FILM REVIEW 'द ग्रेट इंडियन किचन': सुस्वादु व्यंजनों की थाली और औरत की आजादी की लड़ाई

100 मिनट की फिल्म है 'द ग्रेट इंडियन किचन'.

100 मिनट की फिल्म है 'द ग्रेट इंडियन किचन'.

फेमिनिज्म के इन पैमानों को ध्वस्त करती फिल्म है 'द ग्रेट इंडियन किचन (The great Indian Kitchen)'.

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  • Last Updated: April 19, 2021, 2:01 PM IST
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फिल्मः द ग्रेट इंडियन किचन

भाषाः मलयालम

ड्यूरेशनः 100 मिनट

ओटीटीः अमेजन प्राइम वीडियो
आधुनिक काल की फिल्मों में फेमिनिज्म के नाम पर लड़की को आजाद ख्याल होना जरूरी होता है. शराब पीना, सिगरेट पीना, दो तीन बॉयफ्रेंड, एक अदद पति और एक दो एक्स्ट्रा-मैरिटल अफेयर के माध्यम से स्त्री को आधुनिक, नव-विचार और अपनी शर्तों पर जीने वाली बताने का स्टीरियोटाइप विश्वास करने योग्य नहीं लगता. फेमिनिज्म के इन पैमानों को ध्वस्त करती फिल्म है - 'द ग्रेट इंडियन किचन (The great Indian Kitchen).'

मलयालम सिनेमा, भारतीय इतिहास में सदैव क्रान्तिकारी विषयों पर अथवा रोजमर्रा की जिंदगी के विद्रोही स्वरूप को दिखाता आया है. मानवीय रिश्तों की अनसुलझी कहानियां, परिचय के मोहताज रिश्ते, परिभाषा की बाट जोहते नातों की कहानियों की जो बानगी मलयालम सिनेमा में नजर आती है, वो किसी और भाषा की फिल्मों में कम ही दिखी हैं. यूरोपियन सिनेमा में जिस तरह की रिलेशनशिप्स या सिचुऐशन्स पर फिल्में बनती हैं, उनकी जोड़ की फिल्में एक परिष्कृत और देशी अंदाज में मलयालम भाषा में देख सकते हैं. आयवी ससि से लेकर अडूर गोपालकृष्णन तक, फाजिल जैसे सफल और त्यागराजन कुमारन, अनवर रशीद जैसे प्रयोगधर्मी निर्देशकों ने फिल्म्स को नित नए आयाम दिए हैं.

अमेजन प्राइम ने हाल ही में रिलीज की है - लेखक-निर्देशक जो बेबी की फिल्म - द ग्रेट इंडियन किचन. फिल्म की कहानी कुल जमा दो वाक्यों में निहित है. एक नव-विवाहिता स्त्री (निमिषा सजायन), अपने पति (संजय वंजारमूद) के घर में एडजस्ट होने की कोशिश करते हुए थक जाती है और अंत में उसे छोड़ कर एक स्कूल में डांस टीचर बन जाती है और उसका पति, दोबारा शादी कर के नई पत्नी को भी अपने घर के कानून कायदे सिखाने लग जाता है. 100 मिनट लम्बी इस फिल्म की शूटिंग कोझिकोड के एक घर में हुई थी. एक-दो शॉट छोड़ दें तो पूरी फिल्म इंडोर ही रही है और उसमें से भी 90%, किचन के दृश्य हैं.



फिल्म में सब कुछ होते हुए नजर आता है. एक भी दृश्य अनावश्यक नहीं है. शादी के बाद रिश्तेदार लौट जाते हैं और लड़की ससुराल में सीधे किचन में ही नजर आती है. सब्ज़ी धोना, काटना, छीलना, मसाला बनाना, छौंका लगाना, डोसा बेलना, इडली बनाना, सांभर बनाना, और फिर खाना परोसना, टेबल साफ करना और अपने पति की छोड़ी हुई प्लेट में ही अपना खाना परोस कर खाना, फिर साफ सफाई करना और किचन को जमाना ताकि शाम की चाय और रात के खाने में वही सब दोहराया जा सके. सोने से पहले अपने हाथों को धो धो कर वो किचन की बू को हटाने का प्रयास करती है. इसके ठीक विपरीत, पति चाय का, फिर खाने का और रात को अपनी पत्नी का बिस्तर पर इंतजार करता है और हां, बीच बीच में योगाभ्यास भी करता है मगर घर के किसी काम में हाथ नहीं बंटाता.

