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Prime Time: 'थप्‍पड़' पर कितना बदल गया सबकुछ, क्‍या कहता है बॉलीवुड

News18Hindi
Updated: February 8, 2020, 5:52 PM IST
Prime Time: 'थप्‍पड़' पर कितना बदल गया सबकुछ, क्‍या कहता है बॉलीवुड
थप्पड़.

निर्देशक अनुभव सिन्‍हा (Anubhav Sinha) की अगली फिल्‍म 'थप्पड़ (Thappad)' के ट्रेलर के बाद एक नई बहस ने जन्म लिया है. न्यूज 18 हिन्दी के डिजिटल प्राइम टाइम में आज जानिए, खुद बॉलीवुड ने महिलाओं को थप्पड़ मारने को लेकर क्या-क्या दिखाया है.

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नई दिल्ली. निर्देशक अनुभव सिन्‍हा (Anubhav Sinha) की अगली फिल्‍म का ट्रेलर जब से सामने आया है, बॉलीवुड में एक अलग तरह की बहस ही शुरू हो गई है. दरअसल इस बहस में हैं दो फिल्‍में, 'कबीर सिंह' और 'थप्‍पड़'. पिछले साल कमाई के सारे रिकॉर्ड तोड़ने वाली फिल्‍म 'कबीर सिंह (Kabir Singh)' एक ऐसे डॉक्‍टर की कहानी है जो नशे में धुत है, अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए कुछ भी करता है, जिस हीरोइन से प्‍यार करता है उसे गुस्‍से में 'थप्‍पड़ (Thappad)' भी मार देता है. यही कबीर सिंह इस कहानी का 'हीरो' है और शायद कई लोगों का भी.

वहीं 'थप्‍पड़' एक ऐसी महिला की कहानी है, जिसने अपनी जिंदगी का हर ताना-बाना अपने पति के इर्द-गिर्द ही बुना है. उसके लिए पति के पीछे दौड़कर उसे खाने का एक निवाला खिलाना ही सबसे बड़ी सफलता है. लेकिन अचानक एक सामान्‍य से दिन पर उसका पति सब के बीच में गुस्से में उसे 'सिर्फ एक थप्‍पड़' मार देता है. बस यही 'एक थप्‍पड़' इस महिला को इस शादी को तोड़ने, अपने घर छोड़ने की हिम्‍मत दे देता है और वह कहती है, 'हां सिर्फ एक थप्‍पड़, पर नहीं मार सकता...' हालांकि पिछले साल ही 'कबीर सिंह' के मुख्‍य किरदार कबीर सिंह के 'हीरोइज्‍म' पर कई सवाल हो चुके हैं, लेकिन इन सवालों को एक बार फिर निर्देशक अनुभव सिन्‍हा की फिल्‍म ने झन्नाटेदार 'थप्‍पड़' के साथ खड़ा कर दिया है. इन सवालों के मूल में सबसे अहम सवाल यही है कि आखिर महिलाओं के साथ 'प्‍यार' या 'हक' के नाम पर हिंसा का ये हीरोइज्‍म कब तक हमारी फिल्‍मों की मुख्‍य विषयवस्‍तु बनता रहेगा.

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कबीर सिंह की एक झलक


'बेचारा पुरुष' थप्‍पड़ मारते ही हो जाता था 'मर्द'

'थप्‍पड़' के बाद खड़े हो रहे सवालों के बीच अगर आप ये सोच रहे हैं कि ये सब सिर्फ 'कबीर सिंह' जैसी एक-दो फिल्‍मों तक सीमित है तो यहां आप गलत हैं. जी हां, याद कीजिए 90 के दशक की वो फिल्‍में जो एक सुखी संसार या सुखी घर की तस्‍वीर दिखाती थीं. चलिए आपको एक फिल्‍म की कहानी बताते हैं... एक सुखी परिवार है, जिसमें एक मां है, पिता है, भाई बहन है और एक या दो भाभी. घर की मां एक दमदार महिला है जो हुकुम चलाती है, जबकि पिता बेचारा गरीब और बेटा मां के जुल्‍मों को चुपचार देखने वाला.

Thappad cartoon
थप्पड़ में मुख्य भूमिका तापसी पन्नू निभा रही हैं.


