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फील्स लाइक इश्क (नेटफ्लिक्स)
फील्स लाइक इश्क (नेटफ्लिक्स)
/5
पर्दे पर:23 जुलाई, 2021
डायरेक्टर : रुचिर अरुण, ताहिरा कश्यप खुराना, आनंद तिवारी, दानिश असलम, सचिन कुंडालकर, जयदीप सरकार
संगीत : मानस शिखर, आयुष्मान खुराना, समीर कौशल
कलाकार : राधिका मदान, अमोल पाराशर, सबा आज़ाद, स्कन्द ठाकुर, नीरज माधव और अन्य
शैली : रोमांस/कॉमेडी/ड्रामा
यूजर रेटिंग :
0/5
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Feels like Ishq Review: प्यार का तरीका पुराना मगर लिखने वाले कमाल है 'फील्स लाइक इश्क'

फील्स लाइक इश्क़ में 6 अलग-अलग कहानियां हैं. फाइल फोटो

फील्स लाइक इश्क़ में 6 अलग-अलग कहानियां हैं. फाइल फोटो

Feels like Ishq Review: इस पूरी एन्थोलॉजी में इंटरव्यू एकलौती ऐसी फिल्म है जो मध्यमवर्ग की बात करती है, बाकी सब फिल्में अभिजात्य वर्ग की सेटिंग में बनी हैं. इस से कहानी में फर्क नहीं पड़ता बल्कि उस वर्ग की जिन्दगी में झांकने का एक सुनहरा अवसर है. कथानक सतही नहीं हैं और डिप्रेशन से दूर रखे गए हैं. अच्छी फ़िल्में हैं. देखिये, पसंद आएंगी. मन में रोमांस की मीठी दोपहरी वाली खुमारी भी मिल जायेगी.

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एन्थोलॉजी स्टोरीज में नेटफ्लिक्स का कोई जवाब नहीं है. करण जौहर के साथ ‘लस्ट स्टोरीज’ हों या सत्यजीत रे की कहानियों पर बनी ‘रे’, नेटफ्लिक्स ने छोटी छोटी कहानियों को एक सूत्र में पिरोकर ‘एक कहानी’ या ‘कथासागर’ या ‘सैटरडे सस्पेंस’ जैसे टेलीविज़न सीरियल्स की याद दिला दी जहाँ कहानी का मूल भाव एक होता था लेकिन कहानियां अलग अलग होती थीं. हाल ही में नेटफ्लिक्स ने नए निर्देशकों को लेकर एक नयी एन्थोलॉजी रिलीज़ की है – फील्स लाइक इश्क़. नाम से ज़ाहिर है कि इसमें लव स्टोरीज होंगी. रोमांस होगा और थोड़ा ड्रामा भी होगा क्योंकि उसके बगैर तो फिल्म बन नहीं सकती. ख़ुशी की बात ये है कि ये लव स्टोरीज खुश हैं, गम से थोड़ी अनजान भी हैं और दिल को अच्छी लगती है क्यों कि ज़िन्दगी के किसी हिस्से से थोड़ी मिलती जुलती भी हैं.

फील्स लाइक इश्क़ में 6 अलग अलग कहानियां हैं जो अर्बन यानी शहर के लोगों के प्यार को कोमल हाथों से संभालती हुई चलती हैं. सब कहानियां अच्छी हैं ऐसा नहीं हैं लेकिन जो अच्छी हैं, वो इतनी अच्छी हैं मानों किसी विदेशी रेस्ट्रोरेंट में जाकर कोई अनजानी सी डिश ऑर्डर की जाए और वो अच्छी निकल जाए. रोमांस के तरीकों में सदियों से बदलाव नहीं आया है लेकिन रोमांस या प्रेम अब अलग हांड़ी में पकता है.