एक एक शॉट में घर के लोगों की आपसी इक्वेशन और ताना बाना साफ नजर आता है. जैसे एक दृश्य में सास द्वारा डोसे के साथ खायी जाने वाली चटनी के सिलबट्टे पर रोज़ाना पीसना और मिक्सर-ग्राइंडर का इस्तेमाल न करना क्योंकि ससुर को हाथ की पिसी चटनी खाने की आदत है. रोज़ के खाने में चटनी और सांभर दोनों बनाना क्योंकि ऐसा होते आया है. एक दृश्य में निमिषा रात के बचे हुए खाने को फ्रिज से निकाल कर, गरम कर के पति और ससुर को परोसती है और ससुर बासी खाने के नाम पर नाक भौंह सिकोड़ लेते हैं. पति और ससुर, खाना खाते वक़्त हड्डियां और सहजन की चूसी हुई फली, टेबल पर छोड़ देते हैं, जिसे रोज़ उठा कर डस्टबीन में डालना पड़ता है. अपने पति को रेस्टोरेंट में बड़े ही सलीके से खाते देखती है और घर पर वही जंगली तरीके से फैला के खाते देखती निमिषा का दिल, कड़वाहट से भर जाता है.

निमिषा के ससुर को हाथ से धुले कपड़े पहनने की आदत है, वॉशिंग मशीन में कपड़े ख़राब हो जाते हैं. माहवारी के समय, निमिषा को घर के पुराने कमरे में बंद कर दिया जाता है, उसे कुछ भी छूने की मनाही होती है, उसका खाना भी नियंत्रित होता है और यहां तक कि उसे अपने कपड़े अलग धोकर कमरे के अंदर सुखाने होते हैं, ताकि घर के पुरुष देख न लें. ऐसी ही छोटी छोटी घटनाओं से उसका दिन भर व्यस्त रहता है और उसके अंदर का फ़्रस्ट्रेशन बढ़ने लगता है.

फिल्म में पितृसत्ता को दिखाने वाले कई दृश्य हैं, जो संस्कारों के नाम पर हमारे घरों में वर्षों से चलाये जा रहे हैं और समय बदलने के बावजूद, आधुनिकता को दरकिनार करते हुए, पति और ससुर अपनी वाली हांकने में व्यस्त रहते हैं, यहां तक कि पति उस से पूछे बगैर सबरीमाला का व्रत रख लेता है जिसमें करीब 40 दिनों तक ब्रह्मचर्य जैसे कठिन कार्य शामिल होते हैं. व्रत शुरू होने के एक दिन पहले वो अपनी पत्नी को सम्भोग के लिए कहता है तब पत्नी उसे दर्द होने की बात कहती है और चाहती है कि उसका पति पहले फोरप्ले के जरिये उसे भी तैयार करे. रूढ़िवादिता में फंसा पति ये भी बर्दाश्त नहीं कर पाता, क्योंकि उसकी नजर में स्त्री सिर्फ भोगने के लिए है. उसकी पूरी जिंदगी पति और घर के बुज़ुर्गों की आज्ञा का पालन में गुजरनी चाहिए. उसे पूरा किचन संभालना चाहिए, बड़ों की बातें माननी चाहिए, पति का बिस्तर गर्म करना चाहिए, घर के सभी कार्यों में दक्ष होना चाहिए, संस्कारों के अनुसार मेहमानों का आदर करना चाहिए, लेकिन उसे खुद के विचार नहीं होना चाहिए, उसको किसी विषय पर अपनी राय नहीं देनी चाहिए और सदैव चुप रहना चाहिए.

फिल्म में किचन के सिंक को खराब होते दिखाया गया है और पाइप में छेद होने की वजह से गंदा पानी किचन के फर्श पर फैलते जाता है. पत्नी कभी सिंक के नीचे बाल्टी लगाती है तो कभी टाट के टुकड़े लगाकर उसे सुखाने का प्रयास करती है, लेकिन कई बार याद दिलाने के बावजूद पति, एक प्लम्बर को नहीं बुलाता है. अंत में पत्नी वही गन्दा पानी, अपने पति और ससुर के ऊपर फेंक कर अपने मायके चल पड़ती है. हालांकि इंटरनेट का इस्तेमाल कर के उसने किसी प्लम्बर को क्यों नहीं बुलाया, ये सवाल कचोटता रहता है.

इस फिल्म को आजकल की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में शुमार किया जाना चाहिए क्योंकि ये फिल्म बिना चीखे चिल्लाये, बिना आधुनिकता का ढोल पीटे, छोटे कपड़-शराब-सिगरेट-विवाहेतर संबंधों के कथानक को तिलांजलि देते हुए, किचन में व्यस्त एक स्त्री के मन को मार्मिक ढंग से दर्शाती है. फिल्म अभिनेत्री रानी मुख़र्जी ने ये फिल्म देख कर अपने सहकर्मी मलयालम सिनेमा के सुपरस्टार पृथ्वीराज से माध्यम से निर्देशक जियो को बधाई संदेश भेज कर कहा कि ये वर्तमान समय में बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म है.

