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Film Review: साइंस फिक्शन के शौकीनों को कम पसंद आएगी 'AWAKE'

अवेक (AWAKE)
अवेक (AWAKE)
2.5/5
पर्दे पर:9 जून, 2021
डायरेक्टर : मार्क रासो
संगीत : अंटोनिओ पिंटो
कलाकार : जीना रॉड्रिगेज, जेनिफर जैसन ली, बैरी पॉपर और अन्य
शैली : साइंस फिक्शन, थ्रिलर
यूजर रेटिंग :
0/5
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Film Review: साइंस फिक्शन के शौकीनों को कम पसंद आएगी 'AWAKE'

हम जिसे धर्म कहते हैं वो भी एक तरह का विज्ञान है.

हम जिसे धर्म कहते हैं वो भी एक तरह का विज्ञान है.

जीवन में कई रहस्य होते हैं, और कई बार हमें उनके होने का कोई कारण समझ ही नहीं आता.

'रोबोट' या 'रा-वन' जैसी फिल्में देखकर हम ये अंदाजा नहीं लगा सकते कि साइंस फिक्शन में किस कदर खूबसूरत और दिमागी फिल्में बनी है. विदेशी फिल्मों में विज्ञान की असीम संभावनाओं के इर्द गिर्द इतनी जटिल कहानियां गढ़ी गयी हैं कि आप को फिल्म देखते समय एहसास होता है कि लिखने और बनाने वाले की कल्पनाशीलता का कोई अंत ही नहीं है. नेटफ्लिक्स पर हालिया रिलीज़ 'अवेक' में विज्ञान की एक अनूठी सोच को सामने लाया गया है और मानवीय संवेदनाओं के साथ उन्हें लगभग एक थ्रिलर अंदाज़ में प्रस्तुत किया गया है.

जीवन में कई रहस्य होते हैं, और कई बार हमें उनके होने का कोई कारण समझ ही नहीं आता. थोड़ी खोज बीन करने पर समझ आता है कि विज्ञान इन रहस्यों की दुनिया में पहले ही कदम रख चुका है और कभी कभी इन रहस्यों को सुलझा भी चुका है. हम जिसे धर्म कहते हैं वो भी एक तरह का विज्ञान है. हमारे रीति रिवाजों का मूल विज्ञान में छुपा है. समस्या इतनी सी है कि वो कड़ी जो धर्म और विज्ञान को जोड़ती है वो कहीं खो सी गयी है और अब उस दिशा में कोई काम नहीं कर रहा. हमारे अन्धविश्वास की वजह, धर्म के पीछे के विज्ञान को न समझ पाने की हमारी अक्षमता है.

अवेक में एक ऐसी बच्ची की कहानी है जो कि अपने शहर में सो सकने वाली एकलौती बच्ची है. बाकी पूरा शहर जिसमें उसकी मां, उसका भाई, उसकी दादी और बाकी सब किसी अज्ञात बीमारी की वजह से सो नहीं पा रहे हैं. स्लीप डेप्रिवेशन की वजह से उनके दिमाग का आकार बढ़ते जा रहा है और शहर के डॉक्टर्स का कहना है कि इस वजह से सबको भयानक सरदर्द होगा, और एक दिन दिमाग की नसें फट जाएंगी और सब के सब मारे जायेंगे. इस बीमारी की वजह से हॉस्पिटल में जितने मरीज़ कोमा में हैं वो भी कोमा से बाहर आ गए हैं. चर्च के पादरी का कहना है कि यदि इस बच्ची की बलि चढ़ा दी जाए तो सब बच सकते हैं. बच्ची की मां और उसका भाई उसे लेकर भागते हैं और उसकी जान बचाने की कोशिश करते हैं. उनकी जान के पीछे पूरा शहर पड़ा हुआ है. कई मुश्किलों और जान पर हुए हमलों से बचते हुए पहले भाई और फिर उनकी मां की मौत हो जाती है. लेकिन अचानक अगले दिन भाई ज़िंदा हो जाता है. बच्ची और उसका भाई बात करते हैं और समझ जाते हैं कि वो दोनों अब सो सकते हैं और सिर्फ इसलिए कि वो एक बार मर चुके हैं. वो अपनी मां को भी पानी में डुबा कर फिर से ज़िंदा कर लेते हैं.

कहानी थोड़ी विचित्र है लेकिन विज्ञान के नज़रिये से एक भी बात इस फिल्म में ऐसी नहीं होती जो संभव नहीं है. स्लीप डेप्रिवेशन की वजह से दिमाग की हालत ख़राब होती ही है. इस वजह से दृष्टि भ्रम, स्मृति विभ्रम, गुस्सा, क्रोध और हिंसक व्यव्हार आम बात है. व्यक्ति खूंखार हो जाता है और उसका सर दर्द करने लगता है. कई बार दिमाग की नसें फूल जाती हैं और फट भी सकती हैं. वहीं कुछ व्यक्ति बिना मशक्कत के और बिना दवाइयों के आराम से सो सकते हैं. मर कर फिर ज़िंदा होने के भी कई किस्से सामने आये हैं जिसमें एक निश्चित अवधि के लिए शरीर और दिमाग दोनों ही काम करना बंद कर देते हैं लेकिन कुछ समय बात बिजली के झटके से या कभी कभी अपने आप ही शरीर में खून फिर दौड़ने लगता है. पानी में डूबते व्यक्ति भी कई बार फेफड़ों से पानी निकाल दिए जाने के बाद सांस लेने लगते हैं. अवेक में इन्ही घटनाओं को आधार बनाया है.

फिल्म की कहानी प्रसिद्ध लेखक ग्रेगरी प्रायर ने लिखी है. इस फिल्म के अलावा ग्रेगरी की अन्य फिल्में हैं नेशनल ट्रेजर - बुक ऑफ़ सीक्रेट्स, एक्सपेंडेबल्स 4 और स्पाई नेक्स्ट डोर. इस कहानी की पटकथा निर्देशक मार्क रासो और उनके भाई जोसफ रासो ने मिल कर लिखी है. जोसफ को ज़ॉम्बीज़ पर आधारित फिल्म्स ज़ॉम्बीज़ 1/2/ 3 लिखने का अच्छा खासा अनुभव है और इसलिए वो इस साइंस फिक्शन में थोड़ा थ्रिलर एलिमेंट ला पाए हैं. इस पूरी प्रक्रिया में जो चूक हुई है कि फिल्म में कई ट्विस्ट्स घुसा दिए गए हैं, कथानक लम्बा हो गया है और जिस तरीके से घटनाएं होती दिखाई हैं, दर्शक बोर हो जाते हैं. कहानी में एक बड़ी कमी ये भी है कि बीमारी का सही कारण किसी को पता नहीं चलता.

बच्ची की भूमिका में आरियाना ग्रीनब्लाट ने अद्भुत अभिनय किया है. पटकथा की वजह से उनका किरदार थोड़ा विचित्र हो जाता है और इसलिए दर्शक उनसे तादात्म्य स्थापित नहीं कर पाते. बच्ची की मां की भूमिका जीना रॉड्रिगेज ने भी काफी अच्छा काम किया है. फिल्म मूलतः इन्हीं दोनों के किरदार पर केंद्रित है. बाकी किरदार भी अच्छे ही हैं और उनका अभिनय भी ठीक है. शहर के बाकी लोग, पादरी और डॉक्टर इत्यादि की भूमिका में कुछ करने को विशेष था नहीं. इन किरदारों को ठीक से डेवलप भी नहीं किया गया है और यहां फिल्म मात खा जाती है. इनमें एक दो किरदारों को और बेहतर रोल दिया जा सकता था.

अंटोनिओ पिंटो ने अच्छा संगीत रचा है. हर सीन के मिज़ाज के हिसाब से वायलिन और पियानो की मदद से रहस्य बनाये रखा है. अंटोनिओ ने इसके पहले द डेविल नेक्स्ट डोर नाम की टीवी सीरीज में भी इस मिज़ाज का सशक्त संगीत दिया था. फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अनुभवी एलन पून के हाथों में है. एलन पून ने हाल ही में नेटफ्लिक्स की एक और फिल्म स्केटर गर्ल के भी कुछ दृश्यों की सिनेमेटोग्राफी का ज़िम्मा उठाया था. एलन ने ज़्यादातर डॉक्युमेंट्रीज़ शूट की हैं और इस वजह से लम्बे शॉट्स में उनकी महारत साफ़ नज़र आती है. एडिटर माइकल कॉनरॉय हैं और ये अपने मकसद से थोड़ा चूक गए हैं इसलिए कुछ अनावश्यक सीन भी फिल्म में रखे गए हैं जिस वजह से दर्शक बोर हो जाते हैं.

फिल्म साइंस फिक्शन के देखने वालों के लिए थोड़ी कमज़ोर रहेगी फिर भी नए किस्म की कथा के लिए फिल्म देखी जा सकती है. यदि थोड़ा धैर्य रखा जाए तो फिल्म की गति समझ आ जाती है और फिर देखने में रूचि जाग जाती है. फिल्म समीक्षकों द्वारा इस फिल्म को काफी कमज़ोर माना है फिर भी फिल्म में ऐसी कई बातें हैं जो आपको सोचने पर और ध्यान देने पर मजबूर करती है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
2.5/5
स्क्रिनप्ल:
2.5/5
डायरेक्शन:
2.5/5
संगीत:
2.5/5

Tags: Awake, Film review

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