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मूवी रिव्यूः पढ़ें, कैसी है रणदीप-काजल की 'दो लफ्जों की कहानी...'

मूवी रिव्यूः पढ़ें, कैसी है रणदीप-काजल की 'दो लफ्जों की कहानी...'

दो डॉयलॉग जो याद रहेंगे वो काजल के हिस्से में आए हैं। काजल जब पूछती है कि वो कैसा दिखता है, तो रणदीप यानि सूरज होता है-'लोग रफ एंड टफ बोलते हैं', तो जेनी पलटकर बोलती है कि यानि 'शक्लो-सूरत कुछ खास नहीं है'।

दो डॉयलॉग जो याद रहेंगे वो काजल के हिस्से में आए हैं। काजल जब पूछती है कि वो कैसा दिखता है, तो रणदीप यानि सूरज होता है-'लोग रफ एंड टफ बोलते हैं', तो जेनी पलटकर बोलती है कि यानि 'शक्लो-सूरत कुछ खास नहीं है'।

दो डॉयलॉग जो याद रहेंगे वो काजल के हिस्से में आए हैं। काजल जब पूछती है कि वो कैसा दिखता है, तो रणदीप यानि सूरज होता है-'लोग रफ एंड टफ बोलते हैं', तो जेनी पलटकर बोलती है कि यानि 'शक्लो-सूरत कुछ खास नहीं है'।

    श्रवण शुक्ल, 2/5***। कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो अपनी तय लाइन पर ही चलती हैं और उसपर फिट भी बैठती है। पर 'दो लफ्जों की कहानी' ऐसी फिल्म बिल्कुल भी नहीं है। ये एक किक बॉक्सर की कहानी है, जो किसी कारणवण अपनी जिंदगी से रूठ जाता है। कुछ ऐसा रूठता है कि वो उल्टे सीधे कामों में घुस जाता है और जेल हो जाती है। ये एक सर्टिफाइड नर्स की भी कहानी है, जो भारतीय सीरियल्स की फैन होती है। कहानी मलेशिया के बैकड्रॉप पर है और पूरी की पूरी फिल्म मलेशिया में ही शूट भी हुई है।

    कहानी की बात करें तो फिल्म पूरी तरह से सॉउथ कोरियन फिल्म 'ऑलवेज' की रीमेक है। उस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर धमाल मचाया था और पिछले साल ही उसपर कन्नड फिल्म 'बॉक्सर' बनी है। रणदीप हुड्डा कहते हैं कि मुझे पता भी नहीं है कि 'बॉक्सर' जैसी फिल्म उसी पर बनी है और न ही उसने 'बॉक्सर' देखी है। इस फिल्म में दो ही मुख्य किरदार है जेनी और सूरज का। बाकि सभी किरदार बेहतर तरीके से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। पता नहीं क्या सोचकर दीपक तिजोरी ने ये फिल्म बनाई है, पर जितना भी सोचा, उसपर फोकस नहीं रख पाए।

    फिल्म 'दो लफ्जों की कहानी' की कहानी को रिवील करना बिल्कुल नहीं चाहूंगा। अगर आप रणदीप हुड्डा के फैन हैं, तो एक बार फिल्म जरूर देखनी चाहिए। और हां, अगर काजल अग्रवाल की मासूमियत के दीवाने हैं तो फिल्म आपको बोझिल नहीं करेगी। पर अगर आप स्टोरी लाइन और दमदार एक्शन के साथ ही मजेदार लव फिल्मों के शौकीन हैं, तो थोड़ा निराश होंगे।

    'दो लफ्जों की कहानी' पहले हाफ में थोड़ा नहीं, कुछ ज्यादा ही बोर करती है। कहानी धीरे चलती है और सूरज को समझाने में ही निकल जाती है। पहले हाफ में कुछ भी साफ नहीं हो पाता कि लोग आखिर कुछ करना भी तो क्या चाहते हैं? दो लाइन में लिखें, तो सूरज एक किक बॉक्सर है। जो अच्छे दिल का है। उसे दुनिया बेवकूफ बनाती है और वो इमोशंस में बहकर अपनी फाइट हार जाता है। उसका मालिक बर्बाद हो जाता है। कुमार गौरव एक छोटी सी भूमिका में हैं। जो याद दिलाते हैं कि वो इंडस्ट्री में बने हुए हैं पर अब भी घुल मिल नहीं पाए हैं। इस फिल्म में जेनी है, जो बेहद प्यारी है। पर प्यारा होना किसी से इश्क होने की गारंटी भर नहीं है। हां, फिल्म लॉर्जर दैन लॉइफ है, तो इतना झेलना ही पड़ेगा। हैप्पी एंडिग तो बॉलीवुड की वो लाइन है, जिसे वो छोड़ नहीं पा रहा है।