केरल स्टेट फिल्म अवार्ड जीत चुकी निमिषा वैसे तो मुंबई में जन्मी और पली-बढ़ी हैं मगर मलयालम फिल्मों में उनकी प्रतिभा के सब कायल हैं. स्टैंड अप कॉमेडियन के तौर पर अपना करियर शुरू करने वाले सूरज, मलयालम फिल्मों और टेलीविज़न के जाने माने अभिनेता हैं. इस फिल्म में वो अपनी छवि से बिलकुल विपरीत एक खड़ूस, दम्भी और दकियानूसी पति के किरदार निभाते नज़र आये हैं. आधी फिल्म होने तक तो दर्शकों को उनसे घृणा होने लगती है. निमिषा और संजय की एक साथ ये दूसरी फिल्म है. सभी का अभिनय अव्वल दर्जे का है. दूध डिलीवर करने वाली छोटी बच्ची के तौर पर निमिषा के जीवन में आती छोटी सी ख़ुशी का भी महत्वपूर्ण किरदार है.

फिल्म निर्देशक जियो बेबी ने ही लिखी है, लेकिन अपनी पुरानी फिल्मों से बिलकुल अलग, इस फिल्म में जियो ने डायलॉग नहीं लिखे थे. पूरी स्क्रिप्ट में सिर्फ अलग अलग दृश्य हैं, अधिकांश डायलॉग कलाकारों ने खुद ही शूटिंग के समय बोले हैं. निमिषा और संजय के बीच की जद्दोजहद और संजय का व्यवहार, जैसे जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, अपने आप दर्शकों को नज़र आता है. हर बात में स्त्री की ही गलती होती है ये साबित करने के लिए पुरुष अपना पूरा दम लगा देते हैं और ये बात फिल्म देखते वक़्त साफ नज़र आती है. अपने निजी अनुभवों से किस्से चुरा कर जियो ने ये फिल्म लिखी. फिल्म के एडिटर फ्रांसिस लुइस की मदद से फिल्म का स्क्रीनप्ले बनाया गया. केरल अपने आप में बड़ा खूबसूरत है और सालू थॉमस की सिनेमेटोग्राफी ने एक एक शॉट में जान फूंक दी है. 2018 में कोर्ट के सबरीमाला में स्त्रियों के प्रवेश देने के निर्णय से जियो को फिल्म का अंत मिला और इसलिए इस फिल्म में इस संवेदनशील विषय को बहुत ही भावनात्मक ढंग से उठाया है.

ये फिल्म सबसे पहले "नीस्ट्रीम" नाम के मलयालम ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज़ की गयी और एक ही दिन में इस फिल्म के चाहने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई कि नीस्ट्रीम के सर्वर ने काम करना बंद कर दिया. कई लोगों ने जियो को कहा भी कि वो पैसा देने को तैयार हैं ताकि फिल्म थिएटर में रिलीज़ की जाए. स्त्री के अधिकार और किचन में उनके संघर्ष की इस कहानी से जियो को प्रशंसा और आलोचना दोनों ही झेलनी पड़ी. पुरुषों के अलावा महिलाओं ने भी जियो को सोशल मीडिया पर भरपूर गालियां दीं मगर फिल्म की सफलता ने सब मुंह बंद कर दिया. अंत में ये फिल्म अमेजन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ कर के इसे भारत भर के दर्शकों के लिए उपलब्ध कराया गया. जियो ये फिल्म पहले भी कई ओटीटी प्लेटफॉर्म को दिखा चुके थे मगर किसी ने इसे रिलीज़ करने की ज़हमत नहीं उठाई. नेटफ्लिक्स और अमेजन, दोनों ने ही इस फिल्म को दिखाने से मना कर दिया था. अंत में इसकी सफलता के बाद अमेजन को इसे रिलीज करना ही पड़ा.

बिना स्टीरियोटाइप हुए भी फेमिनिज्म का ये शक्तिशाली स्वरुप एक कहानी में कैसे पिरोया जाए, ये समझने के लिए ये फिल्म ज़रूर देखनी चाहिए. हिंदी फिल्म के निर्देशकों को भी जियो से सबक लेना चाहिए. पितृ-सत्तात्मक समाज के चेहरे पर ये मिर्च का सालन फेंका गया है. आंखें और दिमाग दोनों जलेंगे. जलना भी चाहिए.
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