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Sharmaji Namkeen Review: परेश रावल कुछ भी बन सकते हैं, ऋषि कपूर भी

शर्माजी नमकीन बॉलीवुड की ऐसी पहली फिल्म में जिसमें एक किरदार को दो एक्टर्स ने निभाया है.

शर्माजी नमकीन बॉलीवुड की ऐसी पहली फिल्म में जिसमें एक किरदार को दो एक्टर्स ने निभाया है.

Sharmaji Namkeen Review: फिल्म फैमिली एंटरटेनर है. इसलिए देखी जानी चाहिए और ऋषि कपूर के चाहने वालों के लिए ऋषि कपूर के ...अधिक पढ़ें

ऋषि कपूर हिंदी फिल्मों के एक बेहद सफल अभिनेता थे. अपने पिता ख्यातनाम निर्माता निर्देशक राज कपूर की छाया से अलग उन्होंने अपने लिए बतौर अभिनेता एक बेहतरीन मुकाम बनाया था. कुछ सालों तक वो परदे पर कम नजर आये क्योंकि उनकी उम्र रोमांटिक हीरो बनने की बची नहीं थी और वो बूढ़े का रोल करने को दिल से तैयार नहीं थे. उनके बेटे रणबीर कपूर के सिनेमा में पदार्पण के बाद, काम करने की उनकी ललक फिर से जाग उठी और उन्होंने फिल्मों में नए किस्म के किरदार निभाना शुरू किये जो हीरो के तो नहीं थे लेकिन वो किरदार इतने सशक्त थे कि फिल्म के बाद ऋषि कपूर के रोल की चर्चा ज़्यादा होती थी बनिस्बत हीरो के. ऋषि कपूर को कुछ अरसा पहले कैंसर की बीमारी हुई, सपरिवार वो इलाज करवाने अमेरिका भी गए लेकिन वो इस बीमारी से बच नहीं पाए. बीमारी में भी उनके दिमाग में एक ही बात चलती रहती थी कि ठीक हो गया तो काम तो मिलेगा न, और मिलेगा तो किस तरह का मिलेगा. ऐसे लड़ाके ऋषि कपूर की आखिरी फिल्म ‘शर्माजी नमकीन’ हाल ही में अमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई. ऋषि कपूर की मृत्यु इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही हो गयी थी तो इस अधूरी फिल्म को पूरा करने के लिए संपर्क किया गया एक और सुप्रसिद्ध अभिनेता परेश रावल को. ये उनका बड़प्पन था कि उन्होंने इस फिल्म को पूरा करने में मदद करने का फैसला किया और ऋषि कपूर के बचे हुए सीन्स उन्होंने पूरे किये. एक ही फिल्म में एक रोल को दो अभिनेता निभाए, ऐसा कम होता है लेकिन शर्माजी नमकीन में हुआ और परेश रावल ने इतनी सहजता से ऋषि कपूर के रोल के बचे हुए सीन निभाए कि दर्शकों को कमी महसूस नहीं हुई. ये फिल्म वैसे तो ऋषि कपूर की आखिरी फिल्म है लेकिन इस फिल्म में ट्रिब्यूट जो परेश रावल ने दिया है वो कोई और दे नहीं सकता था.

शर्माजी नमकीन एक बड़ी ही मीठी सी फिल्म है. एक शख्स जिसे समय से पहले रिटायरमेंट थमा दिया गया हो, वो खाली समय में क्या करे? एक मित्र के कहने पर महिलाओं की किटी पार्टी में खाना बनाने का काम कर लेते हैं. महिलाओं को खाना बहुत पसंद आता है तो शर्मा जी को कैटरिंग का काम मिलने लगता है. अपने दोनों बेटों से छुपा कर वो ये काम करते हैं. एक बार उनके बेटे को पता चल जाता है कि शर्मा जी उनकी पीठ पीछे ये काम करते हैं तो वो नाराज़ हो जाता है. किस्मत की हवा देखिये कि शर्मा जी के बड़े बेटे की एक बिल्डर से झड़प हो जाती है अपने फ्लैट को लेकर और उसे हवालात में डाल दिया जाता है. शर्मा जी की केटरिंग की मुरीद महिलाऐं थाने पर धरना देने पहुँच जाती हैं और फिर उनमें से एक का परिचय मेयर से निकल आता है जो थाने आ कर मामले को रफा दफा करता था और फिर सब राजी ख़ुशी अपनी ज़िन्दगी में लौट आते हैं. छोटी सी प्यारी सी कहानी है. कोई नौटंकी नहीं है. कोई अश्लीलता नहीं है. कोई मार धाड़ नहीं है. कोई गाली गलौच नहीं है. आम आदमी की ज़िन्दगी की कहानी है.

