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शारदा: एक गुमनाम गायिका, जो हो गई फिल्मी राजनीति का शिकार! 

तितली उड़ी, उड़ जो चली फूल ने कहा आजा मेरे पास तितली कहे मैं चली आकाश’, फिल्म सूरज (1969) का ये गीत 44 साल पहले जब शारदा ने गाया तो भला किसे एहसास था कि आने वाली कई पीढ़ियों के बच्चे इस गाने को गुनगुनाते हुए बड़े होंगे।

तितली उड़ी, उड़ जो चली फूल ने कहा आजा मेरे पास तितली कहे मैं चली आकाश’, फिल्म सूरज (1969) का ये गीत 44 साल पहले जब शारदा ने गाया तो भला किसे एहसास था कि आने वाली कई पीढ़ियों के बच्चे इस गाने को गुनगुनाते हुए बड़े होंगे।

तितली उड़ी, उड़ जो चली फूल ने कहा आजा मेरे पास तितली कहे मैं चली आकाश’, फिल्म सूरज (1969) का ये गीत 44 साल पहले जब शारदा ने गाया तो भला किसे एहसास था कि आने वाली कई पीढ़ियों के बच्चे इस गाने को गुनगुनाते हुए बड़े होंगे।

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नई दिल्ली। ‘तितली उड़ी, उड़ जो चली फूल ने कहा आजा मेरे पास तितली कहे मैं चली आकाश’, फिल्म सूरज (1969) का ये गीत 44 साल पहले जब शारदा ने गाया तो भला किसे एहसास था कि आने वाली कई पीढ़ियों के बच्चे इस गाने को गुनगुनाते हुए बड़े होंगे। फिल्मी दुनिया को शारदा के रूप में एक कमसिन ओर शोख़ सी आवाज अचानक ही मिली। शारदा के साथ हुए एक इत्तेफाक ने उन्हें ऐसा मौका दिया जिसका वो सिर्फ़ सपना देखा करती थीं। उन दिनों वो अपने परिवार के साथ तेहरान में थीं। वहां एक समारोह में उन्हें राजकपूर ने गाते हुए सुना।

उच्चारण में हल्के से दोष के बावजूद राज साहब को उनकी आवाज बहुत पसंद आई। कुछ समय बाद जब शारदा मुंबई पहुंचीं तो ये जान कर खुशी का ठिकाना ना रहा कि राजकपूर उन्हें भूले नहीं थे। उन्होंने शारदा से एक गीत गवाया जो सबको बहुत पसंद आया। शंकर- जयकिशन की जोड़ी के शंकर ने शारदा की शोख़ और कमसिन आवाज़ का इस्तेमाल अपने संगीत में एक अलग शेड देने के लिए करने का मन बना लिया।

फिर वो दिन भी आया जब शंकर जयकिशन के संगीत में शारदा ने फ़िल्म सूरज के तितली उड़ी के अलावा एक और गीत ‘देखो मेरा दिल मचल गया’ गाया। जिसने भी ये गीत सुने वो शारदा की आवाज़ पर फ़िदा हो गया। लेकिन ये इत्तेफ़ाक़ था कि सूरज से पहले मनोज कुमार-नंदा स्टारर फ़िल्म गुमनाम रिलीज़ हो गयी। इसमें शारदा का मोहम्मद रफ़ी के साथ गाया गीत ‘जाने चमन शोला बदन पहलू में आ जाओ’ भी शामिल था।

गुमनाम के गीत जब सुने गए तो शारदा की आवाज़ का कोई ख़ास नोटिस नहीं लिया गया, लेकिन सूरज के गानों की शोहरत ने शारदा को रातों रात स्टार बना दिया। आलम ये हुआ कि उस साल फ़िल्म फेयर अवॉर्ड के लिए तिलती उड़ी और रफी के गाए गीत ‘बहारों फूल बरसाओं’ को बराबर बराबर वोट मिले।

उन दिनों प्लेबैक सिंगर की कैटगिरी में पुरूष और महिला आवाजों के लिए एक ही अवॉर्ड होता था। उस साल अवॉर्ड को मोहम्मद रफी को मिला, लेकिन शारदा को स्पेशल अवॉर्ड दिया गया। इसके साथ ही शारदा ने इतिहास रच दिया क्योंकि अगले साल से फ़िल्म फेयर ने पुरूष और महिला गायकों के लिए अलग-अलग अवॉर्ड देना शुरू कर दिया।