पहली कहानी ‘सेव द डेट’ के निर्देशक हैं रुचिर अरुण. टीवी का तजुर्बा है, कोलकाता के रहने वाले रुचिर ने एफटीआयआय से निर्देशन और पटकथा लेखन में डिप्लोमा हासिल किया. कुछ सीरियल्स और फिल्में लिखीं, कुछ ऐड फिल्म्स बनायीं, कुछ टीवी सीरीज निर्देशित की जिसमें एक आधुनिक परिवार के सदस्यों की आपसी जद्दोजहद की हलकी फुलकी लेकिन भावनाओं में गंभीर कहानी थी – व्हाट द फोक्स।नेटफ्लिक्स की इस एन्थोलॉजी में रुचिर ने उसी फ्लेवर को लाने को कोशिश की है लेकिन कहानी में थोड़ी विश्वसनीयता की कमी है. ज़िन्दगी के किस किस्से से प्रभावित हो कर ये कहानी लिखी गयी है वो समझ नहीं आता क्योंकि डेस्टिनेशन वेडिंग का कॉन्सेप्ट अभी भी बहुत नया है है. इस फिल्म को राधिका मदान और अमोल पाराशर की ज़बरदस्त केमिस्ट्री और कुछ बहुत बेहतरीन डायलॉग्स ने बचाया है. मनीषा त्यागराजन ने इस फिल्म को लिखा है और उनकी मानवीय भावनाओं को समझने की क्षमता बाकियों से काफी अलग नज़र आयी है. फिल्म में थोड़ा विश्वास कम भी हो तो भी इतना बढ़िया स्क्रीनप्ले आपको कम देखने मिलेगा.

अगली कहानी की निर्देशिका हैं ब्रैस्ट कैंसर सर्वाइवर और लेखिका ताहिरा कश्यप खुराना. ताहिरा चंडीगढ़ की रहने वाली हैं और उन्होंने कहानी भी पंजाब के छोटे से बड़े होते शहर में ही बसाई है. ताहिरा खुद बहुत अच्छा लिखती हैं, और उनकी किताबें पसंद भी की जाती रही हैं लेकिन उन्होंने इस बार उन्होंने ग़ज़ल धालीवाल की कहानी चुनी ‘क्वारंटीन इश्क़’. ग़ज़ल इस से पहले क़रीब क़रीब सिंगल, एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, वज़ीर और कुख्यात “लिपस्टिक अंडर माय बुरखा” जैसी फिल्में लिख चुकी हैं. फिल्म में काजल चुघ ने एक एनआरआई लड़की की भूमिका निभाई है जो अपने पिंड आती है और लॉकडाउन की वजह से अपने घर में फंस जाती है. घर में और कोई नहीं है तो खाने के लिए सामने रहने वाली आंटी से परिचय निकाला जाता है और आंटी के फ़ोन से उनका टीन ऐजर बेटा मिहिर आहूजा बात करने लगता है. पार्ट टाइम क्रश की ये कहानी एकदम नदी की तरह निर्बाध बहती है और प्यार की फीलिंग्स के लिए घर से खाना लाने का मेटाफर इस्तेमाल किया गया है जो बहुत ही स्वीट लगता है. दोनों अभिनेताओं ने कमाल काम किया है. अपने अपने घर की छत पर बैठ कर प्रोजेक्टर से हॉरर फिल्म देखने वाला आयडिया कमाल रोमांस है. गाने भी हैं और बहुत अच्छे हैं – आयुष्मान खुराना ने गाये हैं. एक गाने (किन्नी सोनी) में पंजाबी और अंग्रेजी गाने का फ्यूशन बनाया गया है जो बहुत मधुर लगता है. मैं तेरा हो गया गाना एकदम आयुष्मान के मिज़ाज का लगता है और फिल्म में बहुत सूट करता है. ताहिरा से अब एक बड़ी फिल्म की उम्मीद करना चाहिए.

