• Home
  • »
  • News
  • »
  • entertainment
  • »
  • बांग्लादेश में जन्मी इस बॉलीवुड अभिनेत्री ने कर दिया था दादा साहब फाल्के अवॉर्ड लेने से इनकार

बांग्लादेश में जन्मी इस बॉलीवुड अभिनेत्री ने कर दिया था दादा साहब फाल्के अवॉर्ड लेने से इनकार

फिल्मी पर्दे पर खूबसूरती और सादगी के मिश्रण की अनूठी मिसाल को देखना हो तो सुचित्रा सेन की किसी भी फिल्म को देखा जा सकता है।

फिल्मी पर्दे पर खूबसूरती और सादगी के मिश्रण की अनूठी मिसाल को देखना हो तो सुचित्रा सेन की किसी भी फिल्म को देखा जा सकता है।

फिल्मी पर्दे पर खूबसूरती और सादगी के मिश्रण की अनूठी मिसाल को देखना हो तो सुचित्रा सेन की किसी भी फिल्म को देखा जा सकता है।

  • Share this:
नई दिल्ली। फिल्मी पर्दे पर खूबसूरती और सादगी के मिश्रण की अनूठी मिसाल को देखना हो तो सुचित्रा सेन की किसी भी फिल्म को देखा जा सकता है। हिंदी और बांग्ला सिनेमा के जरिए दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाने वाली सुचित्रा सेन ने बांग्ला फिल्म इतिहास के एक युग का प्रतिनिधित्व किया।

बिमल रॉय की फिल्म देवदास के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजी गईं रोमा उर्फ सुचित्रा का जन्म 6 अप्रैल 1931 को पाबना (बांग्लादेश) में हुआ था। उनके पिता करूणामोय दास गुप्ता प्रतिष्ठित अध्यापक थे। तीन भाइयों और पांच बहनों के बीच सुचित्रा पांचवें नंबर की संतान थीं।

16 साल की उम्र में ही उनकी शादी कोलकाता के जाने माने वकील आदिनाथ सेन के बेटे दिबानाथ सेन के साथ हुई। सुचित्रा ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वो फिल्मों में काम करेंगी, लेकिन निर्देशक असित सेन जो उनके पारिवारिक मित्र थे शिद्दत के साथ महसूस करते थे कि सुचित्रा में बेमिसाल अभिनेत्री के गुण हैं। बाद में सुचित्रा के पति ने ही उन्हें फिल्मों में काम करने के लिये प्रोत्साहित किया।

21 साल की उम्र में जब उन्होंने रूपहले पर्दे पर कदम रखे उस समय सात माह की मुनमुन सेन उनकी गोद में थी। उनकी पहली फिल्म थी 'शेष कोथाय', लेकिन ये फिल्म 20 साल बाद 'श्राबोन संध्या' के नाम से रिलीज हो सकी।

उनकी पहली रिलीज फिल्म थी 'सात नम्बर कैदी (1953)'। अपनी तीसरी फिल्म 'शरे चौत्तर' में उन्हें बांग्ला फिल्म के सुपर स्टार उत्तम कुमार के साथ काम करने का मौका मिला। फिल्म जबरदस्त हिट साबित हुई और इसी फिल्म से बांग्ला सिनेमा को सुचित्रा सेन और उत्तम कुमार की अद्भुत जोड़ी मिली।

इसके बाद लोकप्रियता और कामियाबी का जो सफर इन दोनों ने तय किया वो दुनिया में बहुत कम फिल्मी जोड़ियों को नसीब हुआ। अगले 25 साल तक 30 फिल्में एक साथ कर ये जोड़ी बांग्ला सिनेमा पर राज करती रही।

इस दौर में बांग्ला फिल्मों में सुचित्रा इकलौती सुपरस्टार अभिनेत्री थीं। साल 1963 में सुचित्रा सेन के करियर की सबसे शानदार फिल्म आई. 'सात पाके बांधा' जिसमें सुचित्रा एक ऐसी लड़की के किरदार में थीं जो अपनी मां के दबंग स्वभाव को दबाने की कोशिश करती है।

सेन के शानदार अभिनय के लिए उन्हें मॉस्को फिल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब मिला। किसी भारतीय अभिनेत्री को वहां पहली बार ये सम्मान मिला था। इसके साथ ही उनकी अंतर्राष्ट्रीय ख्याति का सफर शुरू हुआ।

हिंदी सिनेमा में सुचित्रा सेन की धमाकेदार एंट्री हुई बिमल रॉय की देवदास से। हांलाकि देवदास में पारो के रोल के लिये बिमल राय की पहली पसंद मीना कुमारी थीं, लेकिन दूसरी फिल्मों में बेहद व्यस्त थीं फिर बिमल राय की नजरें मधुबाला पर टिकी, लेकिन तब तक दिलीप और मधुबाला के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण दौर में पहुंच चुके थे।

आखिरकार मधुबाला जैसी खूबसूरती और मीना कुमारी जैसी ट्रैजिक छवि की तलाश सुचित्रा सेन पर खत्म हुई। साल 1955 में रिलीज हुई देवदास में सुचित्रा सेन ने पारो की भूमिका में जान भर दी थी।

