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भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया
भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया
2/5
पर्दे पर:13 अगस्त, 2021
डायरेक्टर : अभिषेक दुधैया
संगीत : गौरव दासगुप्ता, तनिष्क बागची, आर्को, लीजो जॉर्ज - डीजे चेतस
कलाकार : अजय देवगन, संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, शरद केलकर, नोरा फ़तेही, प्रणिता सुभाष आदि
शैली : वॉर/पीरियड ड्रामा.
यूजर रेटिंग :
0/5
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Bhuj Review: 'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' में अभिमान लायक कुछ नहीं है

'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' में अजय देवगन ने स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक की भूमिका निभाई है.

'भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया' में अजय देवगन ने स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक की भूमिका निभाई है.

Bhuj Review: फिल्म निहायत ही बोरिंग है. न कहानी ठीक से बनायी गयी है न ही एडिट ठीक से की गयी है. स्पेशल इफेक्ट्स में बहुत पैसे लगाए गए हैं जो कि बर्बाद होते नज़र आते हैं. फिल्म बनाने के पीछे जो भी उद्देश्य रहा हो, न तो लेखक और न निर्देशक इस कदर खराब काम की ज़िम्मेदारी से भाग सकते हैं.

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Bhuj Review: 24 घंटे के अंतर में आप देश प्रेम की दो फिल्में देखते हैं. एक को देखने पर लगता है कि उसको बनाने में रिसर्च की गयी है और कलाकारों से अच्छा अभिनय करवाया गया है, अच्छा निर्देशन है. दूसरी को देख कर लगता है कि ये क्यों बनायी गयी है? भुज-द प्राइड ऑफ इंडिया में अच्छी फिल्म बन पाने के सभी फॉर्मूले मौजूद थे. रियल लाइफ स्टोरी, देशभक्ति, युद्ध, अदम्य साहस की कहानी, बहुत ही हम समय में एक बड़ा काम करने का चैलेंज, अजय देवगन जैसा हीरो, सोनाक्षी सिन्हा, संजय दत्त और शरद केलकर जैसे कलाकार लेकिन फिल्म का लचर स्क्रीनप्ले और उस से भी वाहियात डायरेक्शन ने फिल्म का पूरा मज़ा किरकिरा कर दिया है.

15 अगस्त एक ऐसा दिन होता है जब पूरे हफ्ते हमारे देशभक्तों के अंदर राष्ट्र प्रेम की भावनाएं दौड़ रही होती हैं. आदमी कितना भी खड़ूस मिजाज का क्यों न हो, आजादी का दिवस उसके लिए भी महत्वपूर्ण होता है. इस पूरे हफ्ते कभी थोड़ी और कभी ज़्यादा देशभक्ति हिलोरें लेती है. इस वर्ष तो भारत की आज़ादी की 75 वीं वर्षगांठ है, तो इस वक़्त रिलीज होने वाली हर फिल्म को बेह्तरीनतम होना चाहिए. कम से कम 75 दिन सिनेमा हॉल में चले इतना मसाला तो होना चाहिए। भुज सभी डिपार्टमेंट में मार खाती है. अजय देवगन ने कई खराब फिल्में की होंगी लेकिन भुज जैसी अजीबोगरीब फिल्म उन्हें भी शायद पसंद नहीं आएगी.

असल कहानी भुज जिले के मधापुर गांव की सुंदरबेन और वहां की 300 औरतों की थी. इन औरतों ने दिन रात एक कर के पाकिस्तानी विमानों से गिराए गए नेपाम बम की वजह से ध्वस्त भुज की हवाई पट्टी को फिर से बनाया जबकि पाकिस्तान के फिर से हमले होने का खतरा पूरे समय मंडराता रहा. 72 घंटे में हवाई पट्टी फिर से बनी और पाकिस्तान के आक्रमण को रोकने के लिए भारत की सेना वहां हवाई जहाज लैंड करवा सकी. हवाई पट्टी के निर्माण का पूरा काम भुज हवाई अड्डे के इंचार्ज स्क्वाड्रन लीडर विजय कर्णिक (पूरी फिल्म में इन्हें ‘कार्निक’ कहा गया है, जिस भी किसी मूढ़ को उच्चारण नहीं पता हो उसकी वजह से) की सूझ बूझ और देख रेख में हुआ. महिलाओं को ऐसी साड़ियां पहनाई गयी जो मिटटी से बहुत अलग न दिखें और उन्हें साईरन बजने पर अपनी रक्षा कैसी करनी है, उनके खाने पीने की व्यवस्था जैसी छोटी छोटी चीज का भी ख्याल रखा गया था. फिल्म में इसको इतना सतही तरीके से “निपटाया” गया है कि मन ख़राब हो जाता है.