सीधा इसके क्‍लाइमैक्‍स पर आते हैं. क्‍लाइमैक्‍स में घर का 'बेचारा पति या पिता या पुरुष किरदार' एक जोरदार थप्‍पड़ उस नकचढ़ी महिला को मारता है और कहता है उसे ये पहले ही कर लेना चाहिए था ताकि वह उसके काबू में रहती है और सब खुश हो जाते हैं... आप शायद पहचान नहीं पा रहे होंगे कि ये किस फिल्‍म की कहानी है, क्‍योंकि ये किसी एक फिल्‍म की नहीं बल्कि 90 के दशक की अधिकांश फिल्‍मों की कहानी है, जो ऐसे ही 'थप्‍पड़ों' को इन औरतों के लिए जरूरी बताती रही हैं.
laadla
लाडला में अनिल कपूर और श्रीदेवी मुख्य भूमिकाओं में थे.


महिला को जड़ा 'थप्‍पड़' तो 'हैप्‍पी एंडिंग' तय है
दरअसल हिंदी सिनेमा में 90 के दशक (कुछ हद तक उससे पहले भी और बाद में थी) में कई फिल्‍मों के क्‍लाइमैक्‍स में हीरो का 'नकचढ़ी हीरोइन' को या फिर किसी दीन-हीन पुरुष किरदार का एक दमदार किरदार वाली महिला को 'थप्‍पड़' जड़ देना 'हैप्‍पी एंडिंग' की वजह बन जाता था. सिनेमाघरों से निकलते दर्शक इस बात से पूरी तरह संतुष्‍ट हो जाते थे कि इस औरत का यही इलाज था और ये थप्‍पड़ जरूरी थे. कई फिल्‍मों में महिला किरदार के साथ होने वाली शारीरिक हिंसा जुर्म या अत्‍याचार सिर्फ तब होती थी, जब उसे कोई विलेन करता था लेकिन हीरो का 'थप्‍पड़' उसके प्‍यार या उसके हक का प्रतीक है और वह सही भी है. हिंदी सिनेमा ने इस दौर में धीरे-धीरे कई फिल्‍मों में बिना किसी रोक-टोक के ये सब आसानी से दिखाया था. 'घर हो तो ऐसा', 'बीवी हो तो ऐसी', 'लाड़ला', 'बेटा' ऐसी कई फिल्‍में हैं जिनमें ऐसे 'थप्‍पड़' हैप्‍पी ऐंडिंग की वजह बने हैं.

थप्पड़ का ट्रेलर



हिंदी सिनेमा पर लंबे समय तक लिखते रहे लेखक और वरिष्‍ठ पत्रकार मिथिलेश सिन्‍हा का कहना है, 'इस बात को तो फिल्‍म 'थप्‍पड़' के निर्देशक भी बार-बार कह रहे हैं कि ये एक तरह से 'कबीर सिंह' का जवाब है. लेकिन ये बात भी सही है कि समाज में होते महिला सशक्तिकरण का हिंदी फिल्‍मों की विषयवस्‍तु पर गहरा असर पड़ा है. अब 'मेरी बीवी लंबी, उसकी बीवी छोटी' जैसी बातें मायने नहीं रखतीं, ये भेद टूटा है.

ये बदलाव सिर्फ फिल्‍मों के विषय ही नहीं बल्कि फिल्‍मों में काम करने वाली महिलाओं के प्रति भी हुआ है. जैसे पहले फिल्‍म का हीरो ही तय करता था कि हीरोइन कौन होगी लेकिन अब ऐसा नहीं होता. महिला-पुरुष एक्‍टर्स के मेहनताने में भी बड़ा अंतर था, लेकिन अब ऐसा नहीं रहा है. समाज के ये बदलाव अब फिल्‍मों में पर्दे के पीछे और आगे दोनों तरफ दिखने लगे हैं. इतना ही नहीं, हमने वेस्‍ट की फिल्‍मों की विषयवस्‍तु को कॉपी किया और उसके साथ ही उनके यहां महिलाओं को जैसे दिखाया जाता था, उन तथ्‍यों पर भी काम हुआ है.

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First published: February 7, 2020, 8:53 PM IST
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