विश्वरूप 2
1.5/5
पर्दे पर : 10 अगस्त 2018
डायरेक्टर : कमल हासन
संगीत : मोहमद घिब्रान
कलाकार : कमल हासन, वहीदा रहमान, शेखर कपूर, पूजा कुमार, राहुल बोस
शैली : एक्शन
यूजर रेटिंग :
0/5
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Film Review : विश्वरूपम-2 कमल हासन की आखिरी फिल्म हुई तो हिंदुस्तानी दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे?

कमल हासन की चाची 420, सदमा आदि फिल्मों को देखकर जो आपने उनके बारे में सोचा कैसे उस छवि को ठेस लग रही है.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 10:36 AM IST
Film Review : विश्वरूपम-2 कमल हासन की आखिरी फिल्म हुई तो हिंदुस्तानी दुनिया को क्या मुंह दिखाएंगे?
फिल्म रिव्यू : विश्वरूपम 2
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: August 10, 2018, 10:36 AM IST
जब बहुत बड़े-बड़े कलाकारों का नाम किसी फिल्म से जुड़ता है तो या तो हमें बेहतरीन फिल्म मिल जाती है या त्रासदी हो जाती है. कमल हासन की फिल्म विश्वरूप 2 बेहतरीन तो कतई नहीं है. फिल्म से पहले इतने बड़े-बड़े नाम क्रेडिट में देखते हैं कि आप सोचने लगते हैं, 'ये फिल्म क्या ही होगी!' लेकिन फिल्म के खत्म होने पर आप खुद से पूछ रहे होते हैं, 'ये फिल्म क्या ही थी?'. विश्वरूप 2 के क्रेडिट में आने वाले इन स्वनामधन्य लोगों के नाम हैं : कमल हासन (खुद), वहीदा रहमान, शेखर कपूर और बिरजू महाराज. एक्टिंग में अपने लिए एक खास ऑडियंस तैयार कर लेने वाले एक्टर राहुल बोस, जयदीप अहलावत, अनंत नारायण महादेवन और राजेंद्र गुप्ता जैसे कलाकार भी इस फिल्म में हैं.

वैसे यह कहने की ही बात है कि इस फिल्म के साथ बड़े-बड़े नाम जुड़े हैं. दरअसल फिल्म में प्रोड्यूसर, डायरेक्टर, लीड एक्टर और कोरियोग्राफर तक सबकुछ कमल हासन ही हैं. तो ऐसे में कहा जाये कि फिल्म का एक-एक सेकेण्ड कमल हासन के ही इर्द-गिर्द घूमता है तो गलत नहीं होगा. कमल हासन की उम्र 64 साल हो चुकी है लेकिन वे आतंकियों की हड्डियां चटकाते, एक्ट्रेस के साथ लवमेकिंग सीन करते और गाड़ियां उड़ाते दिख रहे हैं (सलमान 'भाई' को अगली फिल्म के लिए इससे प्रेरणा मिल सकती है). थोड़े स्लो हैं, उनके सारे तेज मूव बड़े प्रयास के साथ किए दिख रहे हैं, उनकी लवमेकिंग फनी है लेकिन वे यह सब कर रहे हैं. कर रहे हैं क्योंकि शायद किसी ने उन्हें बताया नहीं कि सर ये आपकी पर्सनैलिटी के साथ जा नहीं रहा है. यही होता है जब इंसान का कद बहुत बड़ा हो जाता है और उसके आस-पास की दुनिया उसके इर्द-गिर्द घूमने लगती है. वह जो कुछ करता है उसमें कोई कमी निकाल पाने की हिम्मत आस-पास के लोग नहीं करते. ऐसे में उस व्यक्ति का ही यह कर्तव्य होना चाहिये कि वह कुछ अपने प्रति बहुत आलोचनात्मक रवैया रखे ताकि अप्रासंगिक और हास्यास्पद स्थितियां न क्रिएट हों.

