FILM REVIEW: 'अजीब दास्तान' में एक बात तो है, जो नहीं होती तो शायद ठीक रहता

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है

नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई है "अजीब दास्तान (Ajeeb Daastaans)".

करण जौहर आत्म मुग्ध हैं और आत्म-निर्भर भी हैं. इसलिए वो फिल्में निर्देशित करते हैं और निर्देशित करवाते भी हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 20, 2021, 12:17 PM IST
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फिल्मः अजीब दास्तान

ड्यूरेशनः 142 मिनट्स

ओटीटीः नेटफ्लिक्स

माह-ए-फरवरी में इस्लामाबाद, पाकिस्तान की 19 साल की दानानीर मुबीन ने एक शॉर्ट वीडियो इंटरनेट की दुनिया में फेंक दिया था. मजमून था- ये हमारी कार है. और ये हम हैं. और ये हमारी पावरी होरी है. आत्मरति से आत्म-मुग्धता तक का सफर तय करने वाली पूरी पीढ़ी बौराई चली गयी. इसी विचारधारा का नमूना है, धर्माटिक एंटरटेनमेंट (धर्मा प्रोडक्शंस का ओटीटी कॉन्टेंट बनाने वाली कंपनी) की नयी प्रस्तुति "अजीब दास्तान (Ajeeb Daastaans)" जो नेटफ्लिक्स पर रिलीज की गयी है. देखने के बाद मन में ख्याल आया कि ये हमारी धर्मा प्रोडक्शंस हैं, ये हमारे डायरेक्टर्स हैं और और ये हमारी पावरी होरी है.
करण जौहर आत्म मुग्ध हैं. करण जौहर आत्मरति में विश्वास रखते हैं. करण जौहर आत्म-निर्भर भी हैं. इसलिए वो फिल्में निर्देशित करते हैं और निर्देशित करवाते भी हैं. "अजीब दास्तान" को 4 इन हाउस निर्देशकों द्वारा निर्देशित किया गया है, जिसमें शशांक खेतान (हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया, बद्रीनाथ की दुल्हनिया), राज मेहता (गुड न्यूज़), नीरज घेवान (मसान) और बोमन ईरानी के सुपुत्र कायोज़े ईरानी का नाम शामिल है. सेक्स, लगभग हर कहानी के केंद्र में है, या फिर अंडे में से फूट के बाहर आ रहा है. कहीं समलैंगिक सम्बन्ध हैं, तो कहीं अवैध सम्बन्ध हैं, तो कहीं ठरक है और कहीं विवाहेतर सम्बन्ध हैं. नीरज घेवान की गीली पुच्ची को छोड़ दें तो हर कहानी में जो सेक्स का तड़का डाला गया है, उसके बगैर कहानी में और अधिक मार्मिकता आ सकती थी. संभवतः आम दर्शक, यौन कुंठाओं की क्षुधा-शांति लिए ही ओटीटी प्लेटफॉर्म जाता है और इसलिए इन कहानियों में इसे रखना ज़रूरी था. लस्ट स्टोरीज, घोस्ट स्टोरीज जैसे कहानी संकलनों के बाद ये एक और संकलन है जो कि उम्मीद से कम रह जाता है जबकि संभावनाओं की कोई कमी नज़र नहीं आती.

शशांक खेतान की "मजनू" पहली कहानी है और ये खुद शशांक ने ही लिखी है. प्रमुख अभिनेता हैं जयदीप अहलावत, फातिमा सना शेख और अरमान रल्हन. जयदीप का चेहरा ओम पुरी जैसा सिलबट्टे की तरह खुरदुरा है मगर अभिनय ढ़ाके की मलमल की तरह है. फातिमा सना शेख हर फिल्म के साथ बेहतर होती जा रही हैं. इस फिल्म में भी उन्होंने बहुत उम्दा अभिनय किया है. फिल्मकार ओपी रल्हन के नाती अरमान रल्हन कहानी के तीसरे कोण हैं. एक गे पति, एक असंतुष्ट पत्नी, पिता की बेइज़्ज़ती का बदला लेता एक बेटा, जिस पर पति और पत्नी दोनों डोरे डालते हैं. उत्तर प्रदेश की तेहरी की तरह सबकुछ मिक्स हो गया. इस वजह से कोई एक सिरा भी मजबूती से कहानी को संभाल के नहीं रखता. न फ़्रस्ट्रेटेड फातिमा, न जलकुकड़ा जयदीप और न ही ऑलमोस्ट स्टाइलिश अरमान. एक गाना है, जो मौके पर आता है, अच्छा लगता है. फिल्म में फातिमा और अरमान के बीच सेक्स सीन की ज़रूरत थी नहीं और जयदीप को गे बनाए बगैर भी कहानी ठीक चलती. मगर, ये पावरी हो रही है.

