बॉलीवुड के किस्से: सचिन भौमिक, सबसे सफल लेखक का बेहद खामोश अंत

हिंदी सिनेमा को सबसे अधिक हिट फिल्में (सलीम-जावेद की जोड़ी से भी कहीं अधिक) देने वाला लेखक अब ख़ामोश हो गया है।

इकबाल रिजवी | News18India.com
Updated: March 25, 2016, 10:30 AM IST
बॉलीवुड के किस्से: सचिन भौमिक, सबसे सफल लेखक का बेहद खामोश अंत
हिंदी सिनेमा को सबसे अधिक हिट फिल्में (सलीम-जावेद की जोड़ी से भी कहीं अधिक) देने वाला लेखक अब ख़ामोश हो गया है।
इकबाल रिजवी
इकबाल रिजवी | News18India.com
Updated: March 25, 2016, 10:30 AM IST
नई दिल्ली। हिंदी सिनेमा को सबसे अधिक हिट फिल्में (सलीम-जावेद की जोड़ी से भी कहीं अधिक) देने वाला लेखक अब ख़ामोश हो गया है। बात हो रही है सचिन भौमिक की। हिंदी सिनेमा के इतिहास का सर्वाधिक सफ़ल लेखक।  नरगिस के अभिनय के लिये याद की जाने वाल फिल्म  'लाजवंती (1958)' उनकी पहली फिल्म थी जबकि सुभाष घई की 'युवराज(2008)' अंतिम। इन पचास सालों में सचिन भौमिक ने 100 से ज़्यादा फ़िल्मों की कहानियां लिखीं जबकि 25 से अधिक फ़िल्मों के वे सह लेखक रहे।

कोलकाता में 17 जुलाई 1930 को जन्मे सचिन भौमिक की शिक्षा कोलकाता में हुई। अभी वो बीए में ही थे कि उनका पहला बांगला उपन्यास प्रकाशित हो गया। उपन्यास और कहानियों की उनकी यात्रा आगे बढ़ी तो उनके शुभ चिंतकों ने उन्हें फ़िल्मी दुनिया का रास्ता दिखाया। 1957 में बॉम्बे टाकीज़ के मालिक ज्ञान मुखर्जी के नाम एक पत्र लेकर जब सचिन भौमिक उनसे मिलने पहुंचे तो ज्ञान मुखर्जी की पत्नी सचिन का ही एक उपन्यास पढ़ रही थीं। सचिन को बॉम्बे टाकीज़ के लेखन विभाग में नौकरी मिल गयी।

कुछ ही समय में उन्होंने लाजवंती फ़िल्म की कहानी लिख दी। फिर कंपनी से और काम मिलने का इंतज़ार करने लगे। इस दौरान वे विमल राय, गुरू दत्त सहित कई लोगों से मिलकर कहानी लिखने का प्रस्ताव रखा, लेकिन उन्हें लेखन का काम नहीं मिला। एक दिन उस समय संघर्ष कर रहे ऋषीकेश मुखर्जी ने उनसे वादा किया कि वे उनसे फ़िल्म लिखवाएंगे। और कुछ समय बाद उन्होंने सचिन से फ़िल्म 'अनुराधा' लिखवाकर अपना वायदा पूरा किया।



'अनुराधा' को व्यावसायिक सफलता तो नहीं मिली, लेकिन इस फिल्म को राष्ट्रपति पुरस्कार मिला और कांस फिल्म महोत्सव में आमंत्रित की गयी। ज़्यादा से ज़्यादा भारतीय और विदेशी फ़िल्में देखने का जुनून, साहित्य में गहरी दिलचस्पी और ज़बरदस्त याददाश्त इन विषेशताओं के बल पर सचिन भौमिक ने जल्द ही अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। किसी भी देखी हुई फिल्मों के सीन उन्हें भलीभांति याद रहते थे।

कहानी लिखते हुए तत्कालीन समय की समझ और समाज की पसंद नापसंद पर उनकी गहरी पकड़ रहती थी। साथ ही कहानी सुनाने की उनकी कला भी बहुत असरदार थी, जिसके चलते वे निर्माता निर्देशक को आसानी से कायल कर लेते थे।

सचिन भौमिक जब मुंबई पहुंचे तो उन्हें अच्छी तरह से हिंदी नहीं आती थी, लेकिन मुंबई में हिंदी लेखक मित्रों की बदौलत उन्होंने हिंदी सीख ली। फिर वे फ़िल्मकारों का भाग्य बदलने वाले कहानीकार साबित होने लगे। उनकी कहानियों पर कई फ़िल्मकारों ने अपनी पहली हिट फ़िल्में दीं। जे ओमप्रकाश के लिये पहली फ़िल्म लिखी आयी मिलन की बेला(1964) यह फ़िल्म जो ओम प्रकाश की पहली हिट फ़िल्म साबित हुई। इसके बाद उनकी लगातार दो और फ़िल्में 'आए दिन बहार के' और 'आया सावन झूम के' भी हिट रहीं इनकी कहानियां भी सचिन ने ही लिखीं।

