Saina Review: एक और स्पोर्ट्स बायोपिक है 'साइना'

फिल्म 'साइना' अमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है. फाइल फोटो

फिल्म 'साइना' अमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हो चुकी है. फाइल फोटो

Saina Review: घर पर घरवालों के साथ एक अच्छी फिल्म के तौर पर, एक यूथ आइकॉन बनने की कच्ची-पक्की कहानी के तौर पर और अपने बच्चों को स्पोर्ट्स के प्रति प्रेम जगाने के उद्देश्य से यह फिल्म देखी जा सकती है.

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Saina Review: किसी जीते जागते शख्स पर बायोपिक बनाना खतरे से खाली नहीं होता. ऐसे कई लोग होते हैं जिन्होंने उस शख्सियत को करीब से देखा और समझा होता है. इन लोगों को एक छोटीसी भी गलती बर्दाश्त नहीं होती. खिलाडियों की ज़िन्दगी पर फिल्में बनाने के कड़ी में बैडमिंटन प्लेयर साइना नेहवाल के जीवन पर परिणीति चोपड़ा द्वारा अभिनीत और अमोल गुप्ते द्वारा निर्देशित फिल्म साइना, हाल ही में अमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ की गयी. इसके पहले कुछ समय के लिए ये फिल्म थिएटर्स में भी लगी थी. कोरोना की वजह से सिनेमा हॉल में देखने वाले कम थे.

सचिन तेंदुलकर के बाद साइना नेहवाल भारत की ऐसी एथलीट हैं जिन्होंने बच्चों को स्पोर्ट्स में करियर बनाने के लिए प्रेरित किया. साइना रोल मॉडल बनीं, यूथ आइकॉन बनीं और चैंपियन तो वो बनी ही. साइना की फैन फॉलोइंग अभी भी ज़बरदस्त है. जैसा हर सफल खिलाड़ी की जीवनी में होता है, माता-पिता और परिजनों का साथ और त्याग, कड़ी मेहनत, ब्रम्ह मुहूर्त से कहीं पहले उठ कर योग्यता निर्माण के तप में कर्मों की आहुति और गुरुजनों का आशीर्वाद. ये सब है फिल्म साइना में.

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जाट परिवार में एक जुझारू और लड़ाकू जीवट वाली मां और एक कर्मठ पिता की पुत्री साइना का बैडमिंटन से प्रेम, उसकी मां की वजह से हुआ. ज़िन्दगी ने जो भी शॉट उसकी तरफ खेला, साइना की मां ने साइना को वो शॉट कैसे खेलना है सिखा दिया. उसके पिता का उसे सुबह 3 बजे उठा कर स्कूटर से 25 किलोमीटर दूर बैडमिंटन सिखाने ले जाना, उसकी बहन का चुपचाप सैक्रिफाइस करते रहना, सिर्फ कुछ खास मित्रों के साथ साइना का मुस्कुराना और हंसना, पुलेला गोपीचंद जैसे फोकस वाले कोच के साथ बिना हार माने, लगातार डांट खाते हुए भी प्रैक्टिस करना और तरह तरह के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय खिलाडियों को धमाके से हराना और फिर एक दिन शिखर से नीचे गिरना, गिर के संभालना और फिर से शिखर पर चढ़ जाना...साइना की बायोपिक में है.
और सबसे बड़ी बात, सिर्फ यही है जो इस बायोपिक में है. साइना की ज़िन्दगी में जितना ड्रामा हो सकता था, वो सब इस फिल्म में डाला गया है. न कोई किस्सा बनाया गया न कोई किस्सा गढ़ा गया और न ही कोई कहानी रची गयी. साइना के क्रॉस कोर्ट स्मैश की तरह. तेज, ताकतवर और प्रभावी. इस बायोपिक में जो नहीं हुआ वो है मुख्य किरदार से एक भावनात्मक सम्बन्ध नहीं बन पाना. फिल्म अच्छी है. युवाओं को पसंद आएगी, छोटे बच्चों को खेल के करियर के प्रति जागरूक करने के लिए सही है. फिल्म में साइना का संघर्ष नज़र तो आया मगर महसूस नहीं हुआ. दर्शकों का गला नहीं रूंधा. उसकी जीत अपनी जीत लगी मगर कम, उसकी हार तो सिर्फ उसी की हो कर रह गयी. पुलेला गोपीचंद की भूमिका में मानव कौल (राजन सर) से नफरत भी नहीं हुई और पारुपल्ली कश्यप के रोल में एहसान नकवी से मोहब्बत नहीं हो पायी. ये इस फिल्म का वीक पॉइंट है.

बायोपिक हमेशा एक ड्रामेटिक स्टोरी पकड़ते हैं, इसमें मुख्य किरदार से या तो प्यार हो जाता है या घनघोर नफरत. साइना से दोनों ही नहीं हो पाए. कहानी निर्देशक अमोल गुप्ते ने खुद लिखी है और डायलॉग अमितोष नागपाल के हैं. फिल्मों में, खासकर बायोपिक्स में कैथार्सिस, नोस्टैल्जिया, यादें, संघर्षों को जीतने की, कठिन परिस्थितयों से जूझ कर विजेता बनने की कहानी होती है. साइना में जो कुछ भी जितना भी है, उस से दर्शकों को इमोशनल कनेक्शन फील नहीं हुआ.