अगली फिल्म है राज मेहता की "खिलौना". कास्टिंग बढ़िया है. एक कॉलोनी में इस्त्री करनेवाला अभिषेक बनर्जी (जो खुद कास्टिंग डायरेक्टर हैं), उसकी गर्लफ्रेंड और घरों में बाई का काम करने वाली नुसरत भरुचा, विलन के तौर पर मनीष वर्मा और कहानी का सबसे बड़ा किरदार - 9 साल की इनायत वर्मा. राज मेहता की पहली फिल्म थी गुड न्यूज़ जो कि एक मज़ेदार कहानी थी. ये फिल्म बहुत अलग है. आखिरी शॉट डरावना है, खूंखार है और वीभत्स. इस फिल्म में अभिषेक और नुसरत की प्रेम कहानी के बीच में सेक्स सीन से कहीं ज़्यादा बेहतर था अभिषेक का नुसरत की छिली हुई पीठ पर मलहम लगाना और दोनों एक ही बीड़ी फूंकना। मनीष वर्मा का किरदार तगड़ा था और उसकी हवस को बहुत ही संतुलित तरीके से दिखाया गया है. हालांकि, कहानी में से ये दोनों हिस्से हटाए जाते तो भी कहानी बढ़िया ही रहती. वैसे ये कहानी, लेखक सुमित सक्सेना ने 1994 में एक सत्य घटना पर आधारित कर के सोचना शुरू की थी.



तीसरी फिल्म नीरज घेवान की "गीली पुच्ची" है जो संभवतः सबसे अच्छी बनी है. कारण नीरज खुद हैं. जाति के नाम पर दलितों से हो रहे अत्याचार से नीरज स्वयं बहुत अच्छे से वाक़िफ़ हैं. उनकी फिल्म मसान में भी किरदारों की जाति अपने आप में प्रमुख रोल करती है. गीली पुच्ची में भी ऊंची जाति के लिए बिना अंडे का बर्फी स्टाइल वाला केक बनता है और नीची जाति वालों को साहब लोगों का बचा हुआ केक काटने और खाने को मिलता है. जहां ऊंची जाति अपनी नीची जाति की सहेली को ऑफिस की केक कटिंग सेरेमनी में केबिन के बाहर रोक देती है, उसके लिए घर में स्टील कप में चाय आती है, वो उसे गलत नहीं लगाती, वहीं नीची जाति, अपनी क्षमता के साथ साथ थोड़ा हरामीपन दिखाते हुए, ऊंची जाति वाली की नौकरी निगल जाती है. छोटे छोटे दृश्य हैं, फालतू के डायलॉग नहीं हैं, कोई फलसफा नहीं बयान किया गया, और न ही जाति के नाम पर कोई लेक्चर दिए गए. अदिति राव हैदरी ने बहुत अच्छा काम किया है. इनकी सुंदरता इनके करियर में बाधक लगती है. वहीं कोंकना सेन शर्मा अद्भुत हैं. लेस्बियन किरदारों के रहन सहन, उनके कपडे पहनने, उनके लड़ने और उनके अकेलेपन को बहुत अच्छे तरीके से फिल्माया गया है और कोंकना इस रोल को आत्मसात कर गयी हैं. इस कहानी में अदिति और उनके पति के बीच होने वाले संबंधों के दृश्य के बगैर भी फिल्म उतनी ही मजबूत नज़र आती. मगर आदत से मजबूर होना भी धर्मा ही है.

