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जन्मदिन विशेष: क्यों खामोश हो गई मशहूर गायक शैलेंद्र सिंह की आवाज?

दिल में शौक था और दिमाग में अभिनय का जुनून। चेहरा मोहरा भी हीरो बनने लायक था। इसलिए सोचा की अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग लेकर रूपहले पर्दे पर उतरा जाए, लेकिन किस्मत ने पहले ब्रेक दिया गायन के क्षेत्र में और पहले गीत ने ही तहलका मचा दिया।

दिल में शौक था और दिमाग में अभिनय का जुनून। चेहरा मोहरा भी हीरो बनने लायक था। इसलिए सोचा की अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग लेकर रूपहले पर्दे पर उतरा जाए, लेकिन किस्मत ने पहले ब्रेक दिया गायन के क्षेत्र में और पहले गीत ने ही तहलका मचा दिया।

दिल में शौक था और दिमाग में अभिनय का जुनून। चेहरा मोहरा भी हीरो बनने लायक था। इसलिए सोचा की अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग लेकर रूपहले पर्दे पर उतरा जाए, लेकिन किस्मत ने पहले ब्रेक दिया गायन के क्षेत्र में और पहले गीत ने ही तहलका मचा दिया।

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नई दिल्ली। दिल में शौक था और दिमाग में अभिनय का जुनून। चेहरा भी हीरो बनने लायक था। इसलिए सोचा की अभिनय की बाकायदा ट्रेनिंग लेकर रूपहले पर्दे पर उतरा जाए, लेकिन किस्मत ने पहले ब्रेक दिया गायन के क्षेत्र में और पहले गीत ने ही तहलका मचा दिया। ऐसी सफलता बिरलों को ही मिल पाती है, लेकिन ऐसी सफलता पाने वाला गायक धीरे-धीरे फिल्म संगीत की दुनिया में हाशिये पर ढकेल दिया गया और एक सुरीली आवाज खामोश हो गयी।

ये कहानी है बॉबी फेम शैलेंद्र सिंह की। 4 अक्टूबर 1952 को मुंबई में जन्मे शैलेंद्र के पिता वी शांता राम के असिस्टेंट थे। उन्होंने कुछ फिल्मों में शौकिया अभिनय भी किया। जबकि शैलेंद्र की मां निर्मला सिंह शास्त्रीय गायिका थीं। बचपन में मां से प्रभावित हो कर शैलेंद्र भी गीत गुमगुनाने लगे। अपने स्कूल के सांस्कृतिक कार्यक्रम में शैलेंद्र हर साल गायन और अभिनय की ट्रॉफी जीतते थे।

मां को एहसास हो गया कि बेटे में प्रतिभा है, उन्होंने शैलेंद्र को उस्ताद छोटे इकबाल के पास संगीत की तालीम के लिए भेजना शुरू कर दिया। गायकी में प्रशक्षित होने के बावजूद शैलेंद्र को गायन से अधिक रूपहले पर्दे पर उभरते हुए चेहरे आकर्षित करते थे। जवानी की दहलीज पर कदम रखने से पहले ही शैलेंद्र घंटों आइने के सामने खड़े होकर संवाद बोलते और अभिनय करते।

पिता ने अभिनय को लेकर उनके जुनून को देखते हुए शैलेंद्र सिंह का पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला करवा दिया। शैलेंद्र सिंह के सपनों को पंख लगने लगे। शैलेंद्र पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से पास होने ही वाले थे कि किस्मत ने करवट बदली। राजकपूर के लिए स्क्रिप्ट लिखने वाले वी पी साठे शैलेंद्र सिंह के पिता के दोस्त थे। एक दिन उन्होंने बताया कि राजकपूर अपने बेटे ऋषि कपूर को फिल्म बॉबी के जरिए लांच कर रहे हैं और उन्हें ऋषि के लिए नई आवाज़ चाहिए। साठे शैलेंद्र सिंह को कई बार गाते हुए सुन चुके थे। उन्होंने शैलेंद्र को पूना से मुंबई बुलवाया और राजकपूर से मिलवाया। शैलेंद्र की आवाज़ सुनकर राजकपूर ने फैसला लिया कि बॉबी मे ऋषि कपूर को शैलेंद्र सिंह ही आवाज देंगे।

जब बॉबी के गाने रिलीज हुऊ तो देशभर में तहलका मच गया। शैलेंद्र सिंह की युवा और ताजगी से भरी आवाज खासियत यह थी कि इससे पहले किसी गायक की ऐसी आवाज नहीं सुनी गयी थी। शैलेंद्र सिंह पहली फिल्म से ही सुपरहिट हो गए फिर तो उन्हें गानों के इतने प्रस्ताव मिले कि उन्हें सांस लेने की फुर्सत नहीं रही। 'हमने तुमको देखा तुमने हमको देखा' (खेल खेल में), होगा तुमसे प्यारा कौन (जमाने को दिखाना है), तुमको मेरे दिल ने (रफ्फूचक्कर) कई दिन से मुझे कोई सपनो में (अंखियों के झरोखे से) जैसे गीत आज भी पसंद किए जाते हैं। लेकिन शैलेंद्र को याद था कि उन्हें अपना अभिनय का कोर्स, पूरा करना है इसलिए वो किसी तरह समय निकालकर पूना पहुंचे और अपना कोर्स पूरा किया।

