'Roohi' FILM REVIEW: राजकुमार और वरुण शर्मा ने की दमदार एक्टिंग, जाह्नवी ने किया इम्प्रेस

फिल्म की शुरुआत में ही समझ आ जाता है कि फिल्म का हश्र क्या होने वाला है.

फिल्म की शुरुआत में ही समझ आ जाता है कि फिल्म का हश्र क्या होने वाला है.

फिल्म में मुख्य किरदार यानी हीरोइन (जाह्नवी कपूर- Janhvi Kapoor) के भी दो नाम हैं - रूही और उसमें आने वाली भूतनी यानी अफजा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 17, 2021, 11:15 PM IST
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फिल्म: रूही

डायरेक्टर: हार्दिक मेहता

ड्यूरेशन: 134 मिनिट

ओटीटी: नेटफ्लिक्स/ जिओ सिनेमा
जरा सोचिए, फिल्म का असली नाम था 'रूह-अफजा'. पहले तो ये सोचा था कि रूह- अफजा तो पहले से पॉपुलर नाम है, मगर फिर किसी ने कोर्ट केस होने की आशंका जताई होगी तो नाम रख दिया गया 'रूही (Roohi)'. फिल्म में मुख्य किरदार यानी हीरोइन (जाह्नवी कपूर- Janhvi Kapoor) के भी दो नाम हैं - रूही और उसमें आने वाली भूतनी यानी अफजा. जाहिर है हीरोइन के दो स्वरूप हैं तो उसके साथ हीरो भी दो होंगे- राजकुमार राव और वरुण शर्मा. रूही से प्यार करते हैं राजकुमार राव और अफजा के दीवाने हैं वरुण शर्मा. ये प्रेम त्रिकोण बीच में कहीं छूट जाता है और रूही अपनी जिंदगी, उस भूतनी अफजा के नाम कर के, उसी के साथ भाग जाती है.

फिल्म की शुरुआत में ही समझ आ जाता है कि फिल्म का हश्र क्या होने वाला है. एक विदेशी, जो हिंदी बोलता है और वो बागड़पुर नाम के किसी छोटे शहर में शादी के लिए लड़कियों की किडनैपिंग इंडस्ट्री शूट कर रहा होता है. राजकुमार और वरुण, वहां के एक लोकल गुंडे के गुर्गे होते हैं और लडकियां किडनैप करने का काम करते हैं. इसी चक्कर में रूही का किडनैप किया जाता है और उसे बंदी बना कर एक जगह रखा जाता है. यहां पता चलता है कि रूही के अंदर एक आत्मा आ गई है अफजा की. और यहां जन्म होता है लव ट्रायंगल का. राजकुमार चाहता है कि रूही वाला स्वरूप आये और अफजा भाग जाए, वहीं वरुण चाहता है कि सिर्फ अफजा ही रहे. रूही के सर से अफजा का साया हटाने के लिए एक तांत्रिक महिला, राजकुमार की शादी एक कुतिया से करवा देती है. इधर अफजा को एक साल के भीतर शादी करना जरूरी होता है तो वो राजकुमार और वरुण के बॉस के झांसे में आ कर शादी को तैयार हो जाती है. शादी में उसे कुत्ते की शादी वाली बात मालूम होती है. कन्फ्यूजन हो जाता है. रूही, शादी करना चाहती है और अफजा भी. रायता फैल जाता है. रूही, अफजा के साथ चली जाती है.

इतनी घालमेल कहानी के पैर, चुड़ैलों की तरह उलटे हैं और सर पूरी तरह कटा हुआ है. कभी कॉमेडी, कभी हॉरर, कभो आधुनिक, कभी दनियानूसी, कभी रीति रिवाज, कभी तंत्र-मन्त्र, कभी किडनैपिंग, कभी लव स्टोरी, कभी एक लड़की और भूतनी की प्रेम गाथा और कभी स्त्री-सशक्तिकरण का संदेश. एक भूत और सौ अफसाने मिलाकर कहानी लिखी गई और इसी चक्कर में किसी भी एक कहानी की लकीर पकड़ी नहीं जा सकी. लेखक मृगदीप सिंह लम्बा और गौतम अरोरा द्वारा कई सब-प्लॉट्स खड़े किये और अंत में उन्हें समेटने की कोशिश की. चूंकि एक भी प्लॉट ठीक से डेवलप नहीं हुआ था तो फिल्म चरमरा गयी. "स्त्री" फिल्म के प्रोड्यूसर दिनेश विजन ने संभवतः रूही उसी धुन में बना दी थी मगर रूही में वो मजा नहीं है. इसका कारण है फिल्म की कहानी और पटकथा. रूही में दोनों ही कमज़ोर हैं.



