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इसे पढ़कर 'पटाखा' देखेंगे तो 'एटम-बम' जैसी लगेगी

इसे पढ़कर 'पटाखा' देखेंगे तो 'एटम-बम' जैसी लगेगी

फिल्म पटाखा के एक सीन में राधिका मदान और सान्या मल्होत्रा.

फिल्म पटाखा के एक सीन में राधिका मदान और सान्या मल्होत्रा.

फिल्म 'पटाखा' देखने से पहले अगर ये रिव्यू पढ़ लिया तो अच्छी तरह समझ आएगी ये फिल्म. नहीं तो केवल हंसते ही रह जाएंगे आप.

    विशाल भारद्वाज एक अनोखे और समझदार फिल्ममेकर हैं. ऐसे में उनसे ज्यादा अपेक्षा दर्शकों और क्रिटिक्स दोनों को ही रहती है. साथ ही किसी महान इंसान ने यह भी कहा है, 'एक फिल्ममेकर अपने समय को दर्ज करता है.' समय को दर्ज करने वाली बात चाहकर भी होती है, अनचाहे भी. फिर विशाल भारद्वाज कैसे चूकते? वो भी तब जब उनका सिनेमाई इतिहास चीख-चीखकर इस बात की गवाही देता है. इसलिए पटाखा देखने जाएं तो बस दो बहनों की कहानी पर हंसते हुए न वापस आ जाएं. जरा ठहरकर सोचें विशाल आपको क्या-क्या हमेशा के लिए सौंपना चाहते हैं.

    कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर एक डायलॉग का जिक्र कर रखा है, 'एक मारेंगे तो गुजरात जाकर गिरोगे.' इसके अलावा भी बहुत कुछ है जिसपर लोगों को ध्यान देना चाहिए. यह बात सही है कि यह कहानी चरण सिंह 'पथिक' की है. और ऐसे में जो बातें मैं आगे लिख रहा हूं उनका श्रेय तो चरण सिंह पथिक को ही जाना चाहिए. पर जरा फिल्म के बारे में चरण सिंह 'पथिक' का कोई भी इंटरव्यू उठाकर देखिए. हर जगह वह कहते हैं कि उन्होंने विशाल भारद्वाज और गुलज़ार दोनों को ही अपने अभी तक प्रकाशित दोनों ही कहानी संग्रह थमा दिए थे. फिर ऐसे में 'दो बहनों' की कहानी में ऐसा क्या था कि इस पर फिल्म बने. वो भी विशाल भारद्वाज जैसा फिल्ममेकर जो कश्मीर मुद्दे पर ठीक चार साल पहले फिल्म बना चुका हो. वो फिल्ममेकर जिसकी फिल्मों में रंजिश नहीं शक्ति संतुलन केंद्रीय विषय रहता हो. दरअसल वहज थी इस कहानी के अंदर अपने नैरेटिव को डालने का स्कोप.

    दोनों बहनों में से पढ़ी-लिखी बहन का अपनी 6वीं तक पढ़ी बहन से दूर रहने के चलते अंधा हो जाना और 6वीं तक पढ़ी बहन का अपनी पढ़ी-लिखी बहन के बिन गूंगा हो जाना हमारे देश के इंटेलेक्चुअल और साधारण लोगों को निरूपण करता है. आपने अक्सर लोगों के मुंह से इंटेलेक्चुअल के समाज से कटते जाने की बात सुनी होगी. और चुनाव पूर्व बहसों में फलानी पार्टी के जीतने-हारने का दावा करने वाले सैफोलॉजिस्ट (चुनावी विश्लेषकों) को उल्टा नतीजा आने पर मुंह की खाते भी देखा होगा. दरअसल वे पढ़े-लिखे हैं लेकिन अपनी सगी बहन साधारण जनता से कट जाने के चलते अंधे हो चुके हैं.

    ऐसे ही मात्र 6वीं तक पढ़ी बहन है जनता जो इन पढ़े-लिखे लोगों के बिना गूंगी हो जाती है. उन्हें नहीं पता होता कि कैसे उन्हें एक जरिया बनाकर सत्ता प्रयोग कर रही है. ऐसी आवाज किसी इंटेलेक्चुअल की ओर से ही आती है. चाहे वह आवाज किसी जमाने के गैलीलियो की हो, गांधी की या एडवर्ड स्नोडेन की. इसके बाद यह आवाज जनता की आवाज बनती है. ऐसे में दोनों बहनों का साथ होना बहुत जरूरी होता है. इतना ही नहीं दोनों के बीच हमेशा लड़ाई भी चलती रहती है, हार्वर्ड बनाम हार्डवर्क की. लेकिन दोनों को ध्यान रखना होता है कि इसका फायदा किसी तीसरे को उठाने नहीं देना है. इस फिल्म में वह तीसरा है सुनील ग्रोवर, जो इस लड़ाई का फायदा उठाकर अपना सामान बेच रहा है, कभी कुछ तो कभी कुछ और क्राइम भी कर रहा है, जेल भी जा रहा है.

    इसके अलावा भी फिल्म में गाय है. जो किसी के दिमाग में इतना बुरा असर कर सकती है कि वो अंधा हो जाए. गलतफहमी के चलते होने वाली भीड़ की हिंसा है. तो बस यही कुंजी है पटाखा देखने की. अगर आपने अभी तक पटाखा नहीं देखी है तो जरूर देख आएं और देख ली है तो फिर एक बार देख आएं. बस ये नजरिया मन में जरूर रखें. पटाखा का कद आपने जितना आंका होगा, आपको इस नजरिए के साथ देखने पर यह उससे कहीं ज्यादा फिल्म बड़ी फिल्म लगने लगेगी.

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    Tags: Sunil Grover, Vishal bhardwaj

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