आईएसआईएस के जमाने में हीरो विशाम करता है अलकायदा से लड़ाई
फिल्म की कहानी ऐसी है जो शायद ही कोई दर्शक पूरी समझ सका हो. जितना समझ में आता है वह यह है कि आर्मी से ही ज्यादातर लोग रॉ में आते हैं तो विज़ाम अहमद कशमीरी भी आये हैं. रॉ की नियुक्ति के लिए बरती जाने वाली गोपनीयता उनके साथ भी बरती गई है और अब वह पिछली फिल्म में अलकायदा को खत्म करने के मिशन पर निकले थे और उमर कुरैशी (राहुल बोस) के फैलाए आतंकवाद को खत्म कर रहे थे. इस फिल्म में भी पिछली फिल्म का बहुत सारा फ्लैशबैक है. एक डायलॉग में आजादी के 64 सालों का जिक्र भी आता है. जो यह बताता है कि फिल्म 2010 की बात कर रही है, जिसको निकले आठ साल हो चुके हैं. यानि इस लिहाज से भी फिल्म बहुत ज्यादा लेट है. कायदे से देखा जाये तो अलकायदा आज कहीं है ही नहीं. ऐसे में अलकायदा के खिलाफ मिशन पर निकला हीरो आउटडेटेड लगता है. कहा जा रहा था कि फिल्म 4 साल लेट है लेकिन यह 8 साल लेट निकली. इसके अलावा नायक विशाम की चतुराई भी असाधारण नहीं है.

न्यूक्लियर ऑन्कोलॉजिस्ट बीवी पति को लेकर रहती है इन्सिक्योर
कहानी जोड़ने के लिए आपको बहुत मेहनत करनी पड़ती है. ज्यादा गंभीरता से फिल्म देखेंगे तो आपके दिमाग की नसें दुख जायेंगीं इसलिए आप हल्के मन से फिल्म देखिए. किसी को घुमाने ले जाना चाहते हैं कहीं तो फिल्म दिखाने ही लेकर चले जाइये. सिनेमा हॉल में आप बातें कर सकते हैं. कोई आपको नहीं रोकेगा. क्योंकि किसी को नहीं समझ आ रही होगी. तो सब यही कर रहे होंगे. कई बार लोग बगल वाले से यह पूछते हुए पाए जा सकते हैं कि फिल्म में चल क्या रहा है? बस यह पता चलता है कि विशाम अहमद कश्मीरी यानि कमल हासन जो रॉ के सीक्रेट एजेंट हैं. उनकी पत्नी हैं निरूपमा यानि पूजा कपूर, जो कहने को तो न्यूक्लियर ऑन्कोलॉजी में डॉक्ट्रेट हैं लेकिन करने को उनके हिस्से एक ही चीज आई हैं, पहली अपने पति यानि कमल हासन को लेकर इन्सिक्योर होना और दूसरा एक लव मेकिंग सीन. जिस पर आप हंस ही सकते हैं क्योंकि पहले पस्त पड़े कमल हासन और बाद में जोर आजमाइश करते जैसे वे दिखते हैं कहीं से भी सीन दर्शकों को लवमेकिंग वाला कोई फील नहीं दे पाता है. बाकि दिखाने के लिए वे एक न्यूक्लियर बन डिफ्यूज करने जाती हैं लेकिन उसे डिफ्यूज कमल हासन ही करते हैं.

 

2 घंटे 24 मिनट की फिल्म में आखिरी 24 मिनट में है कहानी
फिल्म में शेखर कपूर पहले की तरह ही कमल हासन के बॉस हैं लेकिन वे क्या करवा रहे हैं कुछ नहीं पता चलता. उन्होंने क्या टास्क अपने ऑफिसर को दिया है, न उन्हें यह बात पता है न ही कमल हासन को. न ही पहले दो घंटे में पता चलता है कि आखिर विशाम बने कमल हासन को करना क्या है? फिल्म के आखिर में आकर पता चलता है कि पहली फिल्म वाला उमर कुरैशी (राहुल बोस) अभी मरा नहीं है और अब उसने कमल हासन की पत्नी को अगवा कर लिया है. कमल हासन उससे भिड़ते हैं और उसके प्लांट किए 64 बम कैसे रोकते हैं, यह सब आखिरी के आधे घंटे में दिखाया जाता है. इसलिए फिल्म खत्म होने पर समझ ही नहीं आता कि बाकी 2 घंटे की फिल्म किसलिए थी?

फिल्म ज्यादातर ठंडी जगहों पर शूट हुई है इसलिए स्क्रीन बार-बार जम जाती है!
फिल्म में बहुत सारे फ्रीजफ्रेम इस्तेमाल किए गए हैं जिसमें आप बहुत ही छोटी-छोटी डीटेल देख लेते हैं. ऐसे में जब अगले ही सीन में लोगों का मेकअप बदल जाये या कमल हासन की पट्टी बायें से दाहिनी ओर चली आये तो देखकर बहुत खराब लगता है. दिखता है कि ज्यादातर फिल्म की शूटिंग विदेशों में हुई है. बच्चों को लेकर फिल्म देखने बिल्कुल भी न जायें, इतने हिंसक दृश्य, खून-खराबा और तेज कानफोड़ू म्यूजिक उनके दिमाग पर बहुत बुरा असर डाल सकता है. रोहित शेट्टी का नाम प्रोडक्शन में जुड़ गया है तो इस फिल्म में कारें भी काफी उड़ती दिख रही हैं. फिल्म के गानों में भी कुछ ऐसा नहीं है जिसे आप लेकर अपने साथ जायें. एक पक्ष जिसकी तारीफ की जा सकती है वह है सिनेमैटोग्राफी. लेकिन फिल्म के आखिरी तक आते-आते वह भी दम तोड़ती दिखती है. राष्ट्रपति भवन का बैकग्राउंड बहुत बनावटी लगता है. एडिटर ने फ्रेम बार-बार जमाया है. देखकर लगता है वे अच्छा ही करते अगर फिल्म को अच्छे से शूट किया गया होता.

क्या फिल्म देखने जा सकते हैं?
बिल्कुल जाइये पर अपने खतरे पर. एंज्वाए करना हो. सीक्रेट मीटिंग करनी हो. पॉपकॉर्न खाने हों. प्रेमिका को कडल करना हो. इन सबके लिए कमल हासन की विश्वरूप II आइडल है. हां कभी थियेटर में फिल्म देखते हुए सोए न हों और सोने के लिए जाना चाहते हों तो बता दूं कि यह फिल्म अपने म्यूजिक से आपको सोने नहीं देगी. तो सोने न जायें. इसके अलावा ऐसा कुछ जरुर ले जायें जिससे कान आसानी से बंद कर सके जैसे कॉटन बॉल्स,  कान सुरक्षित रहेंगे. साथ ही यह देखने भी जा सकते हैं कि महानता सब्जेक्टिव होती है. जीवन भर कमल हासन की चाची 420, सदमा आदि फिल्मों को देखकर जो आपने उनके बारे में सोचा कैसे उस छवि को ठेस लग रही है. इसके अलावा हमारी कमल हासन से एक ही गुजारिश है कि इस फिल्म के साथ वे अपने एक्टिंग करियर को बाय-बाय न कहें. वे देश के सबसे शानदार एक्टर्स में से एक हैं,  उन्हें थोड़ा सा बैलेंस अपने राजनीतिक और एक्टिंग करियर के बीच बिठाते हुए कुछ और फिल्में कर लेनी चाहिये. एक बेहतरीन एक्टर को हम ऐसी दूसरे दर्जे की फिल्म के साथ करियर खत्म करते नहीं देखना चाहते. हां, वे ऐसा कर सकते हैं कि आगे से डायरेक्शन का विचार त्याग दें.

 

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
1/5
स्क्रिनप्ल :
1.5/5
डायरेक्शन :
1.5/5
संगीत :
2/5
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