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शिखा धारीवाल का कॉलमः जानिए कैसे राजनीति तय कर रही है बॉलीवुड एक्टर्स के काम

शिखा धारीवाल के कॉलम में बॉलीवुड के अंदर की कहानियां.

हाल ही में मेरी नसीरुद्दीन शाह (Naseeruddin Shah) से मुलाक़ात हुई तो मैंने उनसे पूछा कि इन दिनों आप बड़े पर्दे पर कम क्यों नज़र आते हैं? उनका जवाब चौकाने वाला था।

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    बॉलीवुड की मायानगरी देखने और सुनने में काफ़ी ग्लैमरस लगती है. इसका प्रमाण हर दिन मुंबई आने वाले वे हज़ारों युवा हैं जो फ़िल्म इंडस्ट्री में अपना भाग्य आज़माना चाहते हैं. लेकिन यहां आने के बाद उन्हें अहसास होता है कि फ़िल्म इंडस्ट्री जितनी लुभावनी बाहर से दिखती है, हक़ीक़त में उस दुनिया से काफ़ी अलग है. एक्टर बनने की ख़्वाहिश लिए दर-दर भटकने के बाद जब काम नहीं मिलता तो डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं. कई बार यही युवा डिप्रेशन में रास्ते से भटक कर ग़लत रास्ता तक चुन लेते हैं.

    फ़िल्म इंडस्ट्री में स्ट्रगल करने वाले हर शख़्स की क़िस्मत शाहरुख़ खान जैसी नहीं चमकती. एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीक़ी को भी एक दशक से ज़्यादा स्ट्रगल करने के बाद जाकर सफलता हाथ लगी थी.

    कई बार मुंबई में स्ट्रगल कर रहे मॉडल और जूनियर एक्टर्स से मुलाक़ात होती है तो वे कहते हैं कि फ़िल्म इंडस्ट्री में काम के लिए टैलेंट होना महज़ काफ़ी नही है. टैलेंट के साथ-साथ नेटवर्किंग होनी ज़रूरी है. अगर लोग आपको जानते हैं तभी काम मिलता है, क्योंकि आजकल बॉलीवुड में कई खेमे हैं. कई प्रोड्यूसर और डायरेक्टर्स के ग़्रुप हैं. अगर आपकी पटरी किसी फ़िल्म निर्माता-निर्देशक के खेमे में जम गई तो काम मिलने में क़तई दिक्कत नहीं होती. बल्कि सच कहें तो बड़ी आसानी से काम मिलने लगता है. लेकिन बॉलीवुड में एक नया दौर आया है. इसमें नए एक्टर्स नहीं सीनियर एक्टर्स परेशान हैं. अचानक से कई सीनियर एक्टर्स को काम मिलना कम हो गया है. जानिए इसके पीछे की पूरी सच्चाई.

    naseeruddin shah
    नसीरुद्दीन शाह को बीते तीन सालों में महज तीन-चार फिल्में ही ऑफर की गई हैं.


    नसीरुद्दीन शाह के पास नहीं आ रहे निर्माता-निर्देशक
    हाल ही में मेरी नसीरुद्दीन शाह से मुलाक़ात हुई तो मैंने उनसे पूछा कि इन दिनों आप फ़िल्मों में नज़र नहीं आते? इस पर नसीरुद्दीन शाह ने हंसते हुए कहा कि मुझे अब कोई फ़िल्मों में काम नहीं देता. इसलिए बड़े पर्दे पर नज़र नहीं आता. नसीर साहब यह बात कहते हुए हंस रहे थे. मुझे लगा कि शायद वह मेरे साथ मज़ाक़ कर रहे है. इसलिए मैंने तपाक से पूछा, बताइए असल वजह क्या है? फ़िल्मों में रोल मन मुताबिक़ नहीं मिल रहे या स्क्रिप्ट पसंद नहीं आ रही?
    इन सवालों पर गम्भीरता से जवाब देते हुए नसीरुद्दीन शाह ने कहा, 'बोला तो मुझे कोई काम नहीं देता. पिछले कई सालों में मुझे फ़िल्म इंडस्ट्री से दो-चार ऑफ़र आए हैं. वो ऑफ़र भी कुछ ख़ास नहीं थे. सच कहूं तो मुझे अब बंबई में बनने वाली फ़िल्मों में कोई दिलचस्पी नहीं है. अब मैं शॉर्ट फ़िल्मों और नाटक पर ध्यान दे रहा हूं और जल्द एक शॉर्ट फ़िल्म बनाना चाहता हूं.

