सोनचिड़िया
3.5/5
पर्दे पर : 1-मार्च-2019
डायरेक्टर : अभिषेक चौबे
संगीत : विशाल भारद्वाज
कलाकार : सुशांत सिंह राजपूत, मनोज बाजपेयी, भूमि पेडनेकर
शैली : एक्शन
यूजर रेटिंग :
0/5
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Sonchiriya Review : मनोज बाजपेयी और सुशांत सिंह राजपूत ने दिखाया है बेहतरीन कहानी में देसी एक्शन का दम!

अभिषेक चौबे कुछ समय बाद सोनचिड़िया के साथ लौटे हैं और इस विषय पर उनसे बेहतर फिल्म बॉलीवुड में कोई और नहीं बना सकता था।

रोहित वत्स | News18Hindi
Updated: May 11, 2019, 11:56 AM IST
Sonchiriya Review : मनोज बाजपेयी और सुशांत सिंह राजपूत ने दिखाया है बेहतरीन कहानी में देसी एक्शन का दम!
143 मिनट की इस फिल्म में बहुत कम चीज़े ऐसी हैं जो आपको पसंद नहीं आएंगी.
रोहित वत्स | News18Hindi
Updated: May 11, 2019, 11:56 AM IST
अपनी जानी पहचानी धुन के बाद जब राष्ट्रीय रेडियो चैनल पर देश में आपातकाल की घोषणा होती है, डाकूओं का एक समूह चंबल के बीहड़ में मौजूद एक गाँव में प्रवेश करते हैं. गिरोह का मुखिया सभी को चेतावनी देता है कि अगर उन्होंने बगावत करने की कोशिश की तो नतीजा अच्छा नहीं होगा. पर ये बात बोलते समय उसे ये नहीं पता था कि उड़ती गोलियों से कहीं ज्यादा खतरनाक उसका अतीत साबित होगा.

सोनचिड़िया कहानी है चंबल घाटी के घुमावदार रास्तों पर राज करते डाकू मान सिंह उर्फ दद्दा (मनोज बाजपेयी) के गिरोह की. यहां पानी इतना साफ है कि नदी का तल दिखता है और हवा इतनी ताज़ी की आपकी सभी इच्छाएं एक कोने में बैठ कर आप इस नज़ारे में खो जाएं. पर इन दोनों के बीच मौजूद ज़िंदगी इतनी मुश्किल  और खतरनाक है कि पल पल आपकी परीक्षा होती है.



इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आप एक डाकू हैं या एक किसान ये सबकुछ खत्म बंदूक की नली के साथ ही होता है. अभिषेक की इस फिल्म में आपको जो देखने को मिलेगा वो आपकी कल्पनाओं से परे है. इस फिल्म में किसी भी एक्शन फिल्म से ज्यादा एक्शन है और फिल्म बात करती है आरक्षण की. जातियां, उप जातियां और उनसे जुड़ा अजीबोगरीब मान सम्मान. डाकू मान सिंह होना या फुलिया (फूलन देवी) होना आपका चुनाव नहीं, ज़िंदा रहने की शर्त बन जाता है.

फिल्म के लीड सुशांत सिंह राजपूत, लखन के किरदार को निभाते हैं और वो मान सिंह का साथ देते हैं. किरदार सरेंडर करने और नहीं करने के बीच उलझता है और प्रेम कहानी लगने वाली लखन और इंदुमती (भूमि पेडनेकर) की कहानी प्रेम कहानी होने से कोसों दूर है.

निर्देशक अभिषेक चौबे हमें आसानी से डाकुओं या डाकुओं की जुबां में बागियों की ज़िंदगी में ले जाते हैं. वो अपनी परेशानियों के बारे में खुल कर बात करते हैं लेकिन वो इससे बेहतर कुछ जानते भी नहीं हैं. एक क्रूर, बदले से भरी दुनिया जहां सबकुछ पर्सनल होकर भी पर्सनल नहीं है.

अभिषेक हमें एक ऐसा दुनिया में ले जाते हैं जहां भावनाओं के अतिरेक में इंसान गाली दे देता है. पितृसत्ता और सामाजिक बराबरी की अवहेलना करता एक समाज जो अपनी जाति के मान के लिए जान दे सकता है और ले भी सकता है. एक ऐसी दुनिया जहां हालात से निकलना असंभव लगता है और इंसान को सिर्फ किस्मत का ही सहारा रह जाता है.

रणवीर शौरी और सुशांत सिंह राजपूत ने इस फिल्म में अपने अभिनय कौशल से प्रभावित किया है. सुशांत सिंह राजपूत इस फिल्म में शांत रहे हैं, वो आम हिन्दी फिल्मों के हीरो की तरह भारी भरकम डॉयलॉग बोलते नज़र नहीं आते. वो रणवीर शौरी और मनोज बाजपेयी जैसे कलाकारