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कोल्ड केस
कोल्ड केस
3.5/5
पर्दे पर:30 जून, 2021
डायरेक्टर : तनु बालक
संगीत :
कलाकार : पृथ्वीराज सुकुमारन, अदिति बालन, सुचित्रा पिल्लई, लक्ष्मी प्रिया चंद्रमौली और अन्य
शैली : थ्रिलर, हॉरर, मिस्ट्री
यूजर रेटिंग :
0/5
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Cold Case Review: थोड़ा सा ही सही मगर ठंडा है ये 'कोल्ड केस'

कोल्ड केस पोस्टर (फोटो साभारः यूट्यूबः Amazon Prime Video India)

कोल्ड केस पोस्टर (फोटो साभारः यूट्यूबः Amazon Prime Video India)

दक्षिण भारत में पिछले कुछ सालों में फिल्मकारों ने मर्डर मिस्ट्री (Murder Mystery) के दोसे के साथ हॉरर की चटनी परोसी है. नए फ़िल्मकार तनु बालक (Tanu Balak) ने अपनी पहली फिल्म 'कोल्ड केस (Cold Case)" में ऐसा ही कुछ हासिल किया है.

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मुंबईः एक फिल्मकार के लिए सबसे बड़ा ख्वाब तब होता है जब वो एक बड़े सितारे को अपनी पहली फिल्म में निर्देशित करे, अपनी पसंद की कहानी पर फिल्म बना पाए और सबसे बड़ी बात, दो ऐसे जॉनर मिला कर फिल्म बनाये जिसमें फिल्म बनाने की हिम्मत कम लोग करते हैं. दक्षिण भारत में पिछले कुछ सालों में फिल्मकारों ने मर्डर मिस्ट्री (Murder Mystery) के दोसे के साथ हॉरर की चटनी परोसी है. नए फ़िल्मकार तनु बालक (Tanu Balak) ने अपनी पहली फिल्म ‘कोल्ड केस (Cold Case)” में ऐसा ही कुछ हासिल किया है. अमेज़ॉन प्राइम (Amazon Prime Video) पर रिलीज़ इस फिल्म में पृथ्वीराज सुकुमारन और अदिति बालन ने एक नए प्रयोग को अंजाम दिया है, जो फिल्म देखने के लिए मजबूर करता है.

मर्डर मिस्ट्री में दो लोग होते हैं. एक जिसकी हत्या हुई हो और एक जो हत्यारा हो. पुलिस हमेशा हत्यारे की खोज करती है और उस तक आखिर में पहुँचती है. पुलिस को हत्या की वजह ढूंढने में ज़्यादा समय नहीं लगता है और इस वजह से वो हत्यारे तक आसानी से पहुंच जाते हैं. लेकिन कोल्ड केस थोड़ी अलग कहानी है. एक तालाब में एक मनुष्य की खोपड़ी मिलती है और एसीपी सत्यजीत (पृथ्वीराज) को ज़िम्मेदारी दी जाती है इस क्राइम को सुलझाने की. दूसरी ओर “भूत प्रेत” की घटनाओं पर टीवी पर एक खोजी प्रोग्राम करने वाली पत्रकार मेधा (अदिति बालन) अपने पति से अलग अपनी बेटी के साथ एक नए घर में रहने आती है जहां उसे एक अदृश्य शक्ति के होने का एहसास होता है.

अपनी बेटी की सुरक्षा को लेकर चिंतित मेधा, एक तांत्रिक ज़ारा ज़की (सुचित्रा पिल्लई) की मदद लेती है जो उसे बताती है कि इस घर में ईवा मारिया नाम की लड़की की आत्मा रहती है और वो मेधा से किसी तरह की मदद चाहती है. मेधा इस केस पर टीवी प्रोग्राम बनाना चाहती है और वो मामले की छानबीन शुरू करती है. कोल्ड केस में कई पेचीदगियां हैं. पुलिस की जांच कई बाधाओं से गुजरती है. एसीपी सत्यजीत अपने तेज़ दिमाग और उपलब्ध सबूतों की मदद से फॉरेंसिक डिपार्टमेंट की मदद लेता है. उसे भी ये पता चलता है कि संभवतः वो खोपड़ी ईवा मारिया नाम की लड़की की है.