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अजय देवगन की इस फिल्म में सोनाक्षी स‍िन्‍हा का अहम क‍िरदार है.

फिल्म के कमजोर पहलू एक नहीं कई हैं. सबसे पहले कहानी की ही बात कर लेते हैः. फोकस हवाई पट्टी के पुनर्निर्माण पर रखना था, रखा गया अजय देवगन को हीरो बनाने के लिए जबकि अजय के मन में कभी अपने रोल्स को ले कर असुरक्षा नहीं रही है. खैर, निर्देशक अभिषेक दुधैया ने रमन कुमार के साथ मिल कर पटकथा लिखी है. रमन ने पहले अभिषेक के लिए ‘एहसास’ नाम का टेलीविजन सीरियल लिखा है. ये बात आप साफ समझ सकते हैं कि टेलीविज़न का हैंगओवर कितना भारी पड़ा है. इतनी अजीबोगरीब स्क्रिप्ट लिखी गयी कि कोई कनेक्शन नहीं बैठ रहा था. फिर संभवतः स्क्रिप्ट सुधारने के लिए रितेश शाह को बुलाया गया. रितेश ने कहानी, पिंक, रेड, डी डे जैसी कई फिल्में लिखी हैं. उनकी डायलॉग्स पर भी पकड़ अच्छी है. पूजा भावोरिया भी इसकी कहानी और पटकथा से जुडी हैं, लेकिन उनका कंट्रीब्यूशन समझा नहीं जा सका. बात यहाँ ख़त्म नहीं हुई. फिल्म में एडिशनल डायलॉग लिखने के लिए मनोज मुन्तशिर को भी जोड़ा गया. फिल्म का मूल कथानक प्रेरणादायी है, कुछ इसी तर्ज़ पर परमाणु फिल्म बनी थी. लेकिन भुज, एकदम ठंडी पड़ गयी. एक साथ 3-4 कहानियां चलाने की कोशिश की गयी है, किरदारों को डेवलप होने ही नहीं दिया गया और अचानक ढेर सारे किरदार नजर आते हैं जो एक एक डायलॉग बोले के चले जाते हैं. ये फिल्म पूरी तरह से फिर से लिखी जानी चाहिए.

एडिटिंग धर्मेंद्र शर्मा ने की है. संभवतः अजय देवगन की फिल्म कंपनी में काम करते हैं क्योंकि उनकी सभी फिल्मों की एडिटिंग धर्मेंद्र ने ही की है. कमज़ोर पटकथा को बेहतरीन एडिटिंग से बचाया जाना चाहिए. लेकिन एडिटर साहब ने फिल्म की पटकथा से मैच करते हुए बड़ी ही कमज़ोर एडिटिंग की है. क्या एडिटिंग में फालतू किरदारों को निकला जा सकता था, हाँ. क्या एडिटिंग से मुख्य किरदारों को एक सही दिशा मिल सकती थी, हाँ. क्या एडिटिंग से कहानी को टूटने से बचाया जा सकता था, हाँ. क्या एडिटिंग से सब एक सूत्र में पिरोये जा सकते थे, हां. लेकिन ऐसा किया नहीं गया. फिल्म इतनी कहानियां साथ ले कर चलती हैं कि भुज का नामा बोझ होना चाहिए था.

Bhuj The Pride of India

अजय देवगन की फिल्‍म ‘भुज’ का एक सीन.

सिनेमेटोग्राफर असीम बजाज भी अजय देवगन के चहीते हैं. उनकी तकरीबन हर फिल्म में होते हैं. असीम के पास सम्भावना थी कि वो फिल्म के हर ट्रैक को अलग अलग तरीके से शूट करते ताकि दर्शकों को उनके अलग होने का एहसास हो सके. एयरपोर्ट पर हमला, अजय देवगन का ट्रैक, नोरा फ़तेही का ट्रैक, शरद केलकर का ट्रैक, संजय दत्त का ट्रैक. सब अलग अलग तरीके से फिल्माए जाते और फिर आपस में मिल जाते, बात कुछ और होती.

फिल्म में एक्टर्स के लिए कुछ रखा ही नहीं गया था. अजय देवगन, देश भक्ति के डायलॉग बोलते हुए भी विचित्र लगते हैं. वो एयरपोर्ट इंचार्ज थे और उनका काम एयरपोर्ट रनवे रिपेयर करवाना था, जिस तरीके से वो एंटी-एयरक्राफ्ट गन का इस्तेमाल करते हैं वो बहुत फूहड़ लगता है. आगे जा कर वो और उनकी पत्नी उषा (प्रणिता सुभाष) रोड रोलर भी चलाते हैं. देशभक्ति की सत्य घटनाओं पर आधारित शेरशाह में कम से कम देशभक्ति को ताली-पीटो किस्म के डायलॉग के ज़रिये तो नहीं दिखाया गया था जबकि कैप्टेन विक्रम बत्रा निजी ज़िन्दगी में बड़े ही वाचाल थे. अजय देवगन फ़िल्मी डायलॉग भी बोलते हैं और “बिज़ी विदाउट बिज़नस’ नज़र आते रहते हैं. अजय के करियर का ये सबसे कमज़ोर किरदार है.

