श्रद्धांजलि खय्याम साहब: सुर के प्‍यासे कानों में गूंजता रहेगा नाम

Piyush Babele | News18Hindi
Updated: August 20, 2019, 5:49 PM IST
श्रद्धांजलि खय्याम साहब: सुर के प्‍यासे कानों में गूंजता रहेगा नाम
खय्याम को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई.

खय्याम (Mohammed Zahur Khayyam) का उसूल था कि काम करेंगे तो ‘बुलंद पाया’ काम ही करेंगे, किसी हल्‍की फिल्‍म को हाथ नहीं लगाएंगे.

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जब-जब हिंदी फिल्‍मों के सबसे सुरीले, लेकिन सबसे अलग संगीत की बात होगी तो एक संगीतकार का नाम सुर के प्‍यासे कानों में गूंजता रहेगा. वह नाम होगा मुहम्‍मद जहूर खय्याम हाशमी (Mohammed Zahur Khayyam) यानी खय्याम साहब का. रजिया सुल्‍तान, उमराव जान, बाजार, कभी-कभी और नूरी जैसी फिल्‍मों का इतना मीठा और गहरा संगीत खय्याम साहब ही बना सकते थे. क्‍योंकि उनका उसूल था कि काम करेंगे तो ‘बुलंद पाया’ काम ही करेंगे, किसी हल्‍की फिल्‍म को हाथ नहीं लगाएंगे. और जब कोई फिल्‍म करेंगे तो धुनें किरदार में इस कदर डूब जाएंगी कि हर सुनने वाला बस उन्‍हीं का होकर रह जाएगा.

संगीत की बुलंदी और सुरों की गहराई से भरे खय्याम का जीवन भी कम सूफीयाना नहीं रहा है. पंजाब के जालंधर जिले के नवाशहर में जन्‍मे खय्याम का फिल्‍मी संगीत से जुड़ने का सिलसिला भी फिल्‍मी अंदाज में ही शुरू हुआ. 2013 में दिए एक इंटरव्‍यू में खय्याम ने जो किस्‍सा बयां किया वह कुछ इस तरह था. फॉर्मल किस्‍म की पढ़ाई लिखाई में उनका मन लगता नहीं था. इसलिए एक दिन नवाशहर से दिल्‍ली चले आए. चचा जान के पास पहुंचे तो उन्‍होंने पूछा- साथ में कौन है. खय्याम का जवाब था- अकेला आया हूं. फिर क्‍या था, एक थप्‍पड़ की आवाज आई. दिल्‍ली में खय्याम का स्‍वागत हो चुका था. पढ़ाई छोड़, दूसरी दूनिया की तरफ भागने की यह पहली सजा थी.

आवाज सुन कर दादी भी बाहर निकल आईं. उन्‍होंने सहमे खय्याम को अपने आंचल में समेट लिया. लड़कपन को सहारा मिल गया. अब जाकर चाचा ने पूछा, किस लिए आए हो. सादगी से जवाब मिला संगीत सीखना है.

जो चाचा थप्‍पड़ रसीद कर सकते थे, वे आगे का रास्‍ता भी बता सकते थे. उन्‍होंने नौजवान खय्याम की मुलाकात उस जमाने के मशहूर संगीतकार हुसनलाल-भगतराम से कराई. यह दूसरी दुनिया में आने का इनाम था. पांच साल तक खय्याम इन दिग्‍गजों की शागिर्दी में रहे. इस दौरान संगीत की बारीकियों पर पकड़ बनती गई, लेकिन रोजगार का कोई जुगाड़ न हुआ.

चिश्‍ती बाबा और खय्याम
इस संगीतकार जोड़ी के तीसरे भाई पंडित अमरनाथ जी लाहौर में रहा करते थे. खय्याम उनके भी शागिर्द थे. एक बार उनसे मिलने लाहौर गए, तो किसी ने उस जमाने के एक और महान संगीतकार चिश्‍ती बाबा से मिलने की सलाह दी.