इस बीच शैलेंद्र सिंह के मन में अभिनय को लेकर छटपटाहट बाकी थी। अभिनय उनका पहला प्यार था। एक दिन उन्हें आर के स्टूडियो में राजेंद्र कुमार मिल गए। वो जानते थे कि शैलेंद्र पूना फिल्म इंस्टीट्यूट से पास आउट हैं। राजेंद्र कुमार के बड़े भाई राजकपूर और राजेंद्र कुमार को लेकर फिल्म 'दो जासूस' बना रहे थे उस फिल्म में उन्हें एक नए चेहरे की जरूरत थी। राजेंद्र कुमार ने वो फिल्म शैलेंद्र को दिलवा दी। फिल्म तो खास नहीं चली, लेकिन शैलेंद्र को जहरीली, जनता हवलदार, नौकर और एग्रीमेंट सहित कुछ फिल्मों में काम करने का मौका मिला। येह इत्तेफाक रहा कि जनता हवलदार को छोड़ शैलेंद्र की कोई भी फिल्म हिट नहीं हो सकी। इस बीच उनके पास गीत गाने के प्रस्ताव बढ़ते जा रहे थे। शैलेंद्र ने सारा ध्यान गायन पर केंद्रित कर लिया और अभिनय का जुनून कमजोर पड़ता चला गया। लेकिन तिकड़मबाजी से दूर रहने वाले सरल मिजाज शैलेंद्र सिंह को फिल्मी

दुनिया की राजनीति का जरा भी एहसास नहीं था। धीरे-धीरे उन्हें हैरत में डालने वाली जानकारियां मिलनी शुरू हुई। दरअसल कुछ गीत जो शैलेंद्र से गवाए गए और कुछ गीत जिन्हें गाने का अनुबंध शैलेंद्र ने किया था वो दूसरे गायकों से गवा लिए गए। उदाहरण के लिए जहरीला इंसान का सुपरहिट गीत “ ओ हंसनी मेरी हंसनी कहां उड़ चली “ शैलेंद्र सिंह को गाना था, लेकिन उसे किशोर कुमार से गवा लिया गया। यही हाल फिल्म राजा का हुआ। इसके दो गीत जो शैलेंद्र को गाने थे किशोर कुमार से गवा लिए गए और तो और ऋषिकपूर और डिंपल कपाड़िया की फिल्म सागर के गीत शैलेंद्र को गाने थे। इस फिल्म का प्रीमियर शालेंद्र के ही गाए गीत “पास आओ ना”  से हुआ लेकिन बाकी के गीतों में किशोर की आवाज थी।

इस बीच शैलेंद्र सिंह ने कई नए संगीतकारों को मौके दिलवाए, लेकिन सफळ होने पर उन लोगों ने कभी शैलेंद्र को गाने का मौका नहीं दिया। 1973 से शुरू हुआ उनका गायन के सफर में 1987 तक ठहराव आने लगा। इस दौरान उन्होंने लगभग 75 फिल्मों में अपनी आवाज दी। शैलेंद्र कभी किसी के पास काम मांगने नहीं गए। उसी दौर में ये अफवाह उड़ा दी गयी कि शैलेंद्र सिंह के दिल का ऑपरेशन हुआ है और अब वो गाने नहीं गा सकते। इसी बीच उन्हें टेलीफिल्मों में संगीत देने का मौका मिला तो उन्होंने कई टेली फिल्मों में संगीत दिया और इसी काम में व्यस्त हो गए। इस व्यस्तता से शैलेंद्र बाहर निकले तो उन्होंने पाया कि जमाना बड़ी तेजी से बदल चुका है। फिल्मों में बढ़ती हिंसा ने संगीत को हाशिये पर ढकेल दिया है। तभी शैलेंद्र के मन में फिल्म बनाने का ख्याल आया और उन्होंने सचिन को लेकर एक मराठी फिल्म बनायी तो ठीक ठाक चली।

शैलेंद्र सिंह ने फिल्मी दुनिया में लंबा समय गुजार लिया था। शोहरत, इज्जत और दौलत का दौर देख लिया था। करीबियों के धोखे, ईर्ष्या और जलन की चालें, गंदी राजनीति सब कुछ झेल चुके थे। 90 के दशक में उन्होंने खुद को परिवार तक सीमित कर लिया। 2004 में दबाव डाल कर एकता कपूर ने अपने दो धारावाहिकों में उनसे अभिनय भी करवाया, लेकिन जितेंद्र से पारीवारिक संबंधों की वजह से शैलेंद्र सिंह ने काम किया अन्यथा अभिनय से उनका दिल उचट चुका था और गाने के प्रस्ताव मिलना बंद हो गए। हम तुम एक कमरे में बंद हों, मैं शायर तो नहीं, झूठ बोले कौवा काटे, जैसे गीतों से सारे देश को हिला देने वाला ये गायक अब ज्यादातर खामोश ही रहता है।

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