एल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?
3/5
पर्दे पर : 12 अप्रैल 2019
डायरेक्टर : सौमित्र रानाडे
संगीत : अविषेक मजूमदार
कलाकार : मानव कौल, नंदिता दास, सौरभ शुक्ला
शैली : ड्रामा
यूजर रेटिंग :
0/5
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MOVIE REVIEW: राजनीति पर गहरा कटाक्ष करती है नंदिता दास और मानव कौल की नई फिल्म

सौमित्र रानाडे की ये फिल्म पुरानी फिल्म से कई मायनों में अलग है और इसे रीमेक कहा जाना गलत होगा। इन दोनों फिल्मों की थीम एक जैसी है, जैसे ये एक आम आदमी के गुस्से को दिखाती है।

News18Hindi
Updated: May 11, 2019, 9:50 AM IST
MOVIE REVIEW: राजनीति पर गहरा कटाक्ष करती है नंदिता दास और मानव कौल की नई फिल्म
फिल्म रिव्यू: एल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?
News18Hindi
Updated: May 11, 2019, 9:50 AM IST
1980 में सईद मिर्ज़ा ने जब ‘एल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है?’ बनाई थी तो किसी को नहीं लगा था कि वो फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो जाएगी. लेकिन सईद की फिल्म ने इतिहास रचा और आज जब निर्देशक सौमित्र रानाडे इस फिल्म का एक मॉर्डन रीमेक बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो इस फिल्म से इसकी तुलना हो जाना स्वाभाविक है. लेकिन ऐसा होना नहीं चाहिए क्योंकि ये दोनों ही फिल्में अलग समय और अलग तरीके से बनाई और लिखी गई हैं और इन दोनों ही फिल्मों में बहुत कुछ अलग है.

शुरूआत के लिए, रानाडे की ये फिल्म पुरानी फिल्म से कई मायनों में अलग है और इसे रीमेक कहा जाना गलत होगा. इन दोनों फिल्मों की थीम एक जैसी है, जैसे ये एक आम आदमी के गुस्से को दिखाती है. नसीर और शबाना के अभिनय से सजी उस फिल्म में एक आम आदमी को उसके पिता की पिटाई होने के बाद समझ आता है कि अमीर और गरीब के बीच का फर्क क्या होता है. सईज मिर्ज़ा की फिल्म आपातकाल के बाद आई थी और इस फिल्म में हर वो बात थी जो भारतीय राजनीति की कमियों को उजागर करती थी.



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सौमित्र रानाडे का एल्बर्ट, जिसका रोल मानव कौल ने निभाया है, एक नौजवान है जिसका खून गर्म है. अपने पिता को एक झूठे गबन के इल्जाम में फंसते देख बौखला जाता है. जहां सईद की फिल्म मार्क्सवाद और पूंजीवाद के बीच की खाई को दिखाती थी. सौमित्र की फिल्म में बदला हुआ भारत दिखता है जिसे करप्शन ने डस लिया है.



एल्बर्ट एक सुपारी किलर नायर (सौरभ शुक्ला) के साथ एक खतरनाक मिशन पर गोआ निकल जाता है और इस दौरान नंदिता दास के रुप लगातार बदलते रहते हैं. क्यों और किसलिए, ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी. लेकिन इतना कहा जा सकता है कि इस फिल्म के रिलीज़ का इससे अच्छा समय कोई हो ही नहीं सकता था.

रानाडे ने अपनी फिल्म में आज की राजनीति का चित्र खींचा है. वो राजनीति और इसके काम करने के तरीकों की अच्छी समझ रखते हैं और ये इस फिल्म में दिखता है. जहां सईद की फिल्म के अंत में उम्मीद थी, इस फिल्म के अंत में एक निराशा है. फिल्म में अपनी कमियां हैं, लंबे संवाद, कमज़ोर पड़ते किरदार, लेकिन इस फिल्म को देखने के बाद आपको लगता है कि निर्देशक ने इस फिल्म के माध्यम से एक सच्चा चेहरा बुनने की कोशिश की है. इस फिल्म के ज़रिए वो कोशिश करते हैं कि भ्रष्टाचार के प्रति आवाज़ उठाने में अपना योगदान दे सकें और कुछ हद तक वो सफल भी होते हैं.
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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3/5
स्क्रिनप्ल :
3.5/5
डायरेक्शन :
3/5
संगीत :
2.5/5
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