'Roberrt' Film Review: कहानियों का अकाल आता है तो 'रॉबर्ट' जैसी फिल्में बनती हैं

बॉक्स ऑफिस की सफलता को यदि पैमाना माना जाए तो फिल्मों में कोई नई कहानी आने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.

बॉक्स ऑफिस की सफलता को यदि पैमाना माना जाए तो फिल्मों में कोई नई कहानी आने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है.

फिल्म का हीरो शुरू में एक बड़ा गैंगस्टर या गुंडा दिखाया जाता है, लेकिन वो सिर्फ अन्याय के खिलाफ लड़ता है और गलत बातों का विरोध भी करता है.

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फिल्मः रॉबर्ट

भाषाः कन्नड़

ड्यूरेशनः 166 मिनट्स

ओटीटीः अमेजन प्राइम वीडियो
बॉक्स ऑफिस की सफलता को यदि पैमाना माना जाए तो फिल्मों में कोई नई कहानी आने की गुंजाइश बहुत कम रह जाती है. फिल्म का हीरो शुरू में एक बड़ा गैंगस्टर या गुंडा दिखाया जाता है, लेकिन वो सिर्फ अन्याय के खिलाफ लड़ता है और गलत बातों का विरोध भी करता है. परिस्थितियां कुछ ऐसी हो जाती हैं कि उसे अपने शहर से गायब होना पड़ता है और अज्ञातवास काटना पड़ता है. फिर अचानक उसका भूतकाल उसके वर्तमान में घुस जाता है और उसका भविष्य खराब करने लगता है. ऐसे में हीरो, अपने ओरिजिनल अवतार में आकर गुंडों का सफाया कर देता है और फिर अपनी जिंदगी शांति से बसर करने लगता है. महाभारत में अज्ञातवास का जिक्र आया था तब से हिंदी फिल्म की कहानियों में ये अज्ञातवास चला आता है. पांडवों में भीम को रसोई में खानसामे का काम करना पड़ता है और कन्नड़ फिल्म 'रॉबर्ट' में सुपरस्टार दर्शन को भी अपना रॉबर्ट वाला गुंडा स्वरूप छोड़कर खानसामे राघवन का किरदार निभाना पड़ता है.

रॉबर्ट, एक एक्शन थ्रिलर फिल्म के तौर पर प्रचारित की गयी थी जबकि एक आम मसाला फिल्म की तरह इसमें हीरो को सभी 36 कलाएं आती हैं और वो शोकेस करने का भरसक प्रयास किया गया है. फिल्म की कहानी में समझने जैसा कुछ नहीं है और न ही इसका स्क्रीनप्ले या पटकथा कुछ ऐसी है कि आपको किसी तरह की नवीनता का एहसास हो. फिल्म के हीरो हैं दर्शन, जो भीम की तरह बलशाली हैं और अर्जुन के वृहन्नला स्वरुप के तरह नृत्य में पारंगत हैं. युधिष्ठिर की तरह सच का साथ देते हैं और युद्ध करना नहीं चाहते हैं.

फिल्म की कहानी में ढेरों झोल हैं. हीरो एक स्टाइलिश गैंगस्टर से एकदम सीधा साधा रसोइया बन जाता है. हीरोइन जो विदेश से आती है, विदेशी अंदाज़ के कपडे और मेकअप कर के घूमती रहती है, मैनेजमेंट के नए तरीके सिखाती रहती है, हीरो के देसी तरीकों पर मोहित हो कर साडी पहनने लगती है. रॉबर्ट का बेटा पूरी फिल्म में नहीं पूछता कि उसकी मां कहां हैं. रॉबर्ट एक क्रिस्चियन नाम है मगर जब वो राघवन हो जाता है तो रामलीला में बजरंग बली बन जाता है. रवि किशन का रोल फिल्म में क्यों था, ये समझ नहीं आता है. ऐसी कई बातें हैं जो फिल्म में खटकती हैं.