खय्याम उनकी कोठी पर चल दिए. पुराना जमाना था, बड़े लोगों के दर भी खुले रहा करते थे. खय्याम अंदर दाखिल हो गए. चिश्‍ती बाबा अपने संगीत कक्ष में पियानो बजा रहे थे. वो अपनी रौ में संगीत की एक से एक धुनें छेड़े जा रहे थे. बाकी लोग बाअदब खड़े हुए थे. खय्याम भी एक कोने में जाकर टिक गए. जैसी लाजवाब धुनें थीं, वैसा ही शब्‍दातीत उनका असर था. अचानक चिश्‍ती बाबा ने हाथ रोक दिया. वहां खड़े लोगों से पूछा कि जरा वह टुकड़ा याद दिलाना जो कुछ देर पहले मैंने बजाया था.
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कोई रिकॉर्डिंग तो हो नहीं रही थी. ऐसे में किसी को क्‍या खाक याद था कि चिश्‍ती बाबा किस टुकड़े के बारे में पूछ रहे हैं. जवाब की जगह खामोशी छा गई. कोने में खड़े लड़के ने कहा- बाबा मैं बताऊं. एक अनजान लड़के को कमरे में देखकर चिश्‍ती बाबा भड़क गए. खूब डांट पड़ी. डांट-फटकार के बाद पूछा- बताओ कौन सा टुकड़ा था. खय्याम ने धुन सुना दी. साथ ही अर्ज किया कि आप कहें तो सरगम भी बना दूं. चिश्‍ती बाबा ने कहा- हां. लीजिए सरगम भी हाजिर. बातचीत बढ़ी तो खय्याम ने बता दिया कि वो दिल्‍ली में कितने बड़े संगीतकारों के शागिर्द रहे हैं. उन्‍हें चिश्‍ती बाबा की हवेली पर रहने और खाने पीने की जगह मिल गई.

खय्याम और 125 रुपये महीने की तनख्‍वाह
चिश्‍ती बाबा मशहूर फिल्‍म निर्माता बी आर चोपड़ा के साथ जुड़े थे. जिस दिन तनख्‍वाह मिलने का दिन आया तो सबको लिफाफे मिल गए, लेकिन खय्याम को सिर्फ दो वक्‍त की रोटी काफी थी. चोपड़ा साहब की पारखी निगाहों से यह बात छुप न सकी. उन्‍होंने पूछा कि इस लड़के को कुछ नहीं दिया क्‍या. चिश्‍ती बाबा ने कहा कि यह तो अभी सीख रहा है. बी आर चोपड़ा का जवाब था- सारा काम तो यही करता है. उसके बाद 125 रुपये महीने की तनख्‍वाह पर खय्याम वहां तैनात हो गए.

जनवरी 1947 में खय्याम मुंबई आ गए. यहां रोमियो जूलियट फिल्‍म बन रही थी. खय्याम को फिल्‍म में बतौर गायक एंट्री मिल गई. वो फिल्‍म के लिए फैज अहमद फैज का लिखा दोगाना ‘ दोनों जहान तुम’ गा रहे थे और उनके अपोजिट थीं उस जमाने की स्‍थापित गायिका जोहराबाई अंबालेवाली. यह फिल्‍म बना रहीं थीं, मशहूर अभिनेत्री नरगिस की मां जद्दन बाई, जो खुद भी बड़ी हस्‍ती थीं.

गाना सुनने के बाद जद्दन बाई ने खय्याम को मिलने बुलाया और घोषणा कर दी कि हिंदी सिनेमा में नया सितारा आने वाला है.

khayyam
बतौर संगीतकार खय्याम नाम से उनकी पहली फिल्‍म आई- फुटपाथ


जल्‍द ही खय्याम को बतौर संगीतकार पहली फिल्‍म मिल गई- हीरा रांझा. फिल्‍म तो मिल गई, लेकिन नाम नहीं मिला. वे हिंदुस्‍तान के बंटवारे के दिन थे. सांप्रदायिक दंगे अपने चरम पर थे. ऐसे में हुस्‍नलाल भगतराम ने खय्याम और उनके साथी को सलाह दी कि वे शर्मा-वर्मा की जोड़ी के नाम से संगीत बनाएं. खय्याम इसी जोड़ी के नाम से अगले पांच साल तक संगीतकार बने रहे.

बतौर संगीतकार खय्याम की पहली फिल्म
बतौर संगीतकार खय्याम नाम से उनकी पहली फिल्‍म आई- फुटपाथ. लेकिन उन्‍हें फुटपाथ पर नहीं रहना था, खुद राज उनका इंतजार कर रहे थे. उस समय राज कपूर फ्योदोर दोस्‍तोवस्‍की के मशहूर उपन्‍यास क्राइम एंड पनिशमेंट पर ‘फिर सुबह होगी’ नाम से फिल्‍म बनाने वाले थे. यह तकरीबन तय था कि फिल्‍म का संगीत राज कपूर की पसंदीदा संगीतकार जोड़ी शंकर जयकिशन ही देगी. इस किस्‍से को खय्याम ने एक इंटरव्‍यू में इस तरह सुनाया था. रमेश सहगल ने राज कपूर से कहा कि शंकर जयकिशान तो संगीत दे ही सकते हैं, लेकिन इस फिल्‍म का संगीत ऐसे आदमी से दिलाया जाए जिसने क्राइम एंड पनिशमेंट पढ़ी भी हो और समझी भी हो. ऐसा समझदार आदमी कहां मिले. तो पता चला कि खय्याम ऐसे संगीतकार हैं जो खुद अदीब भी हैं और उन्‍होंने यह किताब पढ़ी भी है.

