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Grudge Review: इन्तेकाम पर सहानुभूति भारी पड़ी है तुर्की फिल्म "ग्रज" में

ग्रज
ग्रज
2.5/5
पर्दे पर:8 अक्टूबर, 2021
डायरेक्टर : तुरकन देरया
संगीत : अहमत केनन बिलगिक
कलाकार : इल्माज़ एर्डोगन, अहमद मुम्ताष टैलं, सेम यिगित उजुमोगलू
शैली : क्राइम, ड्रामा, थ्रिलर
यूजर रेटिंग :
0/5
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Grudge Review: इन्तेकाम पर सहानुभूति भारी पड़ी है तुर्की फिल्म "ग्रज" में

इल्माज़ एर्डोगन की लिखी और अभिनीत फिल्म "ग्रज (Grudge)" हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आयी है. (फोटो साभारः यूट्यूबः netflix)

इल्माज़ एर्डोगन की लिखी और अभिनीत फिल्म "ग्रज (Grudge)" हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आयी है. (फोटो साभारः यूट्यूबः netflix)

तुर्की अभिनेता इल्माज़ एर्डोगन की लिखी और अभिनीत फिल्म "ग्रज (Grudge)" हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आयी है. दुनिया के हर कोने में एक बात तो बारम्बार साबित होती आयी है कि हिंसा की उपयोगिता शून्य ही रहेगी.

तुर्की अभिनेता इल्माज़ एर्डोगन की लिखी और अभिनीत फिल्म “ग्रज (Grudge)” हाल ही में नेटफ्लिक्स पर आयी है. दुनिया के हर कोने में एक बात तो बारम्बार साबित होती आयी है कि हिंसा की उपयोगिता शून्य ही रहेगी. छोटे छोटे मामलों में भले ही लोग आपस में लड़ के मामला ख़त्म कर दें मगर हमेशा के लिए यदि शांति चाहिए और आप मन पर बिना बोझ लिए जीना चाहते हैं तो आपको झगडे के बजाये शांति को तरजीह देनी ही होगी. फिल्म का कथानक नया नहीं है फिर भी आपको अच्छा लगता है क्योंकि फिल्म का हीरो पुलिस में है और उसकी मजबूरियां किसी नौकरी पेशा आदमी की ही तरह उसे सर झुका के आदेश मानने का काम देती रहती है. वर्ल्ड सिनेमा में तुर्की अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराता रहता है. तुर्की की वेब सीरीज “एर्तुगुल” की तुलना “गेम ऑफ़ थ्रोन्स” से की जाती है.

चीफ इंस्पेक्टर हारून (इल्माज़ एर्डोगन) को “पुलिसमैन ऑफ़ द ईयर” के ख़िताब से नवाज़ा जाता है. पार्टी के बाद हारून एक टैक्सी में बैठ कर घर के लिए निकलते हैं जाती है. ड्राइवर उन्हें एक सुनसान जगह पर ले जा कर उन पर हमला बोल देता है. अपनी जान बचाने के चक्कर में हारून से उस ड्राइवर का खून हो जाता है. हारून अपनी उँगलियों के निशान मिटा कर वहां से भाग जाता है. अगले दिन उस ड्राइवर की लाश पुलिस स्टेशन के बाहर एक क्रेन से टंगी मिलती है. केस दर्ज़ होता है और हारून के मन में एक भय बैठ जाता है. उसके एक साथी टुनकाय (सेम यिजित उजुमोगलू) को उसकी असलियत पता चल जाती है लेकिन वो सबूत सबके सामने लाने के बजाये हारून को सौंप देता है. जांच आगे चलती है तो हारून को समझ आता है कि वो किसी चालाक आदमी की गहरी चाल का शिकार हो गया है. साज़िश सुलझाते सुलझाते हारून को पता चलता है कि ये सब खेल एक लड़की ने रचा है जो हारून के किसी केस की वजह से अपने पिता को खो बैठी थी. वो लड़की और उसका राज़दार-साथीदार भाई, हारून की फंसाने के लिए ये पूरा खेल रचते हैं. क्या हारून अपने आप को इस क़त्ल के इलज़ाम से बचा पाता है? यही समझने के लिए फिल्म देखिये.