दर्शन पॉप्युलर अभिनेता हैं, उनकी गलतियां अक्सर माफ़ हो जाती हैं. फिल्म उन्हीं पर केंद्रित है. कई जगह उन्होंने अच्छा काम किया है. एक्शन में वो स्वाभाविक नज़र आते हैं. भावुक दृश्यों में उनका पहाड़ जैसा शरीर धोखा दे देता है. हीरोइन आशा भट हैं जो इस से पहले एक हिंदी फिल्म "जंगली" में विद्युत् जामवाल के साथ नज़र आयी थी. ये उनकी पहली कन्नड़ फिल्म हैं. काम थोड़ा है, नाच गाने के लिए रखा गया था वो उन्होंने ठीक से निभाया है. हीरो के दोस्त के तौर पर विनोद प्रभाकर ने अच्छा काम किया है. बाकी कलाकार अपनी जगह ठीक ठीक ही हैं. किसी की भूमिका और अभिनय उभर कर नहीं आता. एक गे किरदार फिल्म में डाला गया है. वजह समझ नहीं आती.

निर्देशक तरुण सुधीर से बहुत उम्मीदें थी. ये उनकी दूसरी फिल्म है. उनकी पहली फिल्म "चौका" अलग अलग समय घट रही 4 कहानियों का समागम थी और अपने आप में निर्देशन का लाजवाब नमूना था. उस फिल्म को बहुत सराहा गया और इस वजह से उम्मीद थी की "रॉबर्ट" भी ऐसी ही फिल्म होगी मगर ये एकदम मसाला फिल्म की तरह नज़र आयी. कहानी भी तरुण ने खुद ही लिखी है इसलिए कहानी बहुत लम्बी हो गयी है. कम से कम 3 0 मिनिट की फिल्म काटी जा सकती थी.

संगीत अर्जुन जन्या का है जो कि पहले भी दर्शन की कुछ फिल्मों में सफलतापूर्वक संगीत दे चुके हैं. फिल्म में जय श्री राम नाम का एक गाना है जो राम लीला के दौरान आता है. फिल्म में गाने की प्लेसमेंट विचित्र थी. बाकी गाने रोमांटिक हैं, एक डांस नंबर है और एक थीम सॉन्ग भी है. डांस नंबर "बेबी डांस फ्लोर रेडी" हिंदी फिल्म संगीत सुनने वालों को अजीब लग सकता है मगर अच्छा बनाया है. अंग्रेजी फिल्म मैड मैक्स की तर्ज़ पर गाना फिल्माया गया था. एक गाने में दर्शन बंदूकों के सिंहासन पर नज़र आते हैं जो कि अंग्रेजी सीरियल 'गेम ऑफ़ थ्रोन्स" से चुराया गया है.

रॉबर्ट की कमज़ोरी है, कहानी का फैले जाना और एडिटर द्वारा कहानी को समेटने का कोई प्रयास न करना. हर किरदार को समझाने का प्रयास करने के चक्कर में फिल्म की लम्बाई बढ़ती ही चली गयी. फ्लैशबैक सीन्स भी ज़रुरत से ज़्यादा लम्बे थे. उन्हें छोटा किया जा सकता था. रवि किशन वाला एक्शन सीक्वेंस छोटा हो सकता था. जादुई किस्म की फाइट का अंदाज़ फिल्म के मिज़ाज से मेल नहीं खा रहा था मगर दर्शन के फैंस को शायद मज़ा आया होगा. कन्नड़ फिल्म देखने का मन हो तो देख सकते हैं. कमर्शियल फिल्म है, आर्ट भी कमर्शियल ही है. इसमें कहानी में गंभीरता और शुद्धता ढूंढने का प्रयास न करें, दुखी हो जायेंगे. टाइम पास करने का इरादा हो तो बीच बीच में फ़ास्ट फॉरवर्ड कर के देख सकते हैं.

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