Home /News /entertainment /

Film Review: कड़वी दवाई जैसा असर करती है 'बृज मोहन अमर रहे'

बृज मोहन अमर रहे
बृज मोहन अमर रहे
3/5
पर्दे पर:3 अगस्त
डायरेक्टर : निखिल भट्ट
संगीत : एंड्रयू टी मैके
कलाकार : अर्जुन माथुर, निधि सिंह, मानव विज़
शैली : क्राइम ड्रामा
यूजर रेटिंग :
0/5
Rate this movie

Film Review: कड़वी दवाई जैसा असर करती है 'बृज मोहन अमर रहे'

बृजमोहन अमर रहे

बृजमोहन अमर रहे

ये फिल्म बहुत कड़वी है और अगर आप अखबार पढ़ते हैं या क्राइम मैगज़ीन पढ़ने के आप शौकीन हैं तो आपको इस फिल्म को देखकर ऐसी कई खबरें और किस्से याद आ जाएंगे जो आपने सुने या पढ़े होंगे.

    नेटफ़्लिक्स भारत में भी अमेरिका और जर्मनी जैसी कोशिश दोहराने में जुटी है. कंपनी ज्यादा से ज्यादा ओरिजनल कंटेंट बनाकर मुख्य सिनेमा के सामने एक पैरेलल सिनेमा खड़ा करना चाहती है. सेक्रेड गेम्स और लस्ट स्टोरीज़ इसी का उदाहरण है और अब 'बृज मोहन अमर रहे' भी इस कड़ी में ऐसी ही कोशिश करती एक फिल्म है. लेकिन नेटफ़्लिक्स को देखना एक महंगा काम है और यही वजह है कि भारत में इसका बाज़ार उस तेज़ी से बढ़ नहीं रहा. पर नेटफ़्लिक्स अपनी कोशिश कर रहा है और बृज मोहन एक ठीक ठाक कोशिश है.

    बृज मोहन अमर रहे कहानी है बृज मोहन (अर्जुन माथुर) की, जो बैंक के कर्ज़ों को चुकाने, घर चलाने के चक्कर में खुद को एक ऐसे जाल में फंसा लेता है कि उससे निकलना मुश्किल हो जाता है. घर और बाहर से परेशान, धोखा खाया बृज अपनी आइडेंटिटी को अमर सेठी के तौर पर बदलता है और फिर अपने ही कत्ल के इल्जाम में फंस जाता है. इसके बाद कानून, पुलिस और पैसे का ऐसा खेल होता है कि बृज मोहन को समझ आ जाता है कि कोई अपना नहीं होता.

    निर्देशक निखिल भट्ट ने दिल्ली के जिस 'अंडर द टेबल'  माहौल को कैप्चर करने की कोशिश की है वो उसमें काफी हद तक सफल रहे हैं. ऊपर से दिलवालों की दिल्ली का दिल अंदर से कितना छोटा है इस फिल्म को देखकर आप समझ जाएंगे. निखिल का एक एक फ्रेम बंधा हुआ है और वो जानते हैं कि उनके किरदार कौन हैं. ये उनके निर्देशन की ताकत है कि उनका एक भी किरदार एक्टर नहीं लगता. वो दिल्ली का ही कोई बाशिंदा लगता है, जिससे आप कहीं तो मिले हैं.

    बृज मोहन गुप्ता एक असहाय दुकानदार, प्यार और पैसे की प्यासी उसकी पत्नी स्वीटी, बृज की गर्लफेंड सिमी जिसे सेल्फी और मेकअप  का शौक है और एक करप्ट इंस्पेक्टर बेनीवाल. जिस दुनिया को आप अखबारों की क्राइम सेक्शन में पढ़ते हैं और मानने से इंकार कर देते हैं. बृज मोहन अमर रहे उसी तबके की खुली तस्वीर है.

    ये फिल्म बहुत कड़वी है और अगर आप अखबार पढ़ते हैं या क्राइम मैगज़ीन पढ़ने के आप शौकीन हैं तो आपको इस फिल्म को देखकर ऐसी कई खबरें और किस्से याद आ जाएंगे जो आपने सुने या पढ़े होंगे.


    एक आदमी जो अपने ही कत्ल के इल्जाम में पकड़ा गया, पुलिस ने कैसे तफ्तीश की, प्राइवेट लोन लेने वाले लोगों की रिकवरी का स्टाइल, बिजनेस में धोखा, पति को धोखा देने वाली पत्नी और पत्नी को धोखा देने वाला पति, पैसे के पीछे भागने वाल गर्लफ्रेंड और किसी अपराधी को  केस में फंसाना है या नहीं एक साथ बैठ कर डिसाइड करते दोनों पक्ष के वकील और जज. बृज मोहन अमर रहे आपके मन में अंत में इस सिस्टम के लिए अविश्वास और घृणा छोड़ जाती है और यही इस फिल्म की जीत है क्योंकि ये रोमांटिक फिल्म नहीं एक क्राइम ड्रामा है.

