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Sunday Special: इतिहास के साथ खेलती फिल्‍मी कहानियां और भड़कते जज्‍बात

News18Hindi
Updated: December 15, 2019, 8:11 AM IST
Sunday Special: इतिहास के साथ खेलती फिल्‍मी कहानियां और भड़कते जज्‍बात
बॉलीवुड फिल्मों को झेलना पड़ा जबरदस्त विरोध

निर्देशक संजय लीला भंसाली की पिछली दो फिल्‍में 'बाजीराव मस्‍तानी' और 'पद्मावत' जमकर विवादों में घिरी रही थीं. वहीं निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की फिल्‍म 'जोधा-अकबर' में अबकर की हिंदू रानी के अस्तित्‍व और उसके इस सारे प्रसंग पर भी राजस्‍थान में खूब हंगामा हुआ था.

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  • Last Updated: December 15, 2019, 8:11 AM IST
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मुंबई. इतिहास से जुड़ी एक बेहद प्रसिद्ध कहावत है कि 'इतिहास हमेशा खुद को दोहराता है...' ये बात काफी हद तक सही भी है क्‍योंकि राजा-महाराजाओं की कहानी से लेकर इतिहास के हर युद्ध तक कई तरह के दोहराव हमें देखने को मिलते हैं. लेकिन ये कहावत सिर्फ इतिहास के पन्नों तक नहीं, बल्कि इतिहास के पन्नों से ढूंढकर कहानी बनाने वाले फिल्‍ममेकर्स पर भी उतनी ही लागू हो रही है. इतिहास की प्रेम कहानी से लेकर युद्ध तक पर बनी हर बॉलीवुड फिल्‍म का एक ही हश्र होता है और है विवाद से नाता जुड़ना. इस कहावत का नया शिकार बनी है निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की फिल्‍म 'पानीपत', जिसे राजस्‍थान के जाट समुदाय का जमकर विरोध झेलना पड़ रहा है, लेकिन ये पहली फिल्‍म नहीं है, जिसे विरोध प्रदर्शनों का शिकार होना पड़ा है.

'अकबर' से लेकर 'पद्मावत' तक, गुस्‍सा भड़काती फिल्‍में
निर्देशक संजय लीला भंसाली की तीन पिछली दो फिल्‍में 'बाजीराव मस्‍तानी' और 'पद्मावत' जमकर विवादों में घिरी रही थीं. बाजीराव और मस्‍तानी की प्रेम कहानी इतिहास की चर्चित प्रेम कहानी रही है, लेकिन जब इसे पर्दे पर उतारा गया तो इसपर मराठाओं का काफी विरोध देखने को मिला. जबकि 25 जनवरी, 2018 को रिलीज हुई 'पद्मावत' के विरोध का मंजर तो पूरे देश में देखने को मिला. रानी पद्मिनी के सौंदर्य के प्रति अलाउद्दीन खिलजी के पागलपन को दिखाती इस फिल्‍म का कुछ ऐसा विरोध हुआ कि रिलीज से पहले ही सिनेमाघरों में तोड़फोड़ हो गई. वहीं निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की पिछली फिल्‍म 'जोधा-अकबर' में अबकर की हिंदू रानी के अस्तित्‍व और उसके इस सारे प्रसंग पर भी राजस्‍थान में खूब हंगामा हुआ.

'पानीपत' पर आखिर क्‍यों मचा हंगामा

निर्देशक आशुतोष गोवारिकर की ये फिल्‍म इतिहास के प्रसिद्ध पानीपत के तीसरे युद्ध पर आधारित है. यूं तो ये युद्ध मराठाओं और अफगानी सुल्‍तान अहमद शाह अब्‍दाली के बीच हुआ था लेकिन इस फिल्‍म पर विवाद शुरू हुआ है, राजस्‍थान के शहर भरतपुर से. दरअसल मराठाओं और अफगानी शासक के बीच लड़े इस युद्ध में भरतपुर के महाराजा सूरजमल की अहम भूमिका थी. लेकिन इस फिल्‍म में महाराज सूरजमल के किरदार को जिस तरीके से दिखाया गया है, उससे जाट समुदाय की भावना भड़क उठी. 'पानीपत' में दिखाया गया है कि जाट महाराजा सूरजमल अफ़गान शासक अहमद शाह अब्दाली के विरुद्ध लड़ाई में मराठाओं का साथ देने की एवज में आगरा के किले की मांग रख देते हैं, जिसे ठुकरा देने पर वो मराठाओं की मदद नहीं करते. साथ ही महाराजा सूरजमल को इस फिल्‍म में थोड़ी हरियाणवी और थोड़ी राजस्‍थानी बोलते हुए दिखाया गया है.

