60 के दशक की मशहूर गायिका मुबारक बेगम गुमनामी में

News18India
Updated: July 29, 2011, 1:35 PM IST

कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी जैसे खूबसूरत गीत देने वाली मुबारक बेगम के योगदान को फिल्म इंडस्ट्री भूल ही गई है। आज मुबारक बेगम पूछती हैं कि क्या कभी किसी को उनकी याद भी आएगी।

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मुंबई। जिस मायानगरी में आज एक गाने को तैयार करने पर करोड़ों रुपए खर्च कर दिए जाते हैं। जहां गानों की रिलीज पर पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। उसी फिल्म इंडस्ट्री को कभी एक से बढ़कर एक आवाजों ने रौशन किया था। इनमें एक अहम आवाज थी मुबारक बेगम। कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी जैसे खूबसूरत गीत देने वाली मुबारक बेगम के योगदान को फिल्म इंडस्ट्री भूल ही गई है। आज मुबारक बेगम पूछती हैं कि क्या कभी किसी को उनकी याद भी आएगी। ये सवाल उस बॉलीवुड से है जो सिर्फ उगते सूरज को सलाम करता है। नामचीन अभिनेत्रियों को सुर देने वाली मुबारक बेगम बड़े-बड़े म्यूजिक डायरेक्टरों से लेकर मोहम्मद रफी तक के साथ काम कर चुकी हैं। उम्र के अंतिम पड़ाव पर उन्हें गम है कि जिस फिल्मी दुनिया को उन्होंने अपनी जिंदगी के कीमती 40 साल दिए आज उसे उनकी कतई फिक्र नहीं है।

मुबारक बेगम की असल नाराजगी सरकार से है, जो महज डेढ़ हजार रुपए महीने की पेंशन देकर अपना पल्लू झाड़ रही है। जबकि मुबार को पर्किंसन रोग पीड़ित 40 साल की बेटी पर हर महीने करीब 5 से 6 हज़ार रुपए खर्च होते हैं। बेटा टैक्सियां चलाकर जैसे-तैसे घर का खर्च जुटाता है। बेगम की दूसरी शिकायत उस फिल्म इंडस्ट्री से है जिसके पास उनकी खैर-खबर लेने तक की फुरसत नहीं है। मुबारक बेगम ने 50 के दशक में अपने करियर की शुरुआत रेडियो से की थी। लेकिन जल्दी ही वो फिल्मों में गाने लगीं, तब लता मंगेशकर भी अपने करियर की शुरुआत कर रही थीं। राजस्थान की रहने वाली मुबारक बेगम को बड़ा ब्रेक फिल्म मधुमति के गाने ‘हाले दिल सुनाइए से...’ मिला। फिल्म उस दौर में हिट साबित हुई। किरदार शर्मा की फिल्म ‘हमारी याद आएगी’ से उन्हें शोहरत मिली और इसके बाद उन्होंने एक से बढ़कर एक नगमे इंडस्ट्री को दिए। लेकिन 70 के दशक के आते-आते उन्हें इंडस्ट्री भूलने लगी।


दरअसल आवाज से दिलों पर राज करने वाली मुबारक बेगम आज मुंबई के जोगेश्वरी इलाके में महाडा के 450 स्क्वेयर फीट के छोटे से घर में बसर कर रही हैं। घर चलाने के लिए गायकी में कदम रखा और वही गायकी इतना भी न दे सकी कि आज उनका घर चल सके। मुबारक बेगम का कहना है कि ‘मैंने गायकी अपने घर को चलाने के लिए की। मेरे पिता फलों के व्यापारी थे और अहमदाबाद से मुंबई वो पूरे परिवार के साथ इसलिए आए ताकि मेरे गानों के जरिए मैं पैसे कमाकर घर चला सकूं। लेकिन जैसी ही मैंने अपनी पहचान बनानी शुरू की लोगों ने मेरी आवाज़ को पसंद करना शुरू किया। लेकिन कुछ को मेरे काम और नाम से ऐसा बैर हुआ कि मेरे गानों पर दूसरों की आवाज़ में फिल्में परदे पर उतरने लगी और मुझे पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया।

चमक-दमक से भरी मायानगरी का ये भी एक सच है और आज से नहीं, उस दिन से है जब फिल्म इंडस्ट्री के कदम लड़खड़ा रहे थे। लेकिन मुबारक इसी सच के साथ जीने को मजबूर थीं फिर भी मुबारक के गले से एक से एक शाहकार निकले और हमेशा के लिए लोगों की यादों में चले गए। जिनमें हमारी याद आएगी का गीत ‘कभी तन्हाइयों में हमारी याद आएगी..’ हमराही का ‘मुझको अपने गले लगा लो..’ खूनी खजाना का ‘ऐ दिल बता..’ डाकू मंसूर का गीत ‘ऐजी-ऐजी याद रखना सनम..।‘

आज मुबारक बेगम गा नहीं सकतीं, इसलिए उन्हें कोई पूछता भी नहीं। हालत ये है कि कई बार घर का बिजली बिल भरने तक के लिए हाथ तंग होते हैं। लेकिन खुद्दारी उन्हें किसी के आगे झुकने नहीं देती। कुछ वक्त पहले तक मुबारक बेगम के फैन उन्हें कुछ पैसा भेज दिया करते थे, अब वो भी बंद हो गया है। लेकिन इस बीच बालकृष्ण बिरला नाम के फैन ने कुछ इवेंट्स के जरिए मिलने वाले पैसे से उनकी मदद की है।

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First published: July 29, 2011, 1:35 PM IST
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