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परिणीति ने ये रोल स्वीकार किया था जब श्रद्धा कपूर ने ये फिल्म करने में असमर्थता जताई थी. परिणीति का अभिनय अच्छा है. अक्खड़ अंदाज़ में भोली सी लड़की का किरदार परिणीति ने बखूबी निभाया है. मां के किरदार में मेघना मलिक ने काफी ओवर एक्टिंग की है मगर साइना की माताजी की कोई पब्लिक अपीयरेंस देखने में नहीं आयी है इसलिए संभवतः ये ड्रामा भरा किरदार जरूरी था. पिता के रोल में शुभ्रज्योति भारत और कोच नं. 2 के रूप में अंकुर विकल ने अच्छा काम किया है. फिल्म में काबिल-ए-तारीफ काम किया है नायशा कौर भटोये ने, जो बनी हैं नन्ही साइना. नायशा खुद नेशनल लेवल बैडमिंटन प्लेयर हैं और उन्हें श्रद्धा कपूर ने खोज के निकाला था. अभिनय में उनका कोई भविष्य नहीं है मगर इस रोल के लिए इस से बढ़िया कोई और आर्टिस्ट मिल भी नहीं सकता था. मानव कौल हमेशा की तरह एक बार फिर इम्प्रेस कर गए.

फिल्म की कहानी से ज़्यादा फिल्म का प्रोडक्शन भारी था. श्रद्धा कपूर ने फिल्म साइन करने के बाद काफी मेहनत की थी और बैडमिंटन के गुर सीख कर साइना का अंदाज़ भी सीखना शुरू कर दिया था. एकदिन अचानक उन्होंने फिल्म छोड़ दी, अपनी तबियत का हवाला दे कर. वहीं प्रोड्यूसर्स ने बयान दिया कि श्रद्धा इस बायोपिक को प्रमुखता नहीं दे रही हैं, इसलिए परिणीति को लिया जा रहा है. परिणीति ने भी बैडमिंटन सीखने में और साइना जैसा रैकेट पकड़ना/ उनके खड़े रहने का अंदाज़...सब कुछ कॉपी किया. लेकिन कहानी अगर प्रेडिक्टेबल है तो आप कुछ भी करें, कोई फर्क नहीं पड़ेगा.

फिल्म बनने में 5 साल लग गए. हो सकता है इस वजह से, कहानी पर काम करते करते निर्देशक भी थक गए और उन्होंने फिल्म बना ली. निर्देशन में कोई नवीनता नहीं है. तारे ज़मीन पर और स्टैनले का डब्बा जैसी फिल्मों के बाद, अमोल की साइना निराश करती है. फिल्म में "खिलाड़ी की सफलता में पूरे परिवार का योगदान होता है" जैसा एक सोशल मैसेज भी डाला गया जो फिल्म की कहानी में कोई प्रभावी योगदान करता नज़र नहीं आता. साइना की मां का पहले कैंप में एडमिशन के लिए लड़ना और फिर साइना के पिता का पीएफ से लोन लेकर बिटिया के महंगी लिए शटलकॉर्क खरीदना, बस ये दो घटनाओं के अलावा कोई बात ज़ाहिर नहीं की गयी.

फिल्म का संगीत कहानी में फिट है मगर कोई गाना हिट हो जाये ऐसा कहना मुश्किल है. अरमान मलिक ने संगीत की बागडोर संभाली है, और "चल वहीं चलें" और "परिंदा" सुनने -समझने में अच्छे लगते हैं. दोनों गाने मनोज मुन्तशिर ने लिखे हैं.

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फिल्म प्रेडिक्टेबल है. फिल्म में कुछ नया नहीं है. फिर भी परिणीति की ज़िन्दगी के बेहतर परफॉर्मन्सेस में से एक मानी जायेगी. चक दे इंडिया, भाग मिल्खा भाग, पान सिंह तोमर, या मैरी कॉम जैसा कोई भावनात्मक ड्रामा इस फिल्म में नहीं है. ये फिल्म की छाप छोड़ने की क्षमता कम कर देता है. कहानी में कनफ्लिक्ट का अभाव बहुत खलता है. साइना और कश्यप की लव स्टोरी दिखाई जा सकती थी और कश्यप खुद एक चैंपियन प्लेयर हैं तो उनका रोल थोड़ा बढ़ा सकते थे. चोट लगने के बाद साइना की रिकवरी प्रोसेस भी बड़ी जल्दी जल्दी दिखाई गयी है.

घर पर घरवालों के साथ एक अच्छी फिल्म के तौर पर, एक यूथ आइकॉन बनने की कच्ची-पक्की कहानी के तौर पर और अपने बच्चों को स्पोर्ट्स के प्रति प्रेम जगाने के उद्देश्य से यह फिल्म देखी जा सकती है.
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