इस तरह की फिल्में हॉलीवुड में 90 के दशकों में देखने को मिलती थीं. गलती से हुआ एक कत्ल जो दरअसल एक लम्बी प्लानिंग का नतीजा होता है. हीरो के मन में किसी गुनाह का प्रायश्चित करने की तमन्ना तो है, लेकिन परिस्थितयां या आलस्य उसे ऐसा नहीं करने देते. पुलिस हमेशा अपने आप को सही मानती है और हीरो तो कभी गलती कर नहीं सकता. ग्रज देखने में अच्छी लगती है क्योंकि अभिनय अच्छा है और कहानी की रफ़्तार भी अच्छी है. सस्पेंस के बारे में आप पूर्वानुमान लगा सकते हैं लेकिन वो सस्पेंस खुलेगा कैसे ये थोड़ा रोचक बन पड़ा है. यादगार सस्पेंस फिल्मों में आम तौर पर सीरियल मर्डर्स होते हैं या फिर खूनी कौन होगा इसकी जांच आपको बांधे रखती है. ग्रज में ऐसा है तो नहीं फिर भी इल्माज़ एर्डोगनके चेहरे पर आते भाव और परत दर परत जांच में सच के करीब जाने की कवायद में आप हीरो से सहानुभूति नहीं रख पाते.

इस फिल्म को देखने की कुछ अच्छी वजहें हैं. फिल्म में कहीं भी ड्रामा नहीं डाला गया है. जैसे जैसे पुलिस अफसर एक एक करके मर्डर को सुलझाते हैं, सबूत इकठ्ठा करते हैं और हर कदम के साथ आपको मुजरिम के पकडे जाने का डर साफ़ नज़र आने लगता है तो आप कहानी से जुड़ाव महसूस करने लगते हैं. इल्माज़ एर्डोगन के अलावा साथी कलाकारों का अभिनय भी उम्दा है. फिल्म का आखिरी सीन एक फ्लैशबैक है जो कि कहानी की ईमानदारी का सबूत है. इस सीन में सेम यिगित ने अपनी पहली ही फिल्म से अभी अभिनय की संभावनाओं को एक नए तरीके से परिभाषित किया है. गेवेन्दे नाम के बैंड के कर्ता धर्ता अहमत केनन ने इस फिल्म का संगीत रचा है. सुनने वाली बात यहाँ ये है कि हर सीन में किस भावना कोई कितनी तवज्जो देनी है ये अहमत के संगीत से समझा जा सकता है. तुर्की की संगीत परंपरा से परे, अहमत ने वर्ल्ड म्यूजिक की मदद से इस फिल्म के हर दृश्य को सजाया है.

फिल्म के आखिर में जब हीरो हारून का सामना उस शख्स से होता है जिसकी मदद से उन्हें फंसाने का पूरा जाल रचा गया था, तो हारून खुद हैरान हो जाते हैं. महात्मा गाँधी की सीख याद आती है जब वो कहते हैं कि ईर्ष्या, जलन, बदला या प्रतिशोध की भावना का ख़त्म होना ज़रूरी है. खून का बदला खून नहीं हो सकता और इसलिए वो अपनी अनजाने में की गयी गलती को सुधारना चाहते हैं. हारून अपनी पिस्तौल नीचे फेंक देते हैं. उनका विरोधी उनकी इस अप्रत्याशित हरकत से शॉक हो जाता है और उसे याद आता है कि कैसे हारून ने उसे बचपन में एक अच्छा इंसान बनने की शिक्षा दी थी. आत्मग्लानि से भरा वो शख्स अपने आप को गोली मार लेता है और तब तक पुलिस हारून को गिरफ्तार कर लेती है. इस एक दृश्य की कीमत , इसकी खूबसूरती, इसकी गहराई को समझने के लिए फिल्म देखना ज़रूरी है. निराशा के इस माहौल में, जान लेने पर आमादा हम, कैसे अपनी ग्लानि से मुक्ति पा सकते हैं और बदले की आग को बुझा सकते हैं, ये समझने के लिए “ग्रज” देख लीजिये.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
/5
स्क्रिनप्ल:
/5
डायरेक्शन:
/5
संगीत:
/5

Tags: Film review, Movie review

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