मंटो
2.5/5
पर्दे पर : 21 सितंबर 2018
डायरेक्टर : नंदिता दास
संगीत : रेसुल पुक्कुटी
कलाकार : नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, रसिका दुग्गल
शैली : बायोपिक
यूजर रेटिंग :
0/5
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MANTO REVIEW: 'मंटो' के बारे में जो आप जानते हैं वही फिल्म में है, ज्यादा उम्मीद मत रखें!

हर फिल्म एक उद्देश्य की ओर बढ़ती है और अगर इस फिल्म का उद्देश्य मंटो की जिंदगी दिखाकर, उनका दर्शन जनता तक पहुंचाना है, तो यह फिल्म ऐसा नहीं कर पाती.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 21, 2018, 11:39 AM IST
MANTO REVIEW: 'मंटो' के बारे में जो आप जानते हैं वही फिल्म में है, ज्यादा उम्मीद मत रखें!
नवाज़ुद्दीन की इस फिल्म में आपको कुछ नया शायद न मिले
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: September 21, 2018, 11:39 AM IST
मंटो, जिनकी कहानियों में बुरे के बाद अच्छा होने की आशा नहीं होती. जिसमें समाज का वहशीपन बिना किसी नरमी के साथ उभारा गया होता है. ऐसा लेखक जिसके अफसानों में अक्सर एक वाकया होता है जिसमें कुछ लोगों के साथ घटी किसी अनजानी और अंदर तक झकझोर देने वाली घटना को लिखा गया होता है. ऐसे में जरूरी था कि उनपर बनी फिल्म भी वैसी ही हो. नंदिता दास को सिनेमा में निर्देशक के तौर पर उतना अनुभव नहीं है. लेकिन उनकी पहली फिल्म 'फ़िराक' ने अपना प्रभाव छोड़ा था और ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म को लेकर उनसे उम्मीदे थीं, लेकिन ये हो न सका.

मंटो, निर्देशक के तौर पर उनकी दूसरी फिल्म है. यह एक बायोपिक है यानी अफसानानिगार मंटो की असली कहानी लेकिन निराश करने वाली बात यह है कि इसमें मंटो के बचपन और शुरूआती दौर में उनके परिवार को नहीं दिखाया गया है. जिस फिल्म के बारे में इतना प्रचार किया गया हो, उसमें वही सारी बातें निकलकर सामने आती हैं जो मंटो और उनके साहित्य को ठीक-ठाक जानने वाले को निराश करता है.

फिल्म में मंटो एक लेखक के तौर पर दिखाए गए हैं जो मुंबई में रह रहे हैं और फिल्मों से जुड़े हुए हैं. खुद्दार लेखक हैं. अपने डायलॉग चेंज करने पर प्रोड्यूसर से भिड़ जाते हैं. मंटो, हिमांशु रॉय के बॉम्बे टॉकीज से जुड़े हुए हैं. मुंबई में रहते हुए कृश्नचंदर, अशोक कुमार, जद्दनबाई, नौशाद, इस्मत आदि महान लेखकों और कलाकारों के दोस्त हैं. लेकिन उनके सबसे करीबी हैं एक्टर श्याम.

मंटो जिस दौर में मुंबई में फिल्मों के लिए लिख रहे हैं वह आजादी के आंदोलन का आखिरी दौर भी है. जिसमें मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग बुलंद कर रखी है. ऐसे में मुंबई में भी बहुत दंगे हो रहे हैं. मंटो इससे परेशान हो जाते हैं. इसी दौर में आजादी के साथ यह मार-काट और बढ़ जाती है और एक रोज अपने दोस्त श्याम के मुंह से कोई बात सुनकर उन्हें गहरी ठेस लगती है और मंटो तय कर लेते हैं कि वे पाकिस्तान चले जाएंगे. हालांकि कई दूसरे पाकिस्तान जाने वालों की तरह उनमें इसका कोई उत्साह नहीं है.


