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वो समय जब 'पंचम दा' के पास भी नहीं था काम !

संगीतकार-आरडी बर्मन

संगीतकार-आरडी बर्मन

1980 के दशक में आरडी बर्मन को क्या क्या मुश्किलें आ रही थीं

    भारत में 80 का दशक एक ऐसा दौर था जब सिनेमा में अच्छा संगीत धीमी मौत मर रहा था, मेलोडी के कद्रदान तेज़ी से कम हो रहे थे. ये वो दौर था जब 'संगीत' से ज्यादा एहम 'हीरो का एक्शन' था और अमिताभ बच्चन सरीखे अभिनेता फिल्मी पर्दे पर छा गए थे ऐसे में अच्छे संगीत की ज़रूरत पर अच्छा एक्शन और डॉयलॉग हावी होने लगा था. ये वही वक़्त था जब बप्पी लहरी और लक्ष्मीकांत प्यारेलाल भी हिट संगीत देने लगे थे और इसका खामियाजा 'पंचम दा' को भुगतना पड़ा था.

    80 के दशक वो समय था जब दक्षिण भारतीय फिल्मों के हिंदी रीमेक आने लगे और हीरो हिरोइन के भड़कीले डांस को ज्यादा जगह मिलने लगी और मेलोडी पर भारी भरकम म्यूजिक आ गया. यहां तक कि आरडी बर्मन के बेहद करीबी किशोर कुमार भी अब नए संगीतकारों के लिए दोयम दर्जे के गाने गा रहे थे, ये सब देखना आरडी बर्मन के लिए बहुत मुश्किल भरा था और वो ज्यादा खुश नहीं थे. साल 1987 में किशोर कुमार की मौत ने आरडी बर्मन को और भी दुख पहुंचा दिया, वो बुरी तरह से टूट गए.

    इन सभी बातों की पुष्टि आशा भोंसले अपने पहले दिए इंटरव्यूज़ में कर चुकी हैं कि आर डी बर्मन बॉलीवुड में संगीत के गिरते स्तर से परेशान थे भी. हालांकि इस बीच उन्होंने गुलजार की कुछ फिल्मों जैसे 'लिबास', 'इजाजत', 'अंगूर', 'नमकीन' और 'मासूम' में अच्छा संगीत दिया. आरडी बर्मन के संगीत ने सनी देओल (बेताब) संजय दत्त (रॉकी) और कुमार गौरव (लव स्टोरी ) की लॉन्चिंग में मदद भी की लेकिन फिर भी आरडी बर्मन खुश नहीं थे, वो खुद को दर्शकों की बदली हुई पसंद के मुताबिक ढालने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिल रही थी.

    जब विधु विनोद ने मांगा आर डी टच

    आर डी बर्मन की आखिरी फिल्म '1942 एक लव स्टोरी' के संगीत को लेकर एक किस्सा बेहद मशहूर है. निर्माता निर्देशक विधु विनोद चोपड़ा इस फिल्म के संगीत के लिए पंचम दा के पास गए. पंचम दा ने उन्हें फिल्म का स्कोर सुनाया लेकिन विधु को वो पसंद नहीं आया, विधु बताते हैं कि उन्होनें कहा कि इस संगीत से 'आर डी' गायब हैं.

    तब पंचम दा ने उन्हें कुछ वक़्त देने के लिए कहा और फिर जब विधु वापस आए तो वो कुछ नई ही धुनों को सुन रहे थे और वो आर डी की आखिरी और शानदार परफॉर्मेंस भी थी. हमने आपके लिए 1980 के उत्तरार्ध में पंचम दा द्वारा रचे गए कुछ ऐसे ही गाने निकाले हैं जिन्हें सुनकर आपको यकीन हो जाएगा कि कैसे वो एक तकलीफ भरे समय और बदलते दौर के संगीत में भी अपने 'पंचम टच' को थामने की कोशिश कर रहे थे.

    रोज रोज आंखों तले (जीवा 1984)

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    मेरा कुछ सामान (इजाजत 1987)" isDesktop="true" id="1028882" >

     

    न जा जाने जा (जोशीले 1989)
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    तुमसे मिल के (परिंदा 1989)
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