फिल्मों के खिलाफ खूब हुआ हंगामा


इन सभी तथ्‍यों का विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि फिल्‍म में महाराजा सूरजमल की भूमिका का चित्रण गलत तरीके से हुआ है. यहां तक की लोकसभा में नागौर से सांसद और राष्‍ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के संस्‍थापक हनुमान बेनीवाल ने इस फिल्‍म को बैन करने की मांग तक कर दी. महाराजा सूरजमल की चौदहवीं पीढ़ी के वंशज व राजस्थान सरकार में पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह का कहना है कि पानीपत की लड़ाई में जब मराठा सैनिक घायल होकर लौट रहे थे तो महाराजा सूरजमल और महारानी किशोरी ने 6 महीनों तक उन्हें पनाह दी थी. इतना ही नहीं, इतिहास के पन्नों की मानें तो अफगानों से किए गए इस युद्ध में मराठाओं की हार का एक बहुत बड़ा कारण जनवरी की सर्दियां भी थी जिसके बारे में महाराज सूरजमल ने मराठाओं को आगाह किया था. महाराज सूरजमल मराठाओं के हमेशा से ही समर्थक रहे थे, जबकि इस फिल्‍म में उनके किरदार को बेहद कमजोर दिखाया गया है.
पानीपत पर क्यों छिड़ी बहस


इतिहास के विवादित हिस्‍से ही करते हैं आकर्षित
हिंदी सिनेमा की बात करें तो बॉलीवुड में अक्‍सर फिल्‍में हीरो-और विलेन की कहानी होती है. हीरो और विलेन का यही फॉर्म्‍यूला निर्देशक अक्‍सर इतिहास पर आधारित फिल्‍मों में भी अपनाते हैं. इसी के चलते कई बार किरदारों की पृष्‍ठभूमि और उसके साथ क्रिएटिव लिबर्टी के नाम पर काफी छेड़छाड़ कर दी जाती है. फिल्‍म 'पानीपत' की ही बात करें तो इस फिल्‍म में मराठाओं को हीरो दिखाने के लिए निर्देशक ने उसके आसपास के हर शख्‍स को गद्दार और कमजोर दिखा दिया गया है. साथ ही इस युद्ध में हारने वाले मराठाओं की जिस-जिस कमजोरी को इतिहासकारों ने अपनी किताबों में दिखाया गया है, उसे फिल्‍म में ग्‍लोरिफाई किया गया है. जैसे युद्ध में महिलाओं और बच्‍चों को लेकर चलना मराठाओं की सबसे बड़ी कमी रही, जो उनकी हार के कई कारणों में से एक थी. वहीं 'पद्मावत' की बात करें तो निर्देशक संजय लीला भंसाली की इस फिल्‍म पर काफी विवाद खड़ा हुआ था, लेकिन जिस रानी पद्मिनी की कहानी को पर्दे पर उतारा गया है, उसे लेकर इतिहास की किताबों में कभी एकमत नहीं रहा. ऐसा ही 'जोधा-अकबर' की कहानी में हिंदू रानी जोधाबाई के बारे में भी कहा जाता है.

इन सारे उदाहरणों को देखें तो ये भी साफ है कि फिल्‍मकार भी अक्‍सर अपनी फिल्‍मों में उन विषयों को उठाने की कोशिश करते हैं, जिनपर इतिहास कभी एकमत नहीं हो पाता. इस सब के बाद ये भी बड़ा सवाल है कि इतने विवादों में घिरे रहने के बाद भी आखिर क्‍यों निर्देशक ऐसी फिल्‍में बनाने का मोह छोड़ नहीं पाते...? तो ये कहना भी गलत नहीं होगा कि इन विवादों से फिल्‍मों का कई बार काफी फायदा और मुफ्त की पब्लिसिटी भी मिल जाती है. साथ ही इतिहास पर बनाई जा रही इन फिल्‍मों का बॉक्‍स ऑफिस रिकॉर्ड भी काफी अच्‍छा रहा है.

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First published: December 15, 2019, 6:27 AM IST
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