राज कपूर के सामने खय्याम की पहली धुन और...
फिर क्‍या था, खय्याम उस मशहूर आर के स्‍टूडियो में पहुंच गए, जिसे 2019 में राज कपूर के बेटों ने बेच दिया और नए खरीदार ने उसे जमींदोज कर दिया ताकि नया निर्माण हो सके. बहरहाल राज कपूर के सामने खय्याम ने पहली धुन पेश की. राज कपूर के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया. उसके बाद दूसरी, तीसरी, चौथी और पांचवीं धुन भी खय्याम ने राज कपूर को सुना दी. लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं, राज कपूर का चेहरा सपाट ही बना रहा. और वो उठकर चले गए. अगले 40 मिनट तक खय्याम खयालों में डूबते उतराते बैठे रहे.

वो समझ नहीं पा रहे थे कि राज कपूर की फिर सुबह होगी में रोशनी की कोई किरण उनके हिस्‍से आएगी या नहीं. तभी रमेश सहगल राज कपूर के पास से आए और बेतहाशा खय्याम की पेशानी चूमने लगे. राज कपूर ने सहगल से कहा था कि उन्‍होंने इतना सुंदर म्‍यूजिक अपनी जिंदगी में कभी सुना ही नहीं था. इतने में राज कपूर खुद आ गए और खय्याम से कहा कि पांचों धुनें तैयार करिये हर एक पर गाना बनेगा. इसी फिल्‍म में आशा भोसले भी गीत गा रही थीं. आशा ने अपने करियर की शुरुआत बीबी (1950) फिल्‍म में खय्याम के साथ ही की थी. आशा ने खय्याम से कहा: आपकी सुबह हो गई.



और वाकई सुबह हुई. अपनी शुरुआती धुनों में अपने गुरुओं और परंपरा का निर्वाह करने वाले खय्याम फिल्‍मी संगीत जगत के ऐसे सूरज बनकर उभरे कि आज भी उनका बनाया संगीत न सिर्फ शीर्ष पर है, बल्कि भीड़ से बहुत अलग है. अगर वो बहुत सी फिल्‍मों में संगीत न भी देते तो भी सिर्फ रजिया सुल्‍तान, उमराव जान और बाजार फिल्‍मों का संगीत ही उन्‍हें वह मकाम दे देता जिसे वे बुलंद पाया काम कहा करते थे.

और इस काम में उनकी शरीके हयात जगजीत कौर बराबर की भागीदार थीं. शगुन फिल्‍म के लिए चार दशक पहले जगजीत कौर ने जो गजल गाई थी- तुम अपना रंजो गम, अपनी परेशानी मुझे दे दो, उसे खय्याम अपने आखिरी दिनों तक गुनगुनाते रहे. इसी गजल के एक शेर को वो अकसर सुनाया करते थे- मैं देखूं तो तुम्‍हें दुनिया कैसे सताती है, कुछ दिन के लिए अपनी निगेहबानी मुझे दे दो.’’



अब खय्याम साहब उनकी निगेहबानी से आजाद होकर रूहानी दुनिया में चले गए हैं. जगजीत खुद भी उम्र के चौथे पड़ाव पर हैं. उन्‍हें खुद भी निगेहबानी की दरकार होगी. जिस तरह मशहूर गजल गायक तलत अजीज इस परिवार से जुड़े हैं, उससे आशा करनी चाहिए कि उनकी खैरख्‍वाही में कमी नहीं रहेगी. वैसे खुद खय्याम और जगजीत कौर ने अपनी सारी प्रॉपर्टी से एक ट्रस्‍ट बनाया है जो फिल्‍मों की दुनिया से जुड़े फनकारों की मदद करता रहेगा. और खय्याम साहब का जादुई संगीत पिछले दशकों की तरह आने वाली सदियों तक फासले से गुजरता रहेगा और दिलों तक उसके कदमों की आवाज आती रहेगी.

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First published: August 20, 2019, 4:35 PM IST
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