    फिल्म की स्पीड बहुत अच्छी है और आप कहीं भी फिल्म से बोर नहीं होते. फिल्म में सभी गाने बैकगाउंड में चलते हैं और बेवजह किसी भी सीन को खींचा नहीं गया है. यहां तक की सेक्स सीन दिखा कर नंबर कमाने की इच्छा निर्देशक को नहीं थी और ये एक अच्छी बात है क्योंकि इससे फिल्म नैचुरल लगती है. फिल्म का एक गाना जो याद रह जाता है वो है  'आज रपट जाएं' जिसे इस फिल्म के लिए रिक्रिएट किया गया है और ये सुनने में खराब लगता है इसलिए याद रह जाता है. वर्ना बाकी सारा संगीत आप भुला देते हैं. हां एंड्रयू टी मैके द्वारा दिया गया बैकग्राउंड स्कोर जानदार है और फिल्म को तकनीकी रुप से सशक्त और रोमांचक बनाता है.

    फिल्म के डायलॉग सुनकर लगता है कि लेखक निखिल भट्ट और कुलदीप रुहिल को दिल्ली का जबर्दस्त अनुभव है और फिर जिन एक्टर्स का चुनाव किया गया है वो भी दिल्ली से जुड़े रहे हैं और ऐसे में सभी कलाकार अपने अपने किरदार में सुपर फिट नज़र आते हैं.

    मुख्य किरदार में अर्जुन माथुर का काम थोड़ा अटपटा लगता है और वो अपनी सपोर्टिंग कास्ट के आगे अभिनय के मामले में हल्के लगते हैं, लेकिन उनका किरदार भी तो एक हल्के आदमी का किरदार था. इसलिए उन्हें बेनेफिट ऑफ डाउट मिलना ही चाहिए. फिल्म में जान डालते हैं मानव विज़. आखिरी बार 'लखनऊ सेंट्रल' में तिलकधारी के किरदार में नज़र आए मानव विज़ किसी दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टर के रोल में ऐसे रमे की कुछ मिनटों के लिए लगा कि इस पुलिसवाले को किस थाने में देखा है?

    प्राइवेट लोन देने वाले रघु भाई का किरदार सनी हिंदुजा ने निभाया है और वो दिल्ली के अंदाज़ को जानते और समझते हैं. इसलिए इस रोल में फिट रहते हैं. बाकी किरदार वैसा ही करते हैं जैसा उन्हें करना चाहिए और निर्देशन और डॉयलॉग के बाद अभिनय इस फिल्म का सबसे ताकतवर पक्ष है.

    ये एक छोटे स्केल की फिल्म है, लेकिन इसकी सिनेमैटोग्राफी इसे किसी बड़ी बजट जैसा दिखाती है और इसका श्रेय जाता है पूजा गुप्ते को. वो इंडी फिल्मों में जान डाल देती हैं. हाल ही में उनकी फिल्म 'रुख' की सिनेमैटोग्राफी की भी तारीफ हुई थी.


    इस फिल्म को आप एक बार देखिए ज़रूर, हां इसके लिए आपको नेटफ्लिक्स के सब्सक्रिप्शन की ज़रूरत होगी और वो सिनेमा के टिकट से थोड़ा महंगा रहता है. लेकिन फिर लगे हाथ आप सेक्रेड गेम्स और लस्ट स्टोरीज़ भी देख सकते हैं. फिलहाल बृज मोहन अमर रहे एक अच्छी कोशिश है जो नेटफ्लिक्स को बेहतर वर्जन देता है.

    ये भी पढ़ें
    शिवगामी की कहानी लेकर आ रहा है Netflix, बाहुबली बिफोर द बिगनिंग में खुलेंगे कई राज

    डिटेल्ड रेटिंग

    कहानी:
    3.5/5
    स्क्रिनप्ल:
    4/5
    डायरेक्शन:
    4/5
    संगीत:
    2/5

    Tags: Netflix

    विज्ञापन

    राशिभविष्य

    मेष

    वृषभ

    मिथुन

    कर्क

    सिंह

    कन्या

    तुला

    वृश्चिक

    धनु

    मकर

    कुंभ

    मीन

    प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
    और भी पढ़ें
    विज्ञापन

    टॉप स्टोरीज

    अधिक पढ़ें

    अगली ख़बर