ऋषि कपूर को अभिनय के लिए कोई सर्टिफिकेट तो दिया ही नहीं जा सकता. उनकी अभिनय की दूसरी पारी में उनकी क्षमता का एक अलग पहलू सामने आता है. 102 नॉट आउट हो या अग्निपथ हो या डी-डे हो, ऋषि कपूर का अभिनय बिलकुल ही अलग रंग लिए हुए हैं. शर्माजी नमकीन में उनका काम अच्छा है लेकिन वो दरअसल इस से कहीं ज़्यादा क्षमता वाले अभिनेता था. संभवतः गिरते स्वास्थ्य की वजह से उनके काम पर प्रभाव पड़ा हो, जिसमें भी संदेह ही है. ऋषि की भूमिका के कुछ सीन परेश रावल ने निभाए हैं. परेश का अपना एक अलग अंदाज है और संभवतः वो इस रोल को बिलकुल ऋषि से बिलकुल ही अलहदा तरीके से निभाते लेकिन परेश दरअसल एक मंजे हुए नाट्य कलाकार हैं. वो पानी की तरह इस रोल में हैं. जिस बर्तन में डालिये, पानी वैसा होगा. परेश की तारीफ करनी चाहिए कि उन्होंने अपने अंदाज को ऋषि कपूर के अंदाज से जुड़ा बनाने की कोशिश भी नहीं की है. ऐसा लगा ही नहीं कि सीन में परेश हैं. क्या खूबी है कि जब ऋषि सीन में हैं तो ऋषि की फिल्म और जब परेश सीन में हैं तो उनकी फिल्म. जूही चावला और शीबा चड्ढ़ा को लक बाय चांस के बाद एक बार फिर साथ देखा, अच्छा लगा. जूही का किरदार विकसित सा नहीं लगा. सतीश कौशिक को थोड़े दिन सरदार बनने के रोल्स से तौबा कर लेनी चाहिए. हर फिल्म में उन्हें पंजाबी बना दिया जाता है. बाकी कलाकार ठीक ठाक ही हैं और उनके रोल भी छोटे हैं.

कुछ चीज़ें जो निर्देशक हितेश भाटिया कर सकते थे वो थे खाने से मोहब्बत के सीन इसमें नहीं थे. खाना बनाना और खाने से मोहब्बत कर के बनाने में फर्क होता है. एक रसोइया और एक शेफ में जो फर्क होता है, उतना ही. ऋषि कपूर/ परेश रावल को खाना बनाने से मोहब्बत क्यों हुई, ये पता नहीं चलता. अंग्रेजी फिल्म शेफ हो या चीनी कम या लव शव ते चिकन खुराना, इसमें खाने को बड़े प्यार से कहानी में जोड़ा गया है. शर्माजी नमकीन में वो नमक नहीं नज़र आया जिस वजह से शर्माजी से उतनी मोहब्बत नहीं हुई जितनी होनी चाहिए थी. सुप्रतीक सेन और हितेश भाटिया ने मिलकर फिल्म लिखी है और ये बात उनकी नज़र से चूक गयी लगती है. फिल्म में कई छोटी मोटी कमियां हैं जो एक साफ़ सुथरी कहानी होने के नाते नज़रअंदाज़ की जा सकती हैं. फिल्म की शुरुआत में रणबीर कपूर ने आ कर इस फिल्म के लिए परेश रावल का धन्यवाद किया है, और अपने पिता की आखिरी फिल्म को देखने का आग्रह भी किया है. फिल्म फैमिली एंटरटेनर है. इसलिए देखी जानी चाहिए और ऋषि कपूर के चाहने वालों के लिए ऋषि कपूर के अभिनय का एक और रंग देखने का मौका है. परेश रावल के सहज अभिनय के लिए तो फिल्म देखी जानी वैसे भी बनती है.

Tags: Amazon Prime Video, Film review, Juhi Chawla, Paresh rawal, Rishi kapoor

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