कुछ OTT प्लेटफॉर्म दिखाते हैं 'अश्लील कंटेंट', स्क्रीनिंग के लिए होना चाहिए तंत्र: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट

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वेब सीरीज ‘तांडव (Tandav)’ से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को कहा कि कुछ ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म कई बार 'अश्लील कंटेंट' स्ट्रीम करते हैं और ऐसे कार्यक्रमों को स्क्रीन करने के लिए एक मैकेनिज्म (तंत्र) होना चाहिए.

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  • Last Updated: March 4, 2021, 11:08 PM IST
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नई दिल्ली. वेब सीरीज ‘तांडव (Tandav)’ पर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने गुरुवार को कहा कि कुछ ओवर-द-टॉप (ओटीटी) प्लेटफॉर्म कई बार 'अश्लील कंटेंट' दिखाते हैं और ऐसे कार्यक्रमों को स्क्रीन करने के लिए एक मैकेनिज्म (तंत्र) होना चाहिए. शीर्ष अदालत ने कहा, 'कुछ ओटीटी प्लेटफार्म अपने प्लेटफार्म पर अश्लील सामग्री दिखा रहे हैं, एक संतुलन कायम करना होगा'.

सुनवाई के दौरान, जस्टिस अशोक भूषण और आर सुभाष रेड्डी की पीठ ने केंद्र को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार कर पेश करने के लिए कहा. अमेज़न प्राइम के प्रमुख अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत याचिका पर कोर्ट शुक्रवार को सुनवाई करेगा.

अपर्णा पुरोहित की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने उनके खिलाफ मामले को 'चौंकाने वाला' बताते हुए कहा कि वह न तो प्रोड्यूसर हैं और न ही वेब सीरीज के एक्टर हैं, लेकिन फिर भी देश भर में लगभग 10 स्थानों पर उन पर नामजद मुकदमा दर्ज कराया गया है. पीठ पुरोहित की उस याचिका पर सुनवाई कर रही है, जिसके तहत इलाहाबाद हाईकोर्ट के 'तांडव' वेब सीरीज के खिलाफ दर्ज एफआईआर के मामले में उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया था.



25 फरवरी को, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए अपर्णा पुरोहित की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी कि ''... आवेदक सतर्क नहीं था और गैर-कानूनी तरीके से एक फिल्म की स्ट्रीमिंग की अनुमति देने के लिए आपराधिक मुकदमा चलाने का अवसर दिया, जो देश के बहुसंख्यक लोगों के मौलिक अधिकारों के खिलाफ है. इसलिए इस अदालत की विवेकाधीन शक्तियों का प्रयोग करके अग्रिम जमानत देकर उनके जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को संरक्षित नहीं किया जा सकता.'
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था, 'अपराध और अविवेक के कथित कृत्य करने के बाद बिना शर्त माफी मांगने की प्रवृत्ति के कारण, भारत के संविधान के खिलाफ ऐसे गैर-जिम्मेदार आचरण को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कोई व्यक्ति देश की बहुसंख्यक जनता के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करने वाला आचरण करेगा तो उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है.

अदालत ने कहा कि, 'शो के काल्पनिक होने के बारे में अस्वीकरण का संदर्भ 'एक आपत्तिजनक फिल्म की स्ट्रीमिंग को ऑनलाइन अनुमति देने वाले आवेदक को अनुपस्थित करने के लिए एक आधार नहीं माना जा सकता है.'
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