तीसरी कहानी लिखी सौरभ जॉर्ज स्वामी ने है और डायरेक्ट की है आनंद तिवारी ने. सौरभ ने इन्डोनेशियाई टेलीविजन सीरीज लिखी हैं और करीब करीब 1500 से ज़्यादा एपिसोड्स लिखने का उनके पास अनुभव है. कहानी का नाम है स्टार होस्ट. आजकल कई लोग पहाड़ों में या टूरिस्ट प्लेसेस में अपने बंगले बना लेते हैं जो उनके लिए हॉलिडे होम की तरह होते हैं. इन बंगलों को बाकी समय होमस्टे या किराये पर दिया जाता है. सुप्रसिद्ध अमेरिकन कंपनी एयर बीएनबी का पूरा बिज़नेस मॉडल इस बात पर खड़ा किया गया है. ऐसे ही एक बंगले के मालिक के पुत्र (रोहित सराफ) अपने माता पिता के बाहर जाने के बाद और नॉर्थेर्न लाइट्स देखने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए, अपने पिता के बंगले को किराये पर देने का काम करते हैं. उनके पहले गेस्ट एक कपल होते हैं लेकिन किसी वजह से कपल में से सिर्फ लड़की (सिमरन जेहानी) ही आ पाती हैं क्योंकि उस कपल की आपस में लड़ाई हो जाती है. आगे की कहानी टूटे दिल को जोड़ने की नहीं है बल्कि दो अलग अलग मिज़ाज के लोगों के बीच पनपते अबोले रोमांस की है. महाबलेश्वर की खूबसूरत लोकेशन की शूटिंग की वजह से प्रकृति का एक बहुत बड़ा हिस्सा कहानी में एक किरदार बना रहता है. छोटे से कैफ़े में जा कर खाना खाना हो या जुगनुओं की चमक देखनी हो, ये रोमांस थोड़ा अलग है. आनंद तिवारी प्रतिभाशली एक्टर हैं, प्रोड्यूसर और एकदम नए किस्म के डायरेक्टर हैं जो किरदारों पर काफी मेहनत करते हैं. फिल्म में रोहित सराफ ने बहुत अच्छा काम किया है और सिमरन को फिर से बड़े परदे का रुख करना चाहिए.

चौथी कहानी है ‘शी लव्स मी, शी लव्स मी नॉट’. सुलग्ना चटर्जी की लिखी इस कहानी को इस एन्थोलॉजी की सबसे कमज़ोर कहानी माना जा सकता है. इसलिए नहीं कि ये एक लेस्बियन रिलेशनशिप पर आधारित है बल्कि इसलिए कि कोई भी किरदार इस अंदाज में बनाया ही नहीं गया है कि वो वास्तविक जीवन में देखने को मिले. संजीता भट्टाचार्य और सबा आज़ाद एक ही कंपनी में काम करते हैं और आगे जा कर उनमें प्यार हो जाता है, कुल जमा कहानी इतनी सी है. बाकी की फिल्म कहानी को चलाने की कोशिश में खत्म हो गयी है. महानगरों में भी ऐसे किरदार कहां नजर आते हैं ये सोचना पड़ता है. दोनों अभिनेत्रियों ने भरसक प्रयास किया लेकिन निर्देशक दानिश असलम की स्टोरी टेलिंग असर नहीं डाल पायी. दानिश ने दीपिका पादुकोण और इमरान खान के साथ ‘ब्रेक के बाद’ नाम की एक फिल्म बनायीं थी जो कि नहीं चली. वहां जितनी अजीब परिस्थितयों का ज़िक्र था उतनी ही विचित्र परिस्थितयां यहां भी देखने को मिली.

