रिव्यू: खतरनाक तस्वीर से कुछ ज्यादा है 'गैंग्स ऑफ वासेपुर'

गैंग्स ऑफ वासेपुर भारतीय राजनीति में कई पीढ़ियों से चली आ रही बदले और नफरत की कहानी है।

गैंग्स ऑफ वासेपुर भारतीय राजनीति में कई पीढ़ियों से चली आ रही बदले और नफरत की कहानी है।

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मुंबई।गैंग्स ऑफ वासेपुर भारतीय राजनीति में कई पीढ़ियों से चली आ रही बदले और नफरत की कहानी है। बदले व नफरत को अगर हटाया जाए तो पता चलता है कि ये फिल्म महज एक खतरनाक तस्वीर से कुछ ज्यादा है। फिल्म में खूब सारे खून-खराबे के साथ निर्देशक अनुराग कश्यप इस कहानी को अपने ही ढंग से बताते हैं। ये धनबाद के वासेपुर जिले में सेट गैंग वॉर की कहानी है। पर इसके साथ-साथ इसमे हंसी मजाक और बढ़िया संगीत भी है।

फिल्म को दो भागों में बांटा गया है। फिल्म खत्म होने के बाद जब आप सिनेमा हॉल से बाहर निकलेंगे तो आपको इसके दूसरे भाग का इंतजार रहेगा। फिल्म का शुरुआती आधा घंटा बेहद थका देने वाला है। फिल्म में अगर थोड़ी मजबूत स्क्रिप्ट होती और बेहतर एडिटिंग तो ये फिल्म और भी अच्छी हो सकती थी। तिगमांशु धूलिया रमाधीर के किरदार में काफी जानदार लगते हैं और मनोज बाजपेयी के बारे में कहा जा सकता है कि आप उनके अंदर से किरदार को अलग ही नहीं कर पाएंगे।

वैसे तो फिल्म पुरुष प्रधान है पर इसमें महिलाओं ने भी जबरदस्त अभिनय किया है। ऋचा चड्ढा और रीमी सेन अपने अपने किरदारों को बेहद खूबसूरती से निभाया है। फिल्म के संगीत के लिए मैं स्नेहा खनवलकर की तारीफ करूंगा। वूमनिया और आई एम ए हंटर गाने तारीफ के काबिल हैं। कुल मिलाकर फिल्म में शानदार अदाकारी, इसके जबरदस्त प्लॉट आपका ध्यान खीचेंगे। मैं अनुराग कश्यप की फिल्म को पांच में से साढ़े तीन स्टार देता हूं।

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