फ़िल्मकार प्रमोद चक्रवर्ती की पहली हिट फिल्म ज़िद्दी थी। इसकी कहानी सचिन के कलम से ही निकली इसके बाद सचिन ने प्रमोद के लिए 'लव इन टोक्यो', 'तुम से अच्छा कौन है','नया ज़माना', 'जुगनू', 'वारंट', 'ड्रीम गर्ल' लिखी और सभी फिल्में अपने समय की बेहद सफ़ल फ़िल्में रहीं। इसके अलावा शक्ति सामंत के लिये सचिन ने 'एन इवनिंग इन पेरिस' और 'आराधना' जैसी ट्रेंड सेटर फ़िल्में लिखीं। बप्पी सोनी के लिये 'जानवर' (1965), 'तुम हसीं मैं जवां', और 'ब्रह्मचारी' लिखी।
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ऋषीकेश मुखर्जी के लिये 'मेम दीदी','छाया','गोलमाल','अनुरोध' लिखी। नासिर हुसैन की मेगा हिट "हम किसी से कम नहीं' और "यादों की बारात" के अलावा 'कारवां (1970', सुभाष घई की ब्लाक बस्टर फ़िल्में 'कर्ज़', 'विधाता', 'कर्मा', 'सौदागर' सचिन भौमिक की लिखी हुई कहानियों पर बनीं। इसके अलावा अमिताभ की 'बेमिसाल','नास्तिक', 'दो और दो पांच' के अलावा ऋषि कपूर अभीनीत जहरीला इनसान, 'जिंदादिल' और 1975 में रिलीज हुई फिल्म 'खेल खेल में' सचिन भौमिक की ही देन थी,लेकिन इसे हिंदी फ़िल्मों का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि एक साल में कई हिट फ़िल्में लिखने वाले सचिन भौमिक और अन्य दूसरे लेखकों की हैसियत फ़िल्म उद्योग में दोयम दर्जे की ही रही।

फ़िल्म के हिट होने पर कलाकार, निर्देशक, संगीतकार, गायक और गीतकार सभी चर्चा में आ जाते थे, लेकिन लेखक गुमनाम ही रहता था। यह तो सलीम जावेद का कमाल था कि लेखक का नाम भी पोस्टर पर छपने लगा। हांलाकी सचिन भौमिक सलीम जावेद के उदय से पहले ही लगभग 20 हिट फ़िल्में दे चुके थे। वैसे भी उन्होंने जितनी हिट फ़िल्में दीं उतनी फ़िल्में कोई लेखक नहीं दे सका।

फ़िल्में लिखन के दौरान ही अभिनेत्री कल्पना से सचिन को प्रेम हो गया। कल्पना ने फिल्म प्रोफेसर में शम्मी कपूर के साथ काम किया था। बाद में सचिन और कल्पना ने शादी कर ली। लगातार सफ़लता का स्वाद चख रहे सचिन ने एक दिन निर्देशक बनने का फ़ैसला किया। उन्होंने राजेश खन्ना और शर्मीला टैगोर को साथ लेकर 1973 में 'राजा रानी' फिल्म निर्देशित की थी, जिसकी पटकथा भी उन्होंने ही लिखी थी। लेकिन फ़िल्म चली नहीं और सचिन को भी एहसास हो गया कि निर्देशन से बेहतर है कहानियां लिखना।

यह सचिन की समय के साथ अपनी सोच बदलते रहने की अद्भुत क्षमता का ही कमाल था कि दौर पर दौर बदलते रहे और सचिन कभी भी फ़िल्म उद्योग में आउट डेटेड नहीं हुए। इस बीच राही मासूम रज़ा, अली रज़ा, कमलेश्वर, गुलज़ार, और सलीम जावेद उभरे, हिट हुए और फिर ख़ामोश हो गए या फिर फ़िल्म की दूसरी धाराओं जैसे निर्देशन, गीत लेखन जैसी ज़िम्मेदारियां संभालने लगे लेकिन सचिन भौमिक पचास साल तक कहानी लेखन में ही जुटे रहे।

यह देख कर आश्चर्य होता है कि सातवें दशक में 'आन मिलो सजना' और 'आराधना' लिखने वाला लेखक तेज़ी से बदल रहे भारतीय समाज में 'करन-अर्जुन','तू खिलाड़ी मैं अनाड़ी', 'सोल्जर' और 'कोई मिल गया' जैसी फ़िल्में भी लिख देता है। सचिन की अंतिम फ़िल्मों में 'कृष', 'किसना' और 'युवराज (2008') थीं। युवराज में वे सुभाष घई और विनोद पांडे के साथ सह लेखक थे।

सौ से अधिक फ़िल्म लिखने वाले सचिन ने इससे कहीं अधिक फ़िल्मों के लिये सह लेखन भी किया। नए लेखकों के लिये सचिन के दरवाज़े हमेशा खुले रहते थे। वे परंपरावादी विचारों के आधुनिक सोच रखने वाले लेखक थे। उन्होंने फ़िल्मों में जितना सफ़ल लेखन किया उसके मुक़ाबले उन्हें पहचान नहीं मिल सकी।
अपने लंबे कैरियर में उन्हें महज़ द फ़िल्मों 1968 में 'ब्रह्मचारी' और 1969 में 'आराधना' के लिए बेस्ट स्टोरी राइटर का फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला। 12 अप्रैल 2009 को सचिन भौमिक का मुंबई में निधन हो गया।
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