एक साहसी और सशक्त महिला थीं. काफी संघर्ष करने के बाद जद्दनबाई मुंबई फिल्म इंडस्ट्री की सबसे बड़ी नाम बनीं. 1935 में उन्होंने संगीतकार की भूमिका निभाते हुए 'तलाशे हक' में अपना जौहर दिखाया. 1936 में 'मैडम फैशन', 1936 में एक अन्य फिल्म 'हृदय मंथन', 1937 में 'मोता का हार', इसी साल एक अन्य फिल्म 'जीवन स्वप्न' में उन्होंने अपने निर्देशन से लोगों का दिल जीत लिया. नरगिस के पिता 'मोहन बाबू' ने जद्दनबाई से शादी के लिए अपना धर्म बदल लिया था. धर्म बदलने के बाद उन्होंने अपना नाम अब्दुल रशीद रख लिया था. 'बरसात' निर्माण के दौरान ही जद्दनबाई की मृत्यु कैंसर के कारण हो गई.

शोभना समर्थ (Shobhna Samarth)

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फातिमा बेग के बाद बॉलीवुड महिला निर्देशकों में शोभना समर्थ का नाम सामने आया. रुपहले पर्दे पर अपनी सौम्य और दमदार अभिनय से अमिट छाप छोड़ने वाली अभिनेत्री शोभना समर्थ ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया. वह मराठी कला प्रेमी परिवार से थी. फिल्म में बतौर अभिनय की शुरुआत उन्होंने 1935 से की थी. लेकिन बतौर फिल्म निर्देशक की भूमिका साल 1950 में आई फिल्म 'हमारी बेटी' से किया. इस फिल्म के 10 सालों को बाद यानि 1960 में 'छबीली' फिल्म का निर्देशन किया. इस फिल्म में उनकी बेटी नूतन और तनूजा ने शानदार अभिनय किया.

सई परांजपे (Sai Paranjpye)

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सई परांजपे को उन चुनिंदा फिल्म निर्देशकों में गिना जाता है, जिन्होंने आर्ट सिनेमा की गरिमा को बनाए रखा. उनका जन्म 19 मार्च 1938 को मुंबई में हुआ था. सई परांजपे ने जानदार मुद्दों को कभी संवेदनशील तरीके से तो कभी रोमांचक अंदाज में पेश किया. स्पर्श, चश्मे बद्दूर, कथा, साज, दिशा वो फिल्में हैं, जिन्होंने बॉलीवुड में अपना अलग आयाम कायम किया. उन्होंने कई मराठी नाटकों को लिखा और निर्देशित किया है. उन्होंने कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार अपने नाम किए. भारत सरकार ने सई परांजपे को उनकी कलात्मक प्रतिभा की पहचान के लिए साल 2006 में पद्म भूषण उपाधि से भी सम्मानित किया.

अरुणा राजे (Aruna Raje)

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अरुणा राजे का जन्म साल 1946 में हुआ, जिन्होंने हिंदी सिनेमा में अपने निर्देशक और संपादक से अलग आयाम स्थापित किया. 1976 में उन्होंने फिल्म 'शक', साल 1980 में 'गहराई' और 1982 में फिल्म 'सितम' का सह-निर्देशन अपने पति विकास देसाई के साथ किया. शादी ज्यादा दिनों तक नहीं चल सकी और दोनों ने तालाक ले लिया. लंबे समय के बाद उन्होंने 1988 में फिर से फिल्मी दुनिया में वापसी की और फिल्म 'रिहाई' का निर्देशन किया. 1992 में फिल्म 'पतित पवन', 1993 में 'शादी या...' जो की एक टीवी सीरीज थी. 1996 में भैरवी, 2004 में तुम, 2019 में फायरब्रांड का निर्देशन किया है.

कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है. अरुणा राजे के बाद बॉलीवुड में तमाम वह महिला निर्देशक आईं, जिन्होंने अपने काम से लोगों की बोलती बंद कर दी. जोया अख्तर की 2019 में आई 'गली बॉय' को ऑस्कर के लिए नॉमिनेट किया गया है. उन्होंने साल 2009 में लक बाई चांस, 2011 में जिन्दगी फिर न मिलेगी दोबारा, 2015 में दिल धड़कने दो जसी शानदार फिल्मों का निर्देशन किया. मेघना गुलजार की आने वाली फिल्म 'छपाक' ,  2018 में 'राजी', 2015 में आई 'तलवार' आदि कई फिल्मों से उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा दुनिया से मनावाया. इसके साथ ही दीपा मेहता, कल्पना लाजमी, अपर्णा सेन, पूजा भट्ट, जोया अख्तर, फराह खान कई महिलाओं ने अपने नाम बॉलीवुड की महिला निर्देशक के तौर दर्ज करा लिए हैं.

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First published: December 14, 2019, 12:40 PM IST
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