दो अलग अलग तरीकों से जांच होने लगती है. एक तरफ मेधा एक तरफ सत्यजीत. मेधा के पास जांच के अपने तरीके होते हैं, और पुलिस के पास कहीं भी जा कर, किसी से भी पूछताछ कर के केस सॉल्व करने की शक्ति. यहाँ लेखक श्रीनाथ वी नाथ के दिमाग का कमाल देखने को मिलता है कि पूरी जांच में सत्यजीत और मेधा आपस में टकराते नहीं हैं. दोनों अपने अपने तरीके से केस की गुत्थी सुलझाने में लगे हैं और उनके काम करने का तरीका भी अलग ही रहता है. जहाँ सत्यजीत को सबूत और सच्चाई के साथ विज्ञान की मदद लेनी पड़ती है वहीँ मेधा अपने घर में हो रही पैरानॉर्मल घटनाओं से परेशान हो कर ईवा मारिया की तलाश में लगी रहती है. अंततः एक बड़े ही सामान्य से सबूत के ज़रिये सत्यजीत और मेधा मिलते हैं और फिर आपस में बातचीत के ज़रिये वो इस केस को सुलझा लेते हैं, अपराधी गिरफ्तार हो जाता है. फिल्म का अंत भी सस्पेंस से भरा है. पैरानॉर्मल इन्वेस्टिगेटर ज़ारा ज़की को एक बार फिर एहसास होता है कि कोई और आत्मा शायद मेधा से मदद मांगने वाली है. ये आत्मा कौन है ये आखिरी शॉट में दिखाया गया है.

फिल्म की कहानी बहुत घुमावदार नहीं है और इसी वजह से फिल्म देखते हुए दर्शक भी घटनाओं के बारे में जान पाते हैं. हॉरर दृश्यों में ज़रूर शॉक लगता रहता है और एक अनजाना डर लगता है लेकिन वो डर वीभत्स नहीं है. लेखक ने एक बात और ध्यान में रखी है कि छोटी बच्ची के किरदार पर भूत के होने का कोई प्रभाव नहीं दिखाया है और उसकी मासूमियत को मोहरा नहीं बनाया है. मेधा चूंकि पैरानॉर्मल इन्वेस्टीगेशन का टीवी प्रोग्राम डायरेक्ट और प्रेजेंट करती हैं, उन्हें घर में भूत की उपस्थिति से डर तो लगता है लेकिन इस बात की दहशत नहीं होती और वो अचानक चीखने चिल्लाने नहीं लगती जैसा कि हॉरर फिल्मों में अक्सर होता है. मेधा के किरदार में जो मच्योरिटी दिखाई गयी है वो कम देखने को मिलती है. उनका तलाक हो रहा है और कोई उन पर सवाल नहीं खड़े कर पा रहा. वो अपनी बॉस के सवालों से बचते हुए ऑफिस टाइम में घर तलाश करने चली जाती हैं और ये बहुत रीयलिस्टिक लगा है.

पृथ्वीराज एक अत्यंत सफल और काबिल अभिनेता हैं. उन्होंने इसके पहले भी पुलिस अधिकारी के किरदार निभाए हैं लेकिन इसमें उन्हें अपनी सोच पर बहुत निर्भर रहना पड़ा है और इस वजह से उनके किरदार पर विश्वास किया जा सकता है. वो कहीं भी गुंडों को पीट नहीं रहे हैं बल्कि बड़ी ही समझदारी से इन्वेस्टीगेशन कर रहे हैं और मर्डर मिस्ट्री में इसी तरह के किरदार की ज़रुरत होती है. लेखक को इस बात के लिए सलाम. पृथ्वीराज सुपरस्टार हैं लेकिन फिल्म से बड़े नहीं दिखाए गए हैं. उनकी निजी ज़िन्दगी में झाँकने के मोह से लेखक और निर्देशक दोनों बचे हैं.