चौथी और सबसे छोटी फिल्म "अनकही" के निर्देशक हैं कायोज़े ईरानी। आपने इन्हें स्टूडेंट ऑफ़ द ईयर में अभिनय करते हुए देखा है. फिल्म में दो कद्दावर कलाकार हैं, शेफाली शाह और मानव कौल. दोनों में आपसी सामंजस्य बहुत अच्छा है. कुछ दृश्य मार्मिक हैं. इस कहानी में शेफाली और मानव के बीच एक दोपहर को शारीरिक सम्बन्ध स्थापित हो जाते हैं, नर्म सी कहानी में एक कांटे की तरह चुभते दृश्य हैं. बिना इसके भी कहानी उतनी ही सुन्दर रहती. कहानी का तीसरा कोण हैं अभिनेता तोता रॉय चौधुरी, जो जाने माने बंगाली अभिनेता हैं. आपने इन्हें "द गर्ल ऑन द ट्रेन" में डॉक्टर की भूमिका में भी देखा होगा. मंजे हुए अभिनेता हैं, किरदार छोटा होने की वजह से ज़्यादा स्कोप नहीं था कुछ कर पाने का. मानव कौल ने आखिरी दृश्य जो अभिनय किया है, चारों फिल्मों के बाकी किरदारों को चारों खाने चित्त कर देता है. सबसे महत्वपूर्ण बात, मानव के पास पूरी फिल्म में कोई डायलॉग है नहीं और आखिरी दृश्य में उसकी ज़रुरत थी नहीं.

फिल्म का ओपनिंग क्रेडिट केरल की कंपनी कोकाची स्टूडियो ने बनाये हैं. हिंदी फिल्मों में इस तरह के ओपनिंग क्रेडिट कम ही देखने को मिलते हैं. बहुत शानदार बने हैं. फिल्म के एडिटर हैं नितिन बैद जो इस के पहले राज़ी, गली बॉय और मसान जैसी फिल्में एडिट कर चुके हैं. नितिन का अनुभव, कहानी की समझ ज़बरदस्त है. इसलिए कहानियां थोड़ी लम्बी हो गयी हैं. शेफाली और मानव वाली कहानी की एडिटिंग सबसे खूबसूरत है. मजनूं कहानी के सिनेमेटोग्राफर पुष्कर सिंह का कैमरा वर्क बहुत अच्छा है. स्टोरी टेलिंग के लिए कैमरा प्लेसमेंट का महत्त्व इस कहानी में साफ़ नज़र आता है. खिलौना की सिनेमेटोग्राफी जिष्णु भट्टाचार्जी, गीली पुच्ची की सिद्धार्थ दीवान और अनकही की सिनेमेटोग्राफी सिद्धार्थ वासानी ने की है. किसी भी धर्मा प्रोडक्शन की फिल्म की तरह, फिल्म में सेट्स एकदम ऑथेंटिक और ज़बरदस्त हैं.

ये फिल्म चूकी कहां पर. दो तीन मुख्य बिंदु हैं. एक तो अनावश्यक सेक्स सीन्स जो कि सुन्दर कहानियों की खिड़कियों में टूटे हुए कांच की तरह नज़र आते हैं, जैसे अचानक लज़्ज़तदार मां की दाल में कंकड़. कुछ कहानियां छोटी हो सकती थीं, खास कर गीली पुच्ची और खिलौना. जिस कहानी में थ्रिल की उम्मीद थी (मजनू) उसका अंत बड़ा ही रोमांटिक बन गया, लेकिन उसके पहले दिखाया गया बदले वाला एंगल एकदम ठंडा था. "अनकही" में सेक्स की जगह पर एक नेग्लेक्टेड वाइफ और एक टैलेंटेड फोटोग्राफर की दोस्ती दिखाई जा सकती, वहां भी शरीर ने आत्मा पर विजय पा ली. वहीं चूक गए. एन्थॉलॉजी या संकलन देखने लायक है. अधिकांश लोग बोर हो जायेंगे क्योंकि कहानी दमदार है और मुफ्त का ड्रामा नहीं है बस मुफ्त का सेक्स एंगल डाला हुआ है.
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