प्रणिता सुभाष की लगातार दूसरी फिल्म है (हंगामा 2) जिसमें उनसे निराशा हुई है. भुज में तो बोलने के लिए भी कुछ नहीं था. शरद केलकर, तान्हाजी के बाद फिर अजय देवगन के साथ नज़र आये हैं. रोल अच्छा था, शरद ने निभाया भी ठीक से. खुद मलयाली आर्मी अफसर बने थे लेकिन उन्होंने एक मुस्लिम लड़की ज़ीनत से शादी की जो पैरों से अपाहिज थी. इसका मूल कहानी से कोई ताल्लुक नहीं था. संजय दत्त को एक अजीब सी भूमिका मिली थी रणछोड़दास राबड़ी “पागी” की. संजय दत्त, अजय के करीबी मित्र हैं और ये फिल्म भी इसीलिए की गयी. अपनी ही पुरानी फिल्म “ज़िंदा” जैसा संजय इसमें अपनी कुल्हाड़ी लेकर पाकिस्तानी फौजियों को गाजर मूली समझ कर काट रहे होते हैं और वो फौजी स्वयं आ कर काटने को उद्यत भी रहते हैं. फूहड़ एक्शन लगा. संजय दत्त की पगड़ी और आँखों का सुरमा उनका नशा छुपा नहीं पाता है. bhuj trailer, bhuj the pride of india

सोनाक्षी सिन्हा के लिए ये भूमिका बहुत अच्छी हो सकती थी लेकिन फिल्म के लेखकों ने फिल्म, अजय देवगन के लिए लिखी थी. सोनाक्षी का किरदार पूरी तरह से व्यर्थ हो गया. अचानक से वो तेंदुए को गाय पर हमला करने से बचाती है और दरांती से उसका गला काट देती है. अगले पल वो गाँव की गोरियों को देशभक्ति का पाठ पढ़ाने लग जाती है. ऐसा अधकचरा कैरेक्टर डेवलपमेंट टेलीविज़न सीरियल में चल जाता है, लेकिन फिल्मों में नहीं. पंजाबी सिंगर एमी विर्क ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. ये वाला ट्रैक नहीं होता तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता? एमी ने हालाँकि ठीक काम किया है और इस चक्कर में उनकी पहली फिल्म “भुज” बन गयी न कि क्रिकेट वाली कबीर खान की “83”. फिल्म में एक ट्रैक और है नोरा फतेही का जो कि पाकिस्तान के इंटेलिजेंस चीफ की पत्नी बन कर भारत के लिए जासूसी करती है, और अपने शहीद जासूस भाई की मौत का बदला लेना चाहती है. एक और अजीब ट्रैक जिसका फिल्म में होना या न होना बराबर था. नोरा को डांस का जलवा दिखाने का अवसर भी नहीं मिला है. अभिनय और एक्शन करने का असफल प्रयास किया है उन्होंने.

फिल्म निहायत ही बोरिंग है. न कहानी ठीक से बनायी गयी है न ही एडिट ठीक से की गयी है. स्पेशल इफेक्ट्स में बहुत पैसे लगाए गए हैं जो कि बर्बाद होते नज़र आते हैं. फिल्म बनाने के पीछे जो भी उद्देश्य रहा हो, न तो लेखक और न निर्देशक इस कदर खराब काम की ज़िम्मेदारी से भाग सकते हैं. जिन महिलाओं ने 72 घंटे दिन रात मज़दूरी कर के भुज की हवाई पट्टी का पुनर्निर्माण किया उन्हें ये लगता था कि वो देश के लिए कुछ कर रहे हैं. फिल्म, अजय देवगन पर इतना फोकस करती है कि जीवट और अदम्य साहस की इस कहानी का कद बहुत छोटा कर दिया. इसकी सजा भुगतनी पड़ेगी. लोग देखेंगे ज़रूर क्योंकि फिल्म में बड़े बड़े नाम हैं, लेकिन दुखी होंगे क्योंकि फिल्म का लेखन और निर्देशन एकदम नौसीखिया किस्म का है. नहीं देखेंगे तो आपके अभिमान को ठेस नहीं पहुंचेगी क्योंकि उसके लिए फिल्म में कुछ नहीं है. यहाँ तक कि संगीत भी ऐसा नहीं कि आपको कुछ याद रहे.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
1.5/5
स्क्रिनप्ल:
1.5/5
डायरेक्शन:
1.5/5
संगीत:
2/5

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