    काम के लिए करनी होती है जी-हजूरी
    हालांकि यह बात इतनी बड़ी शख़्सियत ने इतनी आसानी से कह दी लेकिन यह बात मुझे कचोट रही है. शायद यह कॉलम पढ़ने के बाद आपको भी हैरानी होगी कि इतने सीनियर और बेहतरीन कलाकार को भी अगर फ़िल्म निर्माता अप्रोच नहीं करते तो क्या सिनेमा माडर्न ट्रेंड के चक्कर में गर्त की तरफ़ है? क्या वाक़ई बॉलीवुड में पॉलिटिक्स इतनी हावी हो चुकी है कि कलाकार को भी अब कला की नहीं बल्कि काम के लिए हर बात पर जी-हज़ूरी करनी होगी? अगर कलाकार जी-हजूरी करने में नाकामयाब है तो उसे काम मिलना कम हो जाता है.

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    सिनेमा की क्रिएटिविटी में अगर राजनीति हावी होने लगे तो सिनेमा फिर कला का मंच नहीं बल्कि राजनीति का मंच बन जाएगा. लेकिन सच कहें तो बीते कुछ सालों से बॉलीवुड का रुझान वाक़ई राजनीति की तरफ़ कुछ ज़्यादा ही है. हिंदी फ़िल्में ज़्यादातर साउथ या हॉलीवुड की फ़िल्मों की रीमेक बनती हैं. कभी-कभार किसी सच्ची घटना पर फ़िल्म बनती भी है तो उसमें भी कई लोग कहानी की चोरी का एक -दूसरे पर आरोप लगाते हुए आपस में क़ानूनी लड़ाई लड़ते नज़र आते हैं.

    naseeruddin shah
    अब नसीरुद्दीन शाह शॉर्ट फिल्मों का रुख कर चुके हैं.


    बॉलीवुड में अब काम गुटबाज़ी में मिलता है
    मेरी बॉलीवुड के कई सीनियर एक्टर्स से इस बारे में चर्चा हुई तो वे भी यही कहते हैं कि अच्छी कहानी हमारे पास आती नहीं. इन दिनों बॉलीवुड में अच्छी कहानियां कम लिखी जाती हैं और अगर कहानियां हैं भी तो कास्टिंग में बहुत राजनीति है. बॉलीवुड में अब काम गुटबाज़ी में मिलता है. थिएटर के कलाकार अपने हुनर के लिए मशहूर होते हैं. एक ज़माना था जब फ़िल्म निर्माता थिएटर के कलाकारों को सबसे ज़्यादा तवज्जो देते थे. अब निर्माताओं के साथ पार्टी करने, नेटवर्किंग करने और सोशल मीडिया पर सपोर्ट में ट्वीट करने वालों को ज्यादा तवज्जो दी जाती है.

    बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड और राजनेता लगा रहे हैं पैसे
    एक एक्टर ने तो दबी ज़बान में नाम ना छपने की शर्त पर चर्चा में यह भी कहा कि इन दिनों बॉलीवुड में अंडरवर्ल्ड और राजनीतिक बैकड्रॉप पर फ़िल्में बन रही हैं. ब्लैक मनी को वाइट मनी में तब्दील करने वाली फिल्में बनाई जा रही हैं. ऐसी फ़िल्मों में कहानी, कला और कलाकारों से कोई ख़ास लेना-देना नहीं होता. सिर्फ़ फ़िल्म की कहानी के हिसाब से खानापूर्ति की जाती है. इसलिए एक्टर्स के टैलेंट की क़ीमत फ़ाइनेंसर के पैसे के सामने कुछ नहीं होती.

    बॉलीवुड की अंदर की ये कहानियां यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री के निर्माता और निर्देशकों ने अगर वक़्त रहते ही हिंदी सिनेमा पर ध्यान नहीं दिया और ख़ासतौर से बॉलीवुड की युवा पीढ़ी ने कहानी सिनेमा, कला और कलाकारों की अहमियत नहीं समझी तो आने वाले समय में कही ऐसा ना हो कि हिंदी सिनेमा की पहचान धीरे-धीरे फीकी पड़ जाए. यही नहीं हिंदी सिनेमा का वजूद हॉलीवुड की बराबरी करने के बजाय रीजनल सिनेमा की तरह सिमट कर रह जाए.

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