सबसे अच्छी कहानी लिखी है ‘इंटरव्यू’ वो भी आरती रावल ने. एक बड़े सामान्य से शहर में नौकरी के लिए जगह जगह भटकते दो लोग, उनकी आपसी बातचीत, बिना द्वेष और कॉम्पीटीशन के. मानवीय संवेदनाएं मर नहीं गयी हैं ये देखना हो तो गला-काट प्रतियोगिता के इस दौर में इस फिल्म को देखना चाहिए. ज़ायेन मारी खान, नौकरी की तलाश में एक इलेक्ट्रॉनिक्स स्टोर में इंटरव्यू देने जाती है. उसके पास ढेरों इंटरव्यू देने का खासा अनुभव है, मुंबई शहर की अदाकारी से वो अच्छे से वाकिफ है और दिल बड़ा नाज़ुक सा है उसका. वो किसी और को दिक्कत में देख कर उसे नौकरी मिल जाए की साइलेंट दुआ मानती नजर आती है और उसके शख्स के सामने उसे कोई और नौकरी मिल गयी है की कहानी भी सुनाती है. एक इंटरव्यू में उसकी मुलाक़ात नीरज माधव से होती है जो मुंबई में नया है, घरवालों के लिए नाकारा है और उसकी हिंदी भी थोड़ी अजीब है. इंटरव्यू से पहले ज़ायेन उसे इंटरव्यू टिप्स देती है. नीरज मलयाली है तो वो कहता है – अपने गांव में तो मैं मोहनलाल हूं लेकिन यहां हिंदी कमज़ोर”. दोनों के बीच इस से प्यारा मोमेंट नहीं हो सकता था लेकिन लेखिका ने इस कहानी में और भी कई खूबसूरत पल डाले हैं. इस फिल्म और कहानी को ध्यान से देखिये, क्योंकि आप बहुत कुछ मिस कर सकते हैं. निर्देशक सचिन कुंडालकर इस के पहले रानी मुख़र्जी के साथ अय्या बना चुके हैं लेकिन उन्हें प्रसिद्धि मानवीय कहानियों वाली मराठी फिल्म बना कर ही मिली. नीरज माधव को लोग द फॅमिली मैन के पहले सीजन में मूसा के किरदार में देख चुके हैं. इंटरव्यू में आपको नीरज से प्यार हो जाएगा.

आखिरी फिल्म है जयदीप सरकार की इश्क मस्ताना. इस फिल्म को उन्होंने सुब्रता चटर्जी के साथ लिखा है. इस फिल्म में दो तीन बातें बड़ी अच्छे से दर्शायी गयी हैं जिनसे सबक लिया जा सकता है. एक आत्म-केंद्रित कबीर (स्कन्द ठाकुर) जिसका ब्रेक अप हो गया है और उसके झटके से उबरने का तरीका है किसी और लड़की के साथ सम्बन्ध बनाना. रिबाउंड नाम की इस प्रथा का अर्थ होता है ‘अर्थविहीन सम्बन्ध’ या यूं कहें कि अय्याशी, मुझे लड़की ने छोड़ा अब मैं भी किसी लड़की को पटा कर छोड़ दूंगा, हिसाब बराबर. ये प्रथा, पुरुषों के नाज़ुक ईगो की तुष्टि की कहानी है. एक जगह कबीर के मुंह से ये बात निकल भी जाती है, हालांकि लड़की को बुरा लगता है लेकिन वो भी इस बात को समझती है. आजकल के दौर के युवा लड़के लड़कियों की ये बात बहुत अच्छे से दिखाई गयी है. लड़की एक प्रोटेस्ट में शामिल होती है लेकिन वो भी पुलिस से डरती है. लड़का भी लड़की के चक्कर में फंस जाता है, पुलिस उनके पूरे गैंग को गिरफ्तार कर लेती है और शहर से दूर ले जा कर छोड़ देती है. लौटने की कवायद में लड़का और लड़की एक दूसरे को बेहतर समझ पाते हैं और कवियों के कवि, सुधारक कबीर साहब का गाना ‘हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या’ गाते गाते ज़िन्दगी में मोहब्बत के मायने ढूंढने की तयारी करते करते हाथ और दिल मिल जाते हैं.

इस पूरी एन्थोलॉजी में इंटरव्यू एकलौती ऐसी फिल्म है जो मध्यमवर्ग की बात करती है, बाकी सब फिल्में अभिजात्य वर्ग की सेटिंग में बनी हैं. इस से कहानी में फर्क नहीं पड़ता बल्कि उस वर्ग की जिन्दगी में झांकने का एक सुनहरा अवसर है. कथानक सतही नहीं हैं और डिप्रेशन से दूर रखे गए हैं. अच्छी फ़िल्में हैं. देखिये, पसंद आएंगी. मन में रोमांस की मीठी दोपहरी वाली खुमारी भी मिल जायेगी.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
3.5/5
स्क्रिनप्ल:
3/5
डायरेक्शन:
3/5
संगीत:
3/5

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