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Review: जितनी बोर किताब थी, उतनी ही बोर है उस पर बनी वेब सीरीज 'The Great Indian Murder'

द ग्रेट इंडियन मर्डर
द ग्रेट इंडियन मर्डर
2/5
पर्दे पर:4 फरवरी 2022
डायरेक्टर : तिग्मांशु धुलिया
संगीत : रघु दीक्षित, केतन सोढा
कलाकार : प्रतीक गांधी, ऋचा चड्ढ़ा आशुतोष राणा, रघुवीर यादव, शारिब हाशमी और अन्य
शैली : क्राइम, थ्रिलर, मर्डर मिस्ट्री
यूजर रेटिंग :
0/5
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Review: जितनी बोर किताब थी, उतनी ही बोर है उस पर बनी वेब सीरीज 'The Great Indian Murder'

अभिनय में जतिन गोस्वामी ने विकी राय का किरदार निभाया है और बेहतरीन ढंग से निभाया है.

अभिनय में जतिन गोस्वामी ने विकी राय का किरदार निभाया है और बेहतरीन ढंग से निभाया है.

'The Great Indian Murder' Review: तिग्मांशु धुलिया एक अत्यंत ही प्रतिभाशाली निर्देशक हैं, उनकी उत्तर प्रदेश की राजनीति की ज़मीनी हक़ीक़त पर पकड़ है. शायद उन्होंने उपन्यास पढ़ा था तो उत्तर प्रदेश का है सोच कर हां कर दी लेकिन उपन्यास को बसा दिया गया छत्तीसगढ़ में. विकास स्वरुप के उपन्यास का फ़िल्मी रूपांतरण किया निर्देशक तिग्मांशु के साथ अत्यंत प्रतिभाशाली विजय मौर्या और पुनीत शर्मा ने. लिखते समय कलम न रुकने की वजह से जो किताब एक फिल्म में बदल सकती थी वो बन गयी एक पौने सात घंटे की वेब सीरीज. हर काम मंथर गति से होता है. हर किरदार को समझाने की कोशिश की गयी है. मर्डर मिस्ट्री में हमेशा खून का इलज़ाम जिन पर लगने की सम्भावना होती है वो पहले एपिसोड में ही दिख जाते हैं लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं होता यानी झेलो थोड़ी देर और.

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‘The Great Indian Murder’ Review: मिनिस्ट्री ऑफ़ एक्सटर्नल अफेयर्स के सेक्रेटरी पद पर कार्यरत विकास स्वरूप को जानने वाले आम लोगों की संख्या कम है. जैसे ही ये कहा जाए कि उनकी किताब ‘क्यू एंड ए’ पर डैनी बॉयल ने स्लमडॉग मिलियनेयर बनायी थी, जिसको ऑस्कर मिला था तो बहुत लोग जान पहचान जाते हैं. फिर आप इरफ़ान, देव पटेल और फ्रीडा पिंटो वाली स्लमडॉग याद दिलाओ तो और लोग जुड़ जाते हैं, और जैसे ही आप ये याद दिलाओ की ऑस्कर वाली फिल्म है जिसमें “जय हो” वाला गाना था और उसे भी ऑस्कर मिला था, तो फिल्म के जानकारों की संख्या करोड़ों में पहुंच जाती है. फिल्म की सफलता ही कुछ ऐसी थी कि अमेरिका में हर भारतीय अपने आप को स्लमडॉग मिलियनेयर के देश का वासी कहता है.

इन विकास स्वरूप जी ने अपने पहले उपन्यास की सफलता के बाद 2008 में दूसरा उपन्यास लिखा- सिक्स सस्पेक्ट्स. इस में कहानी उत्तर प्रदेश की राजनीति की थी, थोड़ा बहुत जेसिका लाल हत्याकांड का भी मसाला डाला गया था. जितना मजा “क्यू एंड ए” पढ़ने में आया था, वो मज़ा सिक्स सस्पेक्ट में नहीं आया, क्योंकि विकास की लेखनी तरक्की पर थी और उन्होंने कमर्शियल राइटिंग के फार्मूला से थोड़ी दूरी बना ली थी. अब जिस तरह किताब थोड़ी बोरिंग लगी थी, उस पर बनी वेब सीरीज “द ग्रेट इंडियन मर्डर” जो 4 फरवरी को डिज्नी+ हॉटस्टार पर रिलीज़ हुई है, वो बहुत ही ज़्यादा बोरिंग हो गई है.

