छत्तीसगढ़ी फिल्म 'भूलन द मेज' को मिला नेशनल अवार्ड, जंगल में सांप और तेंदूए के खतरे के बीच हुई शूटिंग

भूलन द मेज को रीजनल सिनेमा की केटेगरी में नेशनल अवॉर्ड मिला है.

भूलन द मेज को रीजनल सिनेमा की केटेगरी में नेशनल अवॉर्ड मिला है.

नेशनल अवार्ड (National Film Awards) के लिए चयनित होने के बाद फिल्म के डायरेक्टर मनोज वर्मा को उम्मीद है कि फिल्म 'भूलन द मेज (Bhulan The Mage)' जल्द ही सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखायी देगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 23, 2021, 2:55 PM IST
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मुंबईः छत्तीसगढ़ी भाषा में बनी फिल्म 'भूलन द मेज (Bhulan The Maze)' को रीजनल फिल्म कैटेगरी में बेस्ट फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार के लिए चयनित किया गया है. प्रदेश के ही फिल्मकार मनोज वर्मा ने इस फिल्म को बनाया है वहीं इसकी शूटिंग भी महुआभाठा गांव के जंगलों में हुई है जहां कई तरह के खतरों और दिक्कतों के बाद ये फिल्म बन पायी है. मेन स्ट्रीम सिनेमा नहीं होने की वजह से अब तक 'भूलन द मेज' को देश में स्क्रीन नहीं मिल रहे थे.

लेकिन नेशनल अवार्ड (National Film Awards) के लिए चयनित होने के बाद फिल्म के डायरेक्टर मनोज वर्मा को उम्मीद है कि ये फिल्म जल्द ही सिनेमाघरों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर दिखायी देगी. न्यूज़ 18 को कैमरे के पीछे की स्टोरी बयां करते हुए फिल्म के डायरेक्टर मनोज वर्मा ने कहा कि ये फिल्म संजीव बख्शी के उपन्यास भूलन कांदा पर बनी हैइस फिल्म बनाने में मेहनत बहुत लगी और सभी कलाकारों ने जमकर मेहनत की.

उन्होंने बताया कि केशकाल के एक वैद्य ने भी भुलन कांदा का पौधा उन्हे दिखाया था जिसे पार करते ही लोग रास्ते भटक जाते हैं और मलेरिया का इलाज भी इससे ग्रामीण आदिवासी करते है. इसी रास्ते की भूल-भूलैय्या और न्याय व्यवस्था पर भूलन द मेज बनायी गयी है. पीपली लाइव जैसी फिल्मों में वक्ता के किरदार में नजर आ चुके छत्तीसगढ़िया कलाकार ओंकारदास मानिकपुरी इस फिल्म में लीड कैरेक्टर हैं.

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शूटिंग के दौरान खतरे और दिक्कतें भी आयी -

मनोज वर्मा ने बताया कि फिल्म की शुटिंग गरियाबंद जिले के महुआभाठा के जंगलों में हुई है, इस दौरान यूनिट को सोने के लिए गांव में जगह तक नहीं मिली थी,जहां सोते थे रात को तो कभी सांप तो कभी तेंदुआ आ जाता था. फिल्म से जुड़े यूनिट ने दहशत में अपनी रातें गुज़ारी है. मनोज वर्मा ने बताया कि दिक्कतें यहीं खत्म नहीं हुई, शूटिंग के वक्त हमारे कैमेरामेन को हार्ट अटेक हो गया था, लेकिन फिल्म रुकी नहीं,शहर लौटने पर मनोज वर्मा ऐक्सिडेंट हो जिसमें उनका हाथ फैक्चर हो गया था.

मनोज वर्मा ने बताया कि फिल्म बनाते समय ही सोच लिया था कि इसे नेशनल और इंटरनेशनल प्लेटफॉर्म पर जारी करना है. और अब नेशनल अवार्ड के लिए चयनित होने से उम्मीदें बढ़ गई है. मनोज वर्मा ने कहा कि फिल्म बनाने के बाद उसका कमर्शियल सक्सेस होना जरूरी है तभी कोई फिल्मकार कोई दूसरी फिल्म बनाने के बारे में सोच सकता है और इसलिए सरकार का भी सिनेमा को सहयोग करना जरूरी है.
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