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इंसाइड बॉलीवुडः फिल्मों में होती है ग्रुपबाजी लेकिन वेबसीरीज अभी इस पचड़े से है दूर

News18Hindi
Updated: December 14, 2019, 6:14 AM IST
इंसाइड बॉलीवुडः फिल्मों में होती है ग्रुपबाजी लेकिन वेबसीरीज अभी इस पचड़े से है दूर
बॉलीवुड की गुटबाजी के बारे में विस्तार से जानिए.

शिखा धारीवाल कॉलमः फिल्म जगत में जमकर गुटबाजी होती है. कंगना रनौत (Kangana Ranaut), मनोज वाजपेयी (Manoj Bajpayee) और विवेक ओबेरॉय (Vivek Oberoi) जैसे कलाकारों ने इस पर बात की. लेकिन इस दौर में भी कुछ जगहें ऐसी हैं जहां ग्रुपबाजी अभी शुरू नहीं हुई है.

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  • Last Updated: December 14, 2019, 6:14 AM IST
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मुंबई. फिल्मी दुनिया में एक्टर बनना किसी सुहाने सपने से कम नहीं है. फिल्मी एक्‍टर्स को पर्दे पर देख न जाने कितने युवा एक्टर बनने की ख्वाहिश रखते हैं जिसमें से कुछ अपनी ख्वाहिशों को दबाकर दूसरे प्रोफेशन को चुन लेते हैं. वहीं उनमें से कुछ अपने सपनो में रंग भरने के लिए मायानगरी मुंबई का रुख करते हैं. सपने बुनना आसान है, मायानगरी मुंबई आकर इन सपनों को हकीकत में तब्दील करना उतना ही मुश्किल है. इस बात का अहसास काम के लिए स्ट्रगल करते वक़्त होता है. क्योंकि अगर बॉलीवुड की बात करे तो यहां काम मिलना बहुत मुश्किल है. नए एक्टर्स को तो बड़े प्रोडक्शन हाउस के गेट पर ही एंट्री नहीं मिलती तो काम कहा से मिलेगा, हकीकत यही है. इसी हकीकत को कई बार कई नॉन फ़िल्मी बैकग्राउंड के एक्टर्स ने उठाने की कोशिश भी की है.

अभिनेत्री कंगना रनौत (Kangana Ranaut) अक्सर कहती हैं कि बॉलीवुड में नेपोटिज्म होता है. यहां लोग अपने परिवार और रिश्तेदारों को ऐसा सेट करने में लगे रहते हैं कि बाहर वालों को अपनी फिल्मों में मौका ही नहीं देते. वैसे सिर्फ कंगना ही नहीं अब कंगना की इस बात से बॉलीवुड के कई एक्टर्स इत्तेफाक रखते हैं. हाल ही में मनोज वाजपेयी (Manoj Bajpayee) से मेरी एक इंटरव्यू के दौरान फ़िल्मी बैकग्राउंड को लेकर चर्चा हो रही थी. इस पर मनोज वाजपेयी ने बताया था कि बॉलीवुड में आपको आउटसाइडर का टैग हटाने के लिए बड़े-बड़े एक्टर्स के तलवे चाटने पड़ते हैं. तब वह अपने ग्रुप में शामिल करते हैं.

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मनोज बाजपेयी ने खुलकर अपनी बात रखी है.


वही यह बात हाल ही में कई एक्टर्स ने बातचीत के दौरान बताया कि एक्टर, प्रोड्यूसर और डायरेक्टर्स के ग्रुप में शामिल होने और उनकी पार्टी में जाने से यह फायदा होता है कि चेहरा नज़रों में बना रहता है. जब कोई आपके मुताबिक रोल आता है तब आपको कई बार कंसीडर भी कर लिया जाता है. फिल्मों में लोग अजनबी की अपेक्षा जानने वाले को रोल पहले ऑफर करते हैं. शायद यही वजह है कि वेब सीरीज में काम कर रहे नए एक्टर्स से जब इस बारे में चर्चा होती है तो वह अक्सर यही कहते हैं कि पहले फिल्मों में कोशिश की मगर वहां काम नहीं मिला, लेकिन यहां आसानी से मिल गया क्योंकि वेब सीरीज और डिजिटल कंटेंट में सिफारिश की जरूरत नहीं पड़ती.

हाल ही में मेरी मुलाकात विवेक ओबरॉय (Vivek Oberoi) से हुई. आजकल वह भी वेब सीरीज कर रहे हैं. विवेक से बातों ही बातों में मैंने पूछा कि फिल्मों में तो ग्रुपबाजी होती है और डिजिटल में भी ऐसा होता है क्या? मेरे इस सवाल पर विवेक ने तपाक से कहा थोड़ी नहीं, फिल्म इंडस्ट्री में बहुत ज्यादा गुटबाजी होती है. इसकी वजह से कुछ एक्टर्स को बहुत कुछ झेलना पड़ता है. अच्छी बात यह है कि डिजिटल मीडिया में अभी तक यह सब गंदगी नहीं है. यहां लोग नए कंटेंट और टेलेंट को तवज्जो दे रहे हैं.

विवेक ओबेरॉय


अब आप सोचिए इंडस्ट्री में इतने साल काम कर चुके ये एक्टर्स अगर अभी भी ग्रुपबाजी का शिकार हैं तो ऐसे में नए-नवेले एक्टर्स किस तरह की दिक्कतों का सामना करते होंगे. अच्छी बात यह है कि डिजिटल माध्यम बांहें पसारे टैलेंट को बुला रहा है तो वही ग्रुपबाजी करने वाली टोली को मेरी सलाह है ग्रुपिंग की बजाय आउटसाइडर टैलेंट पर भी वक़्त रहते ही ध्यान दें नहीं तो न जाने कब कौन सी नई कंगना सरेआम इस टोली की बोलती बंद कर दे.

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First published: December 14, 2019, 6:14 AM IST
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