तिग्मांशु धुलिया एक अत्यंत ही प्रतिभाशाली निर्देशक हैं, उनकी उत्तर प्रदेश की राजनीति की ज़मीनी हक़ीक़त पर पकड़ है. शायद उन्होंने उपन्यास पढ़ा था तो उत्तर प्रदेश का है सोच कर हां कर दी लेकिन उपन्यास को बसा दिया गया छत्तीसगढ़ में. विकास स्वरुप के उपन्यास का फ़िल्मी रूपांतरण किया निर्देशक तिग्मांशु के साथ अत्यंत प्रतिभाशाली विजय मौर्या और पुनीत शर्मा ने. लिखते समय कलम न रुकने की वजह से जो किताब एक फिल्म में बदल सकती थी वो बन गयी एक पौने सात घंटे की वेब सीरीज. हर काम मंथर गति से होता है. हर किरदार को समझाने की कोशिश की गयी है. मर्डर मिस्ट्री में हमेशा खून का इलज़ाम जिन पर लगने की सम्भावना होती है वो पहले एपिसोड में ही दिख जाते हैं लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं होता यानी झेलो थोड़ी देर और.

कई एपिसोड तक तो पुलिस की बुद्धि चलती हुई नहीं दिखाई गयी कि पार्टी में आने वालों की जांच करे, वहां जो वीडियो शूटिंग या फोटोग्राफी हो रही थी उसकी पड़ताल करे. इन्वेस्टीगेशन में सबसे पहले डेड बॉडी, फिर लोकेशन और फिर जो लोग वहां थे उनकी पूरी जानकारी हासिल की जाती है. पोस्ट मोर्टेम का तो कोई ज़िक्र ही नहीं है, बन्दूक के मेक का कोई ज़िक्र ही नहीं है, गोली कितनी दूर से मारी गयी इसका ज़िक्र नहीं है. जिस जगह से गोली मारी गयी थी वहां कौन कौन खड़ा था इसका भी ज़िक्र नहीं है. मर्डर इन्वेस्टीगेशन इतना लचर कब से हो गया?

जो सस्पेंस चौथे एपिसोड तक लगता रहता है वो जल्द ही ख़त्म हो जाता है. पहले के दो तीन एपिसोड में तो मर्डर करने वाले की हवा तक नहीं लगती. एक सीन इतना महत्वपूर्ण था और इतने सस्ते में निकाल दिया गया, वो था प्रतीक गांधी का पार्टी के कचरे तक पहुंचना और वहां से एक चली हुई गोली का कारतूस बरामद करना. वो इतनी आसानी से ये सोचता और करता है तो लगता है कि दर्शकों को कितना बेवकूफ समझा जाएगा. जिन लोगों ने किताब पढ़ी है वो भी आधी किताब पढ़ने तक बोर हो गए थे. वेब सीरीज में एडिटिंग का काम करने का पूरा स्कोप था, लिखने की टेबल पर भी और एडिटिंग की टेबल पर भी. एक बड़ा कन्फ्यूजन ये भी बना रहा कि ये पुलिस इन्वेस्टीगेशन की कहानी बनेगी या षड्यंत्र की गिरहें खोलने की. वैसे लेखक मण्डली ने कई छोटी छोटी बातों पर ध्यान दिया है जो कि कहानी के लिए उतनी आवश्यक नहीं थी लेकिन लेखकों की पैनी नज़र का काम था. विनीत कुमार से प्रतीक गांधी की पहली मुलाक़ात का सीन उसकी सही बानगी है या फिर प्रतीक और ऋचा की कैंटीन की मुलाक़ात का सीन.

अभिनय में जतिन गोस्वामी ने विकी राय का किरदार निभाया है और बेहतरीन ढंग से निभाया है. भविष्य उज्जवल है. उनके हर सीन के बाद उनसे थोड़ी और घृणा होती है. प्रतीक गांधी टाइपकास्ट होने की राह पर चल पड़े हैं. उन्हें या तो घाघ शख्स वाले किरदार निभाने से दूरी रखनी होगी या फिर रहस्यमयी मुस्कान से मुक्ति पानी होगी. ऋचा चड्ढा का किरदार व्यर्थ है. एक महिला पुलिसवाली का होना भी अनावश्यक लगता है. कोई और भी ये किरदार कर लेता और ऋचा ने किरदार में कोई नयापन नहीं डाला है. आशुतोष राणा की मौन मुस्कान की मार घातक है. वो एक अच्छे रोल में हैं. उनका सेक्रेटरी जब उन्हें फ़ोन देता है और कहता है कि सीबीआई से सूरज यादव है तो वो फ़ोन पर एक अत्यंत ही लापरवाह ढंग से कहते हैं “बोलो”. एक प्रदेश के गृहमंत्री और कई वर्षों के राजनीतिज्ञ कभी सीबीआई से डरते नहीं हैं और आशुतोष राणा सिर्फ बोलो कह कर ये साबित कर देते हैं.