राजकुमार और वरुण पुराने खिलाड़ी हैं और दोनों ने बढ़िया काम किया है. उनकी दोस्ती के दृश्य भी जबरदस्त हैं. डरी-सहमी रूही और खूंखार-डरावनी अफजा के किरदार में जाह्नवी कपूर ने काफी इम्प्रेस किया. अगर वो सही फिल्मों का चयन करती रहेंगी और टिपिकल हिंदी फिल्म हीरोइन वाले ठप्पे से बचने को तैयार हैं तो उनका भविष्य उज्जवल है. ठुमका मारो प्रतियोगिता में उनकी रूह का अफजा निकल जाना तय है इसलिए उन्हें उस तरह के रोल्स से दूर रहना चाहिए. बाकी किरदार ठीक हैं, एकाध सीन में गुनिया भाई का किरदार निभाते मानव विज भी जम गए हैं.

अब बारी आती है फिल्म के निर्देशक हार्दिक मेहता की. हार्दिक, विक्रमादित्य मोटवाने स्कूल ऑफ फिल्म मेकिंग के छात्र रहे हैं. उनकी डाक्यूमेंट्री 'अमदावाद मा फेमस" को नेशनल फिल्म अवॉर्ड से नवाज़ा गया और कई इंटरनॅशनल फिल्म फेस्टिवल्स में भी उन्होंने अवॉर्ड्स जीते. रूही से पहले उन्होंने "कामयाब" नाम की बहुत-चर्चित फिल्म बनायीं थी जिसमें हिंदी फिल्मों के साइड एक्टर्स के जीवन की कड़वी सच्चाइयां बयान की गयी ही. रूही में उन्होंने अपना सब कुछ झोंका तो है मगर फिल्म की पटकथा, जिस्म छोड़ के भाग गयी. कुछ सीन्स में उनकी छाप नजर आती है मगर आत्मा नहीं हो तो फिल्म कैसे चलेगी. फिल्म पहले थिएटर में रिलीज की गयी और फिर नेटफ्लिक्स पर हाल ही में आयी है. हार्दिक के करियर के लिए ये अच्छा नहीं हुआ. सिनेमेटोग्राफी अमलेंदु चौधुरी की है और उनके अनुभव की वजह से फिल्म के विज़ुअल्स बहुत अच्छे नजर आते हैं. कैमरा डराता तो नहीं है मगर साथ में अचानक आ कर खड़ा हो जाता है इसलिए आप चौंक जाते हैं. पुराने मकान के दृश्य बहुत सुंदर लगे हैं.

फिल्म का संगीत उसकी पटकथा के जैसा है, एक भी गाना फिल्म की आत्मा से जुड़ा हुआ नहीं है और न ही सुनने वाले की आत्मा को छू पाता है. केतन सोढा का बैकग्राउंड म्यूजिक और सचिन जिगर का संगीत, फिल्म में कहीं ठीक से फिट नहीं होते हैं. फिल्म में एक गाना है "लेट द म्यूजिक प्ले" जो कि शामूर नाम के बैंड के गाने का ही रीमिक्स वर्शन है. शामूर का गाना 12 साल पहले रिलीज़ हुआ था और तब भी काफी हिट था. इस गाने में आवाज किस मेल सिंगर की है, ये एक रहस्य है जो गाने के साथ ही चला आ रहा है.

न फिल्म में कॉमेडी की खुशबू है और न हॉरर का डर. रूही की रूह उसकी कमज़ोर राइटिंग है. वैसे 1954 में पाकिस्तान में एक फिल्म रिलीज़ हुई थी 'रूही'. पाकिस्तान सेंसर बोर्ड द्वारा प्रतिबंधित की जाने वाली पहली फिल्म थी ये वाली 'रूही'. आर्थिक असमानताओं पर बनी इस फिल्म में अधेड़ उम्र की एक रईस औरत को एक नौजवान से प्यार हो जाता है. इतना कारण काफी था, पाकिस्तान में फिल्म को बैन करने के लिए. भारत में भी 1981 में 'रूही' नाम की फिल्म बनी थी जिसकी कहानी भी अतरंगी ही थी. उसने भी बॉक्स ऑफिस पर दम तोड़ दिया था. देखने वाले चाहें तो आधी फिल्म देख सकते हैं. इंटरवल से पहले वाला आधा हिस्सा या बाद वाला आधा हिस्सा, ये आप स्वयं तय कर लें.
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