    काजल अग्रवाल यानि जेनी सीरियल की फैन होती है। जेनी एक दुर्घटना में अंधी हो जाती है। उसकी आंखों की रोशनी थोड़े समय में स्थाई रूप से जाने वाली होती है, पर उस थोड़े से समय में अगर एक ऑपरेशन हो जाए तो रोशनी वापस लौट सकती है। यही वो लड़ाई है जिसे सूरज लड़ता है। फिल्म में जेनी रणदीप हुड्डा यानि सूरज से मिलती है एक स्टोर में। उस स्टोर में रणदीप हुड्डा काम कर रहा होता है, अपनी तीसरी शिफ्ट लगा रहा है। वो उस समय कमरतोड़ मेहनत कर रहा होता है, ताकि पश्चाताप कर सके। उसे पता नहीं होता है कि जिस व्यक्ति की वो जान बचाने में अपना सबकुछ झोंक रहा होता है, जिस एक्सीडेंट को लेकर वो पछता रहा होता है, उसी एक्सीडेंट में 2 लोग और मारे गए होते हैं, और जेनी अंधी हो चुकी होती है। इस एक्सीडेंट में मरने वाले जेनी के माता-पिता होते हैं।
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    सूरज के किरदार में रणदीप हुड्डा ने पूरी जोर लगा दिया है। एब्स के लिए खासी मेहनत की है। वो किक बॉक्सर के रोल में फिट बैठे हैं। पर कहीं न कहीं एक्सप्रेशंस के मामले में कमजोर पड़े हैं। वहीं, काजल अग्रवाल अब फिल्मों में रच बस चुकी हैं। वो अंधी लड़की के किरदार में जम रही हैं। दो डॉयलॉग जो याद रहेंगे वो काजल के हिस्से में आए हैं। काजल जब पूछती है कि वो कैसा दिखता है, तो रणदीप यानि सूरज होता है-'लोग रफ एंड टफ बोलते हैं', तो जेनी पलटकर बोलती है कि यानि 'शक्लो-सूरत कुछ खास नहीं है'। दूसरा डॉयलॉग है, जब सूरज से जेनी बोलती है कि 'क्या वो अंधी नहीं होती, तब भी वो ऐसे ही उससे झूठ बोलता?'।

    खैर, फिल्म शुरू से ही आपको बोर करेगी। ये 'टिपिकल' इंडियन लव स्टोरी जैसी फिल्म तो नहीं थी, पर बना दी गई। और यहीं पूरी फिल्म का कबाड़ा हो गया। बहरहाल, फिल्म में संगीत की बात करें तो कई अंकित तिवारी, अमाल मलिक ने ठीक ठाक ही संगीत दिया है। 'जीना मरना' और 'कुछ तो है' का फिल्मांकन अच्छा बन पड़ा है। एक्शन सीक्वेंस खासकर रिंग में फाइट के सीन अच्छे बन पड़े हैं, पर फिर भी कुछ कमीं तो दिखती है।

    बहरहाल, फिल्म की बात करें तो दीपक तिजोरी को काफी अनुभव हो चला है। पर उन्होंने भी अपनी लाइफ में कोई बहुत अच्छी फिल्में की नहीं हैं, इसकी कमीं इस फिल्म में भी साफ झलकती है। हालांकि वो निर्देशन में लंबा समय बिता चुके हैं। उनके नाम फरेब, टॉप डिक एंड हैरी, फॉक्स, डेयर यू जैसी फिल्में हैं, पर 'दो लफ्जों की कहानी' इन सबमें बेहतर है।

    फिल्म क्यों देखें: आप रणदीप हुड्डा के फैन हैं, तो एक बार फिल्म जरूर देखनी चाहिए। रणदीव के डोल-शोले आपको निराश नहीं करेंगे। पर फाइटिंग सीन ज्यादा नहीं है। हों भी क्यों, ट्रैक पर मोहब्बत जो दिखानी है। हां, प्यार की जो कहानी है, जो आपको अपने आस पास की ही लगेगी, क्योंकि हर किसी की जिंदगी में ऐसी मोहब्बत जरूर होती है जिसके लिए आप कुछ करना चाहते हैं। पर रियल लाइफ में वाकई कुछ नहीं कर पाते। थोड़ी-बहुत मोहब्बत का जुनून भी फिल्म से आपको जोड़े रखेगा पर आखिर में थोड़े बहुत निराश भी होंगे।

    क्यों न देखें: ये फिल्म न तो टिपिकल लव स्टोरी ही बन पाई है, न ही एक्शन मूवी। किक बॉक्सिंग को थोड़ी और जगह देनी थी। खून खराबे से अब भारतीय दर्शक बंधने लगे हैं, वो हिचकते नहीं है। फिल्म को थोड़ा छोटा रखा जा सकता था। ढंग का स्टारकास्ट नहीं है, पर एक दो किरदारों को थोड़ा विस्तार मिलता तो बेहतर होता।

    Tags: Bollywood, Boxing, Deepak Tijori, Randeep hooda

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