रघुवीर यादव ने ओवरएक्टिंग करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है और हिमांशी चौधरी के साथ रोमांस लड़ाते बेहद ही विचित्र लगते हैं. हिमांशी टाइपकास्ट लगने लगी हैं. शारिब हाशमी की डायलॉग डिलीवरी एक जैसी ही होती है बस रोल अलग अलग होते हैं. इसमें उनका किरदार कभी ठीक से उगता ही नहीं है. बाकी दो तीन दर्ज़न किरदार आते जाते रहते हैं. राजनीति की शतरंज पर बस दो ही लोग मोहरे चलते हैं एक आशुतोष राणा और और दूसरे उनके साथी विनीत कुमार ने, बाकी लोग घास छीलते रहते हैं. पाओली डाम का किरदार एंट्री तो बढ़िया लेता है, मर्डर की पार्टी में आता है, लेकिन फिर लापता हो जाता है. हंसी के लिए एक अमेरिकन किरदार लैरी पेज भी है, वो कहानी में क्या करेगा ये पता नहीं। रुचा इनामदार भी आती हैं, इन पर भी मर्डर करने का संशय लाया जा सकता था लेकिन बीच कहानी में किरदार की हवा निकल गयी. शशांक अरोरा, दीपराज राणा और एकेटी की भूमिका में मणि को देख कर कोई भी कह सकता है कि ये कभी भी मर्डर नहीं करेंगे फिर भी कहानी में कई बार चले आते हैं.

इस वेब सीरीज को एक बेहतरीन एडिटर बचा लेता, लेकिन अफ़सोस प्रथमेश चांदे और उन्नीकृष्णन परमेस्वरन शायद तिग्मांशु के साथ काम करने का मोहसंवरण नहीं कर पाए और लम्बे-लम्बे किरदार चलने दिए गए. ऋषि पंजाबी की सिनेमेटोग्राफी भी ठीक ही है. कुछ सीन्स में बहुत अंधेरा है. मर्डर का सीन मार्के का बन सकता था लेकिन वो पहले एपिसोड के आखिरी 10 सेकंड में निपटा दिया गया और फिर सीधे आखिरी एपिसोड 10 सेकंड में नज़र आया. कहानी में ट्विस्ट डालने की कई बार कोशिश की गयी लेकिन अगले ही सीन में उसका खुलासा कर दिया गया.

इस वेब सीरीज को अजय देवगन ने प्रोड्यूस किया है और साथ हैं इम्पा के पूर्व प्रेजिडेंट विनय सिन्हा की बेटी प्रीति सिन्हा. जल्द ही इस वेब सीरीज को करोड़ों दर्शकों ने देखा जैसे आंकड़ें आने लगेंगे और सबको लगेगा की सीरीज हिट है लेकिन इतनी गड्डमड्ड कहानी और बेस्वादी च्युइंग गम जैसे एपिसोड के बाद इस वेब सीरीज को पूरा देखने वाले को पुरस्कार देना चाहिए, खास तौर से उन्हें जिन्होंने किताब भी पढ़ रखी है. सिक्स सस्पेक्ट में से बन्दूक बरामद होती है सिर्फ दो के पास, तीसरे की बन्दूक वहीं गिर जाती है. अंत में गोली जिसने मारी थी, वो उस पार्टी में आया कैसे बिना इनविटेशन इसके रहस्य पर पर्दा उठाना ज़रूरी नहीं समझा जाता. आप इसी से इस वेब सीरीज को समझ लीजिये.

खैर, समय बर्बाद न करिये. इस सीरीज में कुछ भी ग्रेट नहीं है. आप पक अलग जायेंगे इसकी रफ़्तार से. समय बचाइए.

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी:
2.5/5
स्क्रिनप्ल:
2/5
डायरेक्शन:
2.5/5
संगीत:
2/5

Tags: Review, Web Series

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