अदिति बालन ने भी प्रभावित किया है हालाँंकि वो अभी काफी नयी हैं और उनके पास काफी समय है अपना जौहर दिखाने का. फिल्म की एक अनूठी बात है की पृथ्वीराज और अदिति के बीच कोई रोमांटिक ट्रैक नहीं बनाया गया है, दोनों पर कोई गाना नहीं फिल्माया गया है और उनकी पहली मुलाक़ात के 10 मिनट के भीतर ही फिल्म ख़त्म हो जाती है. फिल्म के जिस किरदार ने थोड़ा निराश किया वो है सत्यजीत की बॉस नीला (पूजा मोहनराज) ने. पृथ्वीराज के साथ उनके सभी दृश्यों में वो पृथ्वीराज के प्रेम में पड़ी महिला ज़्यादा लगी हैं बजाये कि उनके बॉस के. सुचित्रा पिल्लई के किरदार ने कहानी में एक नया रंग जोड़ा और वो बहुत ही आकर्षक था लेकिन उनका भूत से बात करने का तरीका मज़ाकिया बन गया था. बाकी कलाकार सामान्य थे, उनका अभिनय अच्छा था लेकिन भीड़ में से हट कर किसी को इम्प्रेस कर सके ऐसा नहीं था.

फिल्म के एक प्रोड्यूसर शमीर मुहम्मद ही फिल्म के एडिटर भी हैं. फिल्म लम्बी होने के बावजूद बांधे रखती है और इसका बहुत बड़ा कारण शमीर हैं. कोई दृश्य दूसरे दृश्य पर भारी नहीं पड़ा है और हॉरर दृश्यों में भी उन्होंने डर को उस क़दर हावी नहीं होने दिया है कि दर्शक मूल कहानी को भूल जाएं. शमीर एक प्रतिभाशाली एडिटर हैं और इनसे और बेहतर काम देखने को मिलेगा ऐसी उम्मीद है. सिनेमेटोग्राफर गिरीश गंगाधरन का काम आप पहले कई फिल्मों में देख चुके हैं. अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर धमाल मचा चुकी फिल्म “जेल्लीकेतु” में इन्होने जो कैमरा से जादू किया था उसकी छोटी झलक कोल्ड केस में देखने को मिलती है. संगीत में कुछ खास है नहीं. बस एन्ड क्रेडिट में एक बड़ा ही विचित्र अंग्रेजी गाना बजाय गया है, कारण समझ नहीं आया.

फिल्म में सब कुछ अच्छा ही लगता है लेकिन फिल्म दो अलग अलग जॉनर (मर्डर मिस्ट्री और हॉरर) की दो नावों पर सवार है. इसमें जो कमी लगी वो थी किसी भी किरदार के प्रति दर्शकों की सहानुभूति न हो पाना. न पुलिस की बुद्धिमत्ता पर तालियां बजाने का मन करता है और न ही मेधा और उसकी बच्ची का भूतिया घर में रहने से हमें कुछ महसूस होता है. इस तरह की फिल्मों में किसी एक किरदार से जुड़ाव होना ज़रूरी होता है तभी दर्शक इस फिल्म को दूसरों को बताते हैं. कोल्ड केस में थोड़ी रिश्तों की गर्माहट और हो जाती तो फिल्म कमाल कर जाती. जब क्लाइमेक्स के नज़दीक हम पहुंचते हैं और हमें पता चलता है कि खूनी कौन है, हमें निराशा होती है. फिल्म देखनी चाहिए, क्योंकि दो जॉनर की फिल्म बहुत दिनों के बाद देखने को मिली है और पृथ्वीराज बहुत खूबसूरत नज़र आते हैं.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
/5
स्क्रिनप्ल:
/5
डायरेक्शन:
/5
संगीत:
/5

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