1967 में शंकर जयकिशन के संगीत से सजी फ़िल्म आई अराउंड द वर्ल्ड। शारदा की अवाज के जादू ने सबको फिर कायल कर दिया। गीत था ‘चले जाना ज़रा ठहरो किसी का दम निकलता है – ये मंजर देखते जाना ’। शारदा के गाए गीतों की

तारीफ तो हुई मगर उनकी आवाज़ की आलोचना भी होने लगी। कहा गया कि शारदा की आवाज़ अनगढ़ और कच्ची है,  लेकिन शंकर ने किसी आलोचना पर ध्यान नहीं दिया, वो शारदा को लगातार मौक़े देते रहे। उनके भरोसे ने रंग दिखाया और जिस दौर में लता, आशा भोसले और सुमन कल्याणपुर ज़्यादातर हिरोइन के लिए गाने गा रही थीं उसी दौर की फ़िल्म ‘जहां प्यार मिले’ के एक गाने के लिए शारदा को फ़िल्म फ़ेयर का अवॉर्ड मिला।

हैरत इस बात की है कि महज 20 गाना गाने के बाद फिल्मफेयर अवॉर्ड हासिल करने वाली शारदा को शंकर जयकिशन के अलावा सिर्फ उषा खन्ना ने ही मौका दिया। उस समय की ज्यादातर अभिनेत्रियां लता या आशा की आवाज में ही अपने गाने गंवाना चाहती थीं। शारदा के नाम पर ये मोहर लग गयी कि उनकी आवाज तो सिर्फ़ शंकर ही इस्तमाल करते हैं। जैसै-जैसे वक्त गुजरता गया शारदा के लिए हालात कठिन होते गए।

यहां तक की शारदा से गाने गवा लिए जाते थे, लेकिन फिल्म रिलीज़ होने तक वो गाने फिल्म से बाहर कर दिए जाते थे। फिर भी शारदा संगीत में डूबकर लगातार रियाज करती रहीं। फिल्मी दुनिया में शारदा का ना तो कोई गहरा दोस्त था ना ही सहारा सिर्फ एक शंकर थे जिनका संरक्षण उन्हें हमेशा मिलता रहा। मगर दूसरे बड़े संगीतकार गाने का मौका देने से कतराते रहे।

इस राजनीति ने शारदा को बुरी तरह परेशान कर दिया। उनकी आवाज से रंजिश रखने वाला कभी सामने नहीं आया,  इसलिए दोष भी देतीं तो किसे। लेकिन वो हारना नहीं चाहती थीं। उन्होंने नया अवतार ले लिया और ख़ुद को संगीतकार के रूप में गढ़ना शुरू किया। उन दिनों निजी गीतों का बाजार अस्तित्व में नहीं आया था फिल्मी गोतों के अलावा या तो भजन के रिकॉर्ड जारी होते थे या फिर गजल और कव्वाली के।

शारदा ने आठ पॉप गीत तैयार किए जिन्हें एचएमवी ने जारी किया । शारदा का नया प्रयोग चर्चित ज़रूर हुआ, लेकिन उसे शोहरत नहीं मिल पायी। शायद तब भारत में पॉप के लिए माहौल नहीं बन पाया था। लेकिन इस प्रयोग से शारदा को एक फ़ायदा ये हुआ कि कम बजट में फिल्म बनाने वाले प्रोड्यूसर उनके पास आने लगे। मां बहन और बीवी, जैसी कुछ फिल्मों में उन्होंने संगीत दिया।

संगीतकार के रूप में शारदा को बी ग्रेड फिल्में ही मिलीं जो उनके नए करियर को आगे नहीं बढ़ा सकीं हालात का बहादुरी से मुक़ाबला कर रहीं शारदा के लिए0साल 1987 बेहद मनहूस ख़बर ले कर आया। फिल्मी दुनिया में उनका इकलौता सहारा यानी शंकर इस दुनिया को छोड़ गए। शारदा को यकीन होने लगा कि उन्हें गाना गाने के मौके नहीं मिल पाएंगे। शारदा ने भी फिल्म संगीत से किनारा कर लिया। लंबे वक़्त तक फ़िल्मी दुनिया की सियासत से मुक़ाबला करने वाली शारदा की कमसिन और अल्हड़ आवाज़ आखिरकार फ़िल्मों से बिदा हो गयी।

आज भी शारदा उन लोगों को नाम नहीं लेतीं जिन्होंने फ़िल्मी दुनिया में उनके पैर नहीं जमने दिए। उनकी आवाज़ में ऐसे लोगों के लिये कड़वाहट भी नहीं उभरती लेकिन आंखों से छलकता दर्द वो छिपा नहीं पाती हैं।

 

 

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