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मूवी रिव्यू: ‘रॉक ऑन’ नहीं ‘रॉक ऑफ’ है ये फिल्म

मूवी रिव्यू: ‘रॉक ऑन’ नहीं ‘रॉक ऑफ’ है ये फिल्म

photo Getty Images

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अभिषेक कपूर के डायरेक्शन में करीब आठ साल पहले आई ‘रॉक ऑन’ की सबसे बड़ी खासियत उसके म्यूजिक के अलावा उसके किरदारों के आपसी इमोशनल रिश्ते थे।

    नई दिल्ली। देखो यार सीधी बात है किसी फिल्म का सीक्वल तब बनाओ जब आपके पास पहले पार्ट से बेहतर न सही, तो उसके बराबर वजन वाली कहानी हो। इससे कम कुछ भी लाओगे गुरु, तो उसे किनारे कर दिया जाएगा, याद रखो..!

    अभिषेक कपूर के डायरेक्शन में करीब आठ साल पहले आई ‘रॉक ऑन’ की सबसे बड़ी खासियत उसके म्यूजिक के अलावा उसके किरदारों के आपसी इमोशनल रिश्ते थे। दर्शकों को उस फिल्म में कुछ नया, कुछ अपना, कुछ दिलकश लगा था और इसी वजह से वह लोगों के दिलों में जगह बना पाई थी। मगर अफसोस ‘रॉक ऑन 2’ अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद उस गहराई तक नहीं उतर पाई है जहां इसे तारीफों के मोती मिल सकते।

    ‘मैजिक’ बैंड के आदि, के.डी., जो वगैरह अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं। आदि एक हादसे के बाद मेघालय के किसी गांव में रह कर खेती करता है। मेघालय ही क्यों, महाराष्ट्र का कोई गांव क्यों नहीं? अच्छा मेघालय पर्यटन के साथ गठबंधन जो हुआ है आपका। पर यह क्या, आपने तो मेघालय की सरकार को ही बेईमान बता दिया। खैर, एक और हादसा इन सबको फिर से करीब लाता है और ये अपने दो नए साथियों के साथ अपने पहले प्यार यानी म्यूजिक से फिर जुड़ जाते हैं।
    अभिषेक और पुबाली चैधरी की कहानी में कोई नयापन नहीं है। किसी का रूठ कर अपने काम से परे चले जाने और फिर लौट आने का प्लॉट बुरा नहीं है, लेकिन ऐसी कहानी जबर्दस्त शॉक मांगती है। आदि जिस वजह से सब छोड़कर चला जाता है वह बड़ी लगने के बावजूद झटका नहीं दे पाती। फिर उसके वापस आने का बहाना भी जबरन ठूंसा गया-सा लगता है।

    rock

    दरअसल मेघालय वाला पूरा हिस्सा ही इस कहानी में मिसफिट लगता है। फिर जिस तरह से उदय और जिया के दो नए किरदार गढ़े गए हैं वे भी सहज नहीं लगते। पटकथा को अपने मुताबिक तोड़ने-मरोड़ने की लेखकों की साजिश जल्द समझ में आ जाती है और ऊपर से बार-बार धीमी पड़ती फिल्म की रफ्तार इसे कई जगह बेहद बोर बना देती है। शुजात सौदागर के निर्देशन में कसावट और कल्पनाशीलता का कच्चापन झलकता है।

    फरहान अख्तर, अर्जुन रामपाल, प्राची देसाई वगैरह बेहद साधारण रहे हैं। पूरब कोहली जरूर उभर कर दिखते हैं। श्रद्धा कपूर, कुमुद मिश्रा, शशांक अरोड़ा जैसे कलाकारों को कायदे के किरदार ही नहीं मिल सके और फिल्म इन्हें ज़ाया करती दिखती है। साथ ही इस फिल्म की सबसे बड़ी कमी है इसका साधारण म्यूजिक। एक-दो को छोड़ कहीं भी यह दिल में नहीं उतर पाता। मेघालय के चंद बेहद खूबसूरत दृश्यों के अलावा दिल में उतर पाने में तो यह पूरी फिल्म ही नाकाम रही है। ठीक 1000 रुपए के उस नोट की तरह, जो वजनदार तो है, लेकिन अब यह किसी को प्यारा नहीं रहा।

    रेटिंग-दो स्टार



    (वरिष्ठ फिल्म समीक्षक व पत्रकार दीपक दुआ 1993 से फिल्म-पत्रकारिता में सक्रिय हैं। मिजाज से घुमक्कड़। सिनेमा विषयक लेख, साक्षात्कार, समीक्षाएं व रिपोर्ताज लिखने वाले दीपक कई समाचार पत्रों, पत्रिकाओं के लिए नियमित लिखते हैं और रेडियो व टीवी से भी जुड़े हुए हैं।)

    Tags: Farhan akhtar, Film review

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