इस फिल्म में दिलीप कुमार के अलावा , मोतीलाल और वैजयंती माला जैसे हिंदी फ़िल्म जगत के दिग्गज कलाकार भी थे। यहीं से सुचित्रा ने हिंदी सिनेमा में अपनी स्थायी जगह बना ली। उनकी दूसरी फिल्म ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में बनी 'मुसाफिर' थी और तीसरी थी 'चंपाकली'। ये दोनों फिल्में कोई असर नहीं पैदा कर सकीं ।

इसके बाद देवानंद के साथ सुचित्रा ने जोड़ी बनाई, लेकिन इस फिल्म से भी ज्यादा चर्चा उनके हिस्से में आयी असित सेन की फिल्म 'ममता (1966)' से जो आज भी सुचित्रा सेन और अपने संगीत की वजह से याद की जाती है।

इसका एक लोकप्रिय गीत सुचित्रा सेन के बेमिसाल सोंदर्य और अभिनय का सबसे सटीक चित्रण करता है। गीत के बोल हैं – रहें ना रहें हम महका करेंगे बन के कली बन के सबा बाग़े वफा में। इस फिल्म में अशोक कुमार और धर्मेंद्र भी थे, लेकिन हिंदी फिल्मों की शिखर अभिनेत्रियों में सुचित्रा का नाम शामिल हुआ फिल्म 'आंधी (1975)' की वजह से।

हालांकि शुरू में ये फिल्म इसलिए विवादों में आकर ज्यादा चर्चित हुई क्योंकि कहा गया कि इसकी कहानी इंदिरा गांधी के जीवन पर आधारित है, लेकिन अगर ऐसा ना भी हुआ होता तो इस फिल्म का संगीत और सुचित्रा का बेदाग़ अभिनय इसे अमर करने के लिए काफी है।

वैसे हिंदी फिल्मों में सुचित्रा का बंगाली लहजा कहीं कहीं खटकता ज़रूर है, लेकिन उस बेमिसाल खूबसूरती को परदे पर देखते हुए भला कितनों को इसका एहसास हुआ होगा।

लेकिन हिंदी सिनेमा में सम्मान जनक स्थान बनाने के बावजूद मुंबई की फिल्मी दुनिया से सुचित्रा खुद को मजबूती से जोड़ नहीं पायीं। उनके गंभीर और आत्म केंद्रित व्यवहार की वजह से हिंदी फिल्मी दुनिया में उन के दोस्ताना रिश्ते कम ही बन सके।

'आंधी' के बाद जब सुचित्रा को लेकर फिल्म बनाने के लिये कई फिल्मकार उत्सुक भी थे सुचित्रा ने कोई प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया। उधर उनके परिवारिक रिश्ते असहज हो चुके थे। पति अमेरिका चले गए थे फिर वहीं उनकी मौत भी हो गई।

1978 में सौमित्र चैटर्जी के साथ आई बांग्ला फिल्म 'प्रणय पाशा' के फ्लॉप हो जाने के बाद सुचित्रा ने अपने 25 साल के करियर को विराम देने का फैसला कर लिया। वो उनके अभिनय के जीवन का सुनहरा मोड़ था, लेकिन उन्होंने फिल्मी दुनिया छोड़ दी। फिर उन्होंने खुद को तन्हाई के अंधेरे में छिपा लिया। उन्होंने घर से बाहर निकलना तक बंद कर दिया।

वो केवल बेटी मुनमुन सेन और पोतियों राइमा और रिया से मिलती थीं, लेकिन अगर उनके साथ कोई मेहमान आ जाए तो वे खुद को कमरे में ही बंद रखती थीं। कोलकाता में बेलीगंज के सरकुलर रोड के अपने मकान में उन्होंने बरसों कैद रखा।

दुनिया उनके बारे में जानना चाहती थी, लेकिन रहस्य की मोटी परत उनके जीवन को ढंके रही। और इसी वजह से सुचित्रा की खूबसूरती का ग्लैमर सदाबाहर बना रहा।

बताया जाता है कि सुचित्रा ने 2005 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड लेने से भी मना कर दिया था, क्योंकि वो किसी सार्वजनिक मंच पर नहीं जाना चाहती थीं। उन्हें 24 जुलाई 1980 को आखिरी बार सार्वजनिक रूप से देखा गया था उत्तम कुमार की शव यात्रा में।

कुछ साल पहले अपर्णा सेन सुचित्रा के जीवन पर वृत्त चित्र बनाना चाहती थीं लेकिन सुचित्रा ने उनका यह प्रस्ताव ठुकरा दिया। सुचित्रा ने ज्यादातर सिर्फ मनोरंजन देने वाली फिल्मों में काम किया और खुद को उसी दायरे में सीमित रखा।

शायद यही वजह है कि ग्लैमर को ही ध्येय बनाने वाली सुचित्रा अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के बांग्ला निर्देशकों सत्यजीत रे, ऋतविक घटक और मृणाल सेन के निर्देशन में काम करने का मौका नहीं हासिल कर सकीं।

हालांकि सत्यजीत रे उन्हें लेकर एक फिल्म बनाने का एलान जरूर किया था लेकिन वो फिल्म कभी नहीं बन सकी। समय अपनी रफ्तार से गुजरता रहा और फिर सुचित्रा सेन को साल 2014 में कोलकाता में मौत के पंजे ने दुनिया से छीन लिया लेकिन हिंदुस्तानी सिनेमा के तमाम रंगों में एक रंग हमेशा सुचित्रा के नाम से जाना जाएगा।

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज