परमाणु : द स्टोरी ऑफ पोखरण
3/5
पर्दे पर : 25-मई-2018
डायरेक्टर : अभिषेक शर्मा
संगीत : सचिन-जिगर, जीत गांगुली, संदीप चौथा
कलाकार : जॉन अब्राहम, डायना पेंटी
शैली : एक्शन, ड्रामा, हिस्ट्री
यूजर रेटिंग :
0/5
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Movie Review : परमाणु में देशभक्त हीरो के रुप में नज़र आए जॉन अब्राहम

मद्रास कैफे के बाद जॉन की इस फिल्म में देशभक्ति का जबर्दस्त पंच है और आपको ये फिल्म पसंद आएगी

News18Hindi
Updated: May 25, 2018, 12:21 PM IST
Movie Review : परमाणु में देशभक्त हीरो के रुप में नज़र आए जॉन अब्राहम
फिल्म परमाणु के पोस्टर में जॉन अब्राहम और डायना पेंटी.
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Updated: May 25, 2018, 12:21 PM IST
1998 में भारत के 'न्यूक्लियर पॉवर' बनने की दास्तान अपने आप में विलक्षण कहानी थी. उस समय के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के साथ मिलकर भारत को न्यूक्लियर महाशक्ति बना दिया.

इस पूरे प्रकरण के पीछे की कहानी को इस फिल्म में दिखाया गया है. परमाणु फिल्म की कहानी साल 1998 में पोखरण में किए गए परमाणु टेस्ट के बारे में है जब अमरीका और विश्व की अन्य एजेंसियो की निगरानी करती सैटेलाइट्स को चकमा देकर भारत ने सफल परमाणु परीक्षण कर दिखाया था.

हालांकि फिल्म सच्ची घटना पर आधारित होने का दावा करती है लेकिन इस फिल्म में कुछ घटनाएं काल्पनिक भी हैं. कहानी एक ऐसे ऑपरेशन की जिसके ज़रिए भारत ने अपनी ताकत का लोहा पूरी दुनिया से मनवाया था और ज़ाहिर है इस फिल्म में देशभक्ति की भावना कूट कूट कर भरी है. हालांकि फिल्म में काल्पनिकता है लेकिन इसके बावजूद कहानी दिलचस्प है.

अश्वत रैना (जॉन अब्राहम) भारत सरकार को न्यूक्लियर पॉवर बनने की ओर कदम उठाने को प्रेरित करते हैं ताकि हम देश की बेहतर सुरक्षा कर पाएं लेकिन उनकी अपील न सुने जाने पर वो इस्तीफा दे देते हैं. लेकिन कुछ सालों बाद प्रधानमंत्री के मुख्य सचिव हिमांशु शुक्ला (बोमन ईरानी) अश्वत के पास लौटते हैं और उनके न्यूक्लियर कार्यक्रम को फिर से शुरु करने के लिए कहते हैं.

अश्वत इस काम के लिए एक टीम बनाते हैं जिसमें अंबालिका (डायना पेंटी) उनके साथ जुड़ती हैं और फिर शुरुआत होती है एक ऐसे मिशन की जिसे इतिहास याद करता है.

अगर फिल्म में प्रदर्शन की बात करें तो जॉन अब्राहम अब इस तरह की फिल्मों में एक्सपर्ट हो चुके हैं और एक्शन फिल्मों को बेहतर बनाना वो जानते हैं. हैरानी नहीं कि इस फिल्म को देखकर आपको मद्रास कैफे की याद आ जाएगी. डायना पेंटी इस फिल्म में अपने रोल में फिट नज़र नहीं आती हैं. एक सीक्रेट मिशन और एक्शन से भरी पूरी फिल्म में वो लगातार हेयर स्टाइल और मेकअप से टच्ड अप नज़र आती हैं, जो अखरता है. बोमन ईरानी अपनी भूमिका में जमें हैं और वो दमदार लगते हैं.

फिल्म में जॉन की पत्नी को दिखाना एक एक्सट्रा एफर्ट लगा. जॉन की पत्नी के किरदार में अनुजा साठे के पास करने के लिए कुछ खास नहीं था लेकिन इस छोटे से किरदार को भी उन्होंने जीवंत बनाया है. फिल्म का पहला भाग धीमा है और किरदारों को जमाने के लिए अधिक समय ले लिया है जिसके चलते फिल्म का दूसरा भाग तेज़ी से भागता नज़र आता है. फिल्म में पुरानी फुटेज और नेताओं के बयानों का इस्तेमाल किया गया है जो इस फिल्म को असलियत के करीब ला देता है.

हां फिल्म में अपनी कमियां हैं लेकिन इनके बाद भी ये फिल्म बेहतरीन है. फिल्म में कई काल्पनिक डॉयलॉग हैं और सवांद कहीं कहीं फिल्मी हो जाते हैं. फिल्म के क्लाइमैक्स की स्पीच को सुन कर आपको उपदेश जैसा महसूस होने लगता है. फिल्म में गाने भी बहुत सारे हैं जिनको फिल्म में रखने की ज़रुरत नहीं थी और सिर्फ बैकग्राउंड म्युज़िक से काम चलाया जा सकता था लेकिन निर्देशक ने शायद यही ठीक समझा.

इस फिल्म में देशभक्ति का तड़का है लेकिन ये फिल्म आपको मद्रास कैफे के लेवल तक नहीं ले जा पाती है क्योंकि फिल्म मे कई ब्रेक्स हैं. फिल्म की शुरुआत साजिश को जमाते हुए शुरु होती है लेकिन धीरे धीरे बॉलीवुड के मसाले टेकओवर कर लेते हैं. लेकिन इसके बाद भी हम कहेंगे कि आप इस फिल्म को एक नज़र देंखे ज़रुर. उन वीरताओं की कहानियों के लिए जिन्हें आपने शायद अभी तक नहीं सुना था. हां ये फैक्ट फाइल नहीं है लेकिन इसके बाद भी इस कहानी से आपको बहुत कुछ पता चलेगा.

(इस रिव्यू को मूलत: अंग्रेज़ी में विवेक शाह ने लिखा है जिसे आप यहां पढ़ सकते हैं )

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3/5
स्क्रिनप्ल :
3/5
डायरेक्शन :
3/5
संगीत :
3/5
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