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असूसजा बोले- ‘नया दौर’ से ‘भुज’ तक, राष्ट्रवाद के अर्थ के साथ बदल गया है देशभक्ति का कथानक

इतिहासकार एस एम एम असूसजा ने कहा कि, राष्ट्रवाद के विचार को कमजोर किया गया है.

इतिहासकार एस एम एम असूसजा ने कहा कि, राष्ट्रवाद के विचार को कमजोर किया गया है.

फिल्म आलोचक अजय ब्रह्मात्मज (Ajay Brahmatmaj) ने कहा कि बॉलीवुड में देशभक्ति वाली फिल्मों में बदलाव दिखता है. ‘हमने ‘शेर शिवाजी’ में शिवाजी महाराज जैसे महापुरुषों पर बनी फिल्में देखी हैं. आज राष्ट्रवाद को नये सिरे से दिखाया जाता है और इसका भाजपा के साथ मेल सा हो गया है.'

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    मुंबई. देश में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर देशभक्ति वाली फिल्मों को रिलीज करने का चलन लंबे समय से है. इस वर्ष भी जाने माने अभिनेताओं की देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत फिल्में प्रदर्शन के लिए तैयार हैं. धर्मा प्रोडक्शन की ‘शेरशाह’ (Shershaah), अजय देवगन की ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ (Bhuj The Pride of India) और अक्षय कुमार की ‘बेलबॉटम’ इस सप्ताह रिलीज हो रही हैं. इन फिल्मों में भी देश से जुड़े सरोकार हैं, लेकिन ये फिल्में 50 और 60 के दशक में आईं ‘नया दौर’ (Naya Daur), ‘उपकार’ और ‘शहीद’ से काफी अलग हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम तथा किसानों से जुड़े मुद्दों पर केन्द्रित थीं.

    फिल्म इतिहासकार एस एम एम असूसजा कहते हैं, ‘पहले की फिल्में दिखाती थीं कि भारत ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई किस प्रकार से लड़ी, किस प्रकार से नए भारत को प्रगति के लिए समाजवाद, समानता, धर्मनिरपेक्षता की जरूरत थी. लेकिन अब ये बातें पीछे रह गई हैं. देशभक्ति का कथानक राष्ट्रवाद के अर्थ के साथ बदल गया है.’

    70 के दशक में ‘पूरब और पश्चिम’, ‘रोटी कपड़ा और मकान’ और ‘बलिदान’ जैसी फिल्में आईं, अनेक कलाकारों वाली ये फिल्में भारतीय संस्कृति और उस पर मंडरा रहे खतरे पर केंद्रित थीं. 80 के दशक में आई फिल्म ‘क्रांति’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम का एक काल्पनिक चित्रण पेश करती थी, वहीं ‘जाने भी दो यारो’ और ‘अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ व्यंग्य वाली फिल्में थीं, तो ‘अर्द्ध सत्य’ सभी क्षेत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर आधारित थी और पूंजीवाद पर प्रहार करती थी. 90 के दशक के अंत और 2000 के दशक की शुरुआत में ‘बॉर्डर’, ‘लक्ष्य’ और ‘गदर’ जैसी फिल्में आईं जिन्होंने जनता का खूब दिल जीता.

    यह थोपे गए राष्ट्रवाद से उपजे विमर्श जैसा बन गया है: असूसजा
    इतिहासकार एस एम एम असूसजा ने कहा कि, पिछले कुछ वर्षों में ऐसे लोगों पर फिल्में बनीं जिन्होंने देश की रक्षा के लिए और प्रगति के लिए उल्लेखनीय कार्य किए, लेकिन जिनके नाम गुमनाम ही रहे. इनमें ‘राजी’, ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’, ‘मिशन मंगल’, ‘पैडमैन’ आदि प्रमुख हैं. असूसजा ने ‘पीटीआई-भाषा’ से बातचीत में कहा, ‘यह थोपे गए राष्ट्रवाद से उपजे विमर्श जैसा बन गया है. यह सिर्फ यहां तक सीमित नहीं है कि इसरो कितना अच्छा काम कर रहा है, या कोई अन्य भारतीय पर बनी बायोपिक तक ही सीमित नहीं है. यह इस बात का भी जश्न है कि वर्तमान सरकार क्या कर रही है. यह जानबूझ कर राष्ट्रवाद से जोड़ा गया है. राष्ट्रवाद के विचार को कमजोर किया गया है.’

    फिल्म आलोचक अजय ब्रह्मात्मज का भी मानना है कि बॉलीवुड में देशभक्ति वाली फिल्मों में काफी परिवर्तन आया है. उन्होंने ‘पीटीआई भाषा’ से कहा, ‘हमने ‘शेर शिवाजी’ में शिवाजी महाराज जैसे महापुरुषों पर बनी फिल्में देखी हैं. यह भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का विषय है. आज राष्ट्रवाद को नये सिरे से दिखाया जाता है और इसका राजनीतिक दल भाजपा के साथ मेल सा हो गया है.’

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