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इंडियाज़ मोस्ट वांटेड
3/5
पर्दे पर : 24-मई-2019
डायरेक्टर : राज कुमार गुप्ता
संगीत : अमित त्रिवेदी
कलाकार : अर्जुन कपूर, प्रियंका राव, राजेश शर्मा
शैली : एक्शन थ्रिलर
यूजर रेटिंग :
0/5
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अर्जुन कपूर की इस फिल्म में वो बात नहीं की दर्शकों की भीड़ को सिनेमाघरों तक खींच सके!

प्रियंका सिन्हा झा | News18Hindi
Updated: May 24, 2019, 11:12 AM IST
अर्जुन कपूर की इस फिल्म में वो बात नहीं की दर्शकों की भीड़ को सिनेमाघरों तक खींच सके!
अर्जुन कपूर एक खुफिया एजेंट के किरदार में हैं जो भारत के सबसे खूंखार अपराधी को ढूंढ रहा है.

अर्जुन कपूर अपने किरदार को सरलता से निभाते हैं पर साधारण लेखनी के कारण उन्हें अलग पहलुओं को दर्शाने का मौका नहीं मिलता। बिना हाई वोल्टेज ड्रामा के ये फिल्म बड़े पर्दे के पैमाने पर थोड़ी छोटी पड़ती है।

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अर्जुन कपूर की इस नई फिल्म की शुरुआत पुणे शहर की मशहूर बेकरी (जर्मन बेकरी) में हुए धमाके और इसके बाद देश के अन्य शहरों जैसे हैदराबाद, जयपुर आदि में हुए धमाकों की श्रृंखला के साथ होती है. आतंकवाद की पृष्ठभूमि पर बनी इस कहानी का प्लॉट बहुत सहजता से फिल्म का मूड बनाता है और फिल्म तुरंत भारत के ‘ओसामा’ की तलाश में निकले प्रभात कपूर और उसकी कोशिशों पर आ जाती है. यहां अर्जुन एक इंटेलिजेंस एजेंट की भूमिका में हैं जो तलाश कर रहा है उस खूंखार अपराधी कि जो लाखों मासूमों का खून बहाने से परहेज़ नहीं करता. अर्जुन को इस अपराधी के नेपाल में छिपे होने की एक खुफिया जानकारी मिलती है और देश को बचाने के लिए वो अपनी एक अनोखी सेना लेकर इस तलाश पर निकल पड़ता है.

हालांकि इस कहानी में कई रोमांचक क्षण है और वो बेहतरीन बन सकते थे लेकिन निर्देशक राज कुमार गुप्ता ने अपनी कहानी को सच्चाई के बिल्कुल करीब रखने के लिए इस कहानी को थोड़ा दबा दिया. नतीजा ये कि फिल्म एक सीधी-सपाट और बिना किसी हाई वोल्टेज ड्रामा वाली कहानी बन कर रह जाती है. राज कुमार गुप्ता की पिछली फिल्म ‘रेड’, जोकि एक टैक्स छापे के बारे में थी, में कई ऐसे दृश्य और मोड़ थे जो आपको रोमांच की अनुभूति करवाते हैं लेकिन ‘इंडियाज़ मोस्ट वांटेड’ के साजिशों से भरे प्लॉट के बावजूद फिल्म प्रभावित नहीं कर पाती.

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नेपाल के लोकल लोगों का सतही चित्रण और छोटी छोटी चीज़ों पर ज़रुरत से ज्यादा ध्यान इस कहानी के धारादार प्लॉट को कुंद करता है. उदाहरण के लिए, फिल्म में एक महिला आईएसआई एजेंट को दिखाया गया है जो नेपाल में एक पूरा नेटवर्क चलाती है और फिल्म में बेहद अहम मोड़ पर नज़र आती है. इस किरदार का फिल्म की मूल कहानी से कोई बड़ा सरोकार नहीं रहा है. एक और उदाहरण है नेपाली पुलिस का इस सीक्रेट मिशन में शामिल होना, वो कब और कैसे इस कहानी का हिस्सा बनते हैं बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था. इस कहानी में पूरी गुंजाइश थी की दर्शकों के रोमांच को चरम तक पहुंचाया जा सके लेकिन लेखकों ने ऐसा नहीं किया और कहीं कहीं कहानी बोझिल होने लगती है.



अभिनय

टेरर के मास्टरमाइंड को जितना भयावह होना चाहिए था वो वैसा नहीं निकलता और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी लगातार मूर्खतापूर्ण गलतियां करती रहती है. हालांकि दुश्मन देश की एजेंसी की गलतियों को दिखाना दर्शकों का उत्साह जगाने का एक पुराना तरीका है लेकिन इस फिल्म में ये तरीका भी काम नहीं करता.

फिल्म के पक्ष में काम करती है इस फिल्म की लोकेशन यानि नेपाल और बिहार की पृष्ठभूमि जो हमारी फिल्मों में अक्सर दिखाई नहीं देती. फिल्म की सपोर्टिंग कास्ट भी गज़ब की है और कुछ अच्छे कलाकार सामने आते हैं. बीरगंज से काठमांडू के रास्ते की खूबसूरती या पटना का गोलघर पर्दे पर देखना एक रिफ्रेशिंग चेंज रहा वर्ना हम यूरोपीय लोकेशन को देख देख कर बोर हो गए थे. राजेश शर्मा (राजेश सिंह), गौरव मिश्रा और देवेंद्र मिश्रा का अभिनय प्रशंसनीय है. एक दृश्य में वो जब देश के लिए अपनी खुद की जमा पूंजी से पैसे निकालते हैं तो वो इन कलाकारों की अभिनय क्षमता सामने आती है.

अर्जुन कपूर

अर्जुन कपूर अपने किरदार को सरलता से निभाते हैं पर साधारण लेखनी के कारण उन्हें अलग पहलुओं को दर्शाने का मौका नहीं मिलता.. उनके किरदार के पास ‘हम उसे लेकर जाएंगे, चाहे नौकरी जाए या जान’ जैसी लाइनों के अलावा बहुत कुछ कहने के लिए था भी नहीं. उनके किरदार में न परतें हैं और न ही कोई रुख.

इस फिल्म की कहानी बहुत अच्छी है पर इसे ठीक तरीके से दिखाया नहीं जा सका है. इस तरह की फिल्मों से हाई वोल्टेज थ्रिल और ड्रामा एक्सपेक्ट किया जाता है जो हॉल में सीटियां बजवा सके लेकिन बिना इन सारी चीज़ों के बनी इस फिल्म को हॉल की बजाए घर पर ही देखा जा सकता है.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3.5/5
स्क्रिनप्ल :
2.5/5
डायरेक्शन :
3.5/5
संगीत :
2/5

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First published: May 24, 2019, 11:11 AM IST
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