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फिल्म समीक्षा: दिल को छू जाने वाली फिल्म है 'नीरजा'

फिल्म समीक्षा: दिल को छू जाने वाली फिल्म है 'नीरजा'

ऐसा हो ही नही सकता की "नीरजा" आपके दिलों को ना छुए। 1986 में फस्लस्तीनी आतंकवाद द्वारा फ्लाइट हाइजैक के दौरान सवार यात्रियों की जान बचाने में अपनी जान गवांने वाली 23 साल की एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की सच्ची कहानी पर आधारित ये फिल्म

    नई दिल्ली। ऐसा हो ही नही सकता की "नीरजा" आपके दिलों को ना छुए। 1986 में फस्लस्तीनी आतंकवाद द्वारा फ्लाइट हाइजॅक के दौरान मेी सवार यात्रियों की जान बचाने में अपनी जान गवांने वाली 23 साल की एयरहोस्टेस नीरजा भनोट की सच्ची कहानी पर आधारित ये फिल्म एक सम्माननीय श्रद्धांजलि है जो सही नोट पकड़ती है। डायरेक्टर राम माधवानी ने फिल्म में ड्रामा बनाने में जरा भी टाइम खराब नही करते हैं।  मुंबई की मिडल क्लास कॉलोनी में हमारी मुलाकात होती है नीरजा यानी सोनम कपूर से जब वो फ्लाइट में जाने से पहले अपने परिवार के साथ कुछ प्यार भरे पल बिता रही है। इन सीन के साथ ही मिलते हुए वो सीन दिखाए जाते हैं जहां कराची में आतंकवादी फ्लाइट पर हमला करने से पहले अपने हथियार जुटा रहे हैं।

    एक ओर जहां उस बदनसीब फ्लाइट 73 में हलचल बढ़ रही है, फिल्ममेकर्स हमें नीरजा और उसके परिवार की ज़िंदगी में व्यस्त रखते हैं। फ्लैशबैक के जरिए हमें पता चलता है कि कैसे नीरजा के माता-पिता यानी शबाना आज़मी और योगेंद्र टिक्कू ने उसे एक खराब शादीशुदा जिंदगी से निकालने में सपोर्ट करते हैं। हम पहले ही देख चुके हैं की कैसे नीरजा के परिवार ने बिना कुछ कहे उसके नये पार्टनर यानी शेखर रवजियनी को स्वीकार कर लिया है जो ज़ाहिर तौर पर उसे खुश रखता है। हम देखते हैं कि कैसे उसकी जॉब उन्हें परेशान करती है, और किस तरह वो हेल्पलेस महसूस करते हैं जब उन्हे पता चलता है की नीरजा की फ्लाइट हाइजैक हो गयी है।

    उन सीन्स में जब आतंकवादी फ्लाइट को अपने कब्जे में लेते हैं, राम माधवानी डर और कुछ बुरा होने का अंदेशा जगाते हैं। छोटे से कॅबिन में घुटन दिखाने के लिए जर्की हैंडलहेल्ड कैमरा र्वर्क का इस्तेमाल करते हुए, फिल्ममेकर्स लोगों की टेंशन और हिंसा से भरे कुछ खौफनाक पल देते हैं। वहीं अपने पिता की दी हुई सीख को याद करते हुए, नीरजा हिम्मत जुटती है और आतंकवाद के खिलाफ खड़ी होती है।

    सोनम केपर की सींग-सॉन्ग डिलिवरी, भूमिका की कम उम्र को दर्शाती है और सोनम केपर अपने किरदार में पूरी तरह घुस जाती हैं। कुछ कमजोर पलों को छोड़, सोनम केपर, नीरजा के डर से लेकर बहादुरी तक के सफर को खूबी से पर्दे पर उतारती हैं। नीरजा की मृत्यु के बाद जब उसके परिवार को उसका जनाज़ा मिलता है, वो देख आपकी आंखें भर आएंगी। राम माधवानी यहां साइलेन्स का इस्तेमाल करते हुए, अपने किरदारों के अभिनय से ही उनके दर्द को ज़ाहिर करते हैं और वो पल ही आपके दिल को तोड़ देगा।

    नीरजा के पिता के किरदार में योगेंद्र टिक्कू बहुत ही अच्छा किरदार निभाया है। वो हमें एक परेशान पिता के भाव की छवि देते हैं। वहीं शबाना आजमी अपने किरदार को बखूबी निभाते हुए हर सीन को अपने नाम कर लेती हैं। यहां तक कि, फिल्म के बेहद लंबे क्लाइमॅटिक स्पीच सीन में अपनी बेटी को खोने के दर्द के बारे में बात करते हुए, वो आपकी अंतरात्मा को झकझोर के रख देंगी।

    फिल्म में कुछ चीज़ें हैं जो काम नही करती। फिल्म के सेकेंड हाफ में एक गाना जो हालांकि बैकग्राउंड स्कोर है, पर फिल्म में किसी काम का नही है। साथ ही आप चाहेंगे की फिल्म में इंटरवल के बाद थोड़ी और टाइट और क्रिस्प होती। पर ये सब, एक रियल हीरो की ज़िंदगी को पूरी ईमानदारी और दिल से सेलेब्रेट करने वाली फिल्म की छोटी मोटी कमियां हैं।  "नीरजा" को पांच में से साढ़े टीन स्टार।

    Tags: Neerja

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