इसके बाद वहां लेखकों पर अंग्रेजी दौर जैसी ही पाबंदियों, प्रकाशकों-संपादकों के काम न देने, काम के बदले बहुत कम पैसा देने और शराब पीने की आदत के चलते मंटो खत्म होना शुरू हो जाते हैं. हमेशा यारों के बीच रहने वाले मंटो को पाकिस्तान में अकेलापना घेर लेता है और अंत में वो अपनी शराब की लत छोड़ने के लिए एक अस्पताल चले जाते हैं. फ़िल्म यहीं पर 'फैज़' की नज़्म 'बोल की लब आजाद हैं तेरे' के साथ खत्म हो जाती है.

वैसे तो अंतिम 25-30 मिनट फ़िल्म आपको कहानी से अच्छे से बांधे रखती है, लेकिन अगर आपने इस्मत चुगतई की आत्मकथा 'कागज़ी है पैरहन' पढ़ी है तो उसमें आपको ये सब पढ़ने को मिलेगा... बल्कि कुछ ज्यादा ही मिलेगा.

नवाजुद्दीन सिद्दीकी के साथ इस फिल्म में जावेद अख्तर, इला अरुण, दिव्या दत्ता, ऋषि कपूर, गुरदास मान, परेश रावल, शशांक अरोड़ा, रणवीर शौरी और नीरज कबीर जैसे स्वनामधन्य कलाकारों की उपस्थिति है. जो वक्त-वक्त पर सुखद एहसास तो कराती है लेकिन आपके ऊपर कोई सर्वकालिक प्रभाव नहीं छोड़ पाती. फिल्म मंटो में रसिका दुग्गल एक ऐसी एक्टर हैं, जिनके किरदार और सहने की क्षमता से दर्शक खुद को जोड़ पाते हैं.
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फिल्म में संसाधनों के इस्तेमाल के हिसाब से फिल्म की सिनेमैटोग्राफी ठीक है. फिल्म में रसूल पुकुट्टी का म्यूजिक है लेकिन प्रभावित तो नहीं ही करता. हां, आर्ट डायरेक्शन उम्दा है. सबसे ज्यादा निराशा नंदिता दास के डायरेक्शन और स्क्रिप्ट से होती है क्योंकि उन्होंने कई सारी कहानियों को भी फिल्माने के लालच में कहानी को बहुत छितरा दिया है. इसके अलावा वो कहानियां अपने-आप में मुकम्मल लगती हैं.


पर ये कहानियां ही फिल्म के मूल कथानक को छेड़ भी देती है. फिल्म जो नली में भरे पानी की तरह होनी चाहिए थी, उसमें ये छोटी छोटी कहानियां बीच में आकर बुलबुले पैदा कर देती हैं. निर्देशक का मंटो की कहानियों को स्क्रीन पर दिखा लेने का लालच समझा जा सकता है, लेकिन डायरेक्टर को अपना उद्देश्य भी साफ रखना चाहिए.

काश यह एक ऐसी फिल्म होती जो आम दर्शकों का सामना मंटो से करवा पाती, तो ज्यादा अच्छा होता. इसके अलावा किसी फिल्म के लिए सबसे जरूरी चीज बाइंडिंग ग्लू होता है, जो इस फिल्म में नहीं है. मतलब हर फिल्म एक उद्देश्य की ओर बढ़ती है और अगर यह मान लें कि इस फिल्म का उद्देश्य मंटो की जिंदगी दिखाकर, उनका दर्शन जनता तक पहुंचाना है तो यह फिल्म नहीं कर पाती क्योंकि जो मंटो तरक्कीपसंदों के हर साहित्य में एक आशा की किरण (सिल्वर लाइनिंग) का विरोध करता है, उसी पर फिल्म बनाते हुए नंदिता दास ने फिल्म के आखिरी में एक सिल्वर लाइनिंग छोड़ रखी है.

मंटो को बहुत पसंद करने वाले और उनके बारे में पढ़-लिख चुकी जनता के लिए फिल्म में कुछ खास नहीं है और जिसने न ही मंटो को पढ़ा है और न ही उनके बारे में वो इसे देखकर कंफ्यूज हो सकते हैं. मंटो को पढ़े, समझे फिर फ़िल्म देखें आप भी एक बेहतर समीक्षा कर पाएंगे.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
2/5
स्क्रिनप्ल :
2/5
डायरेक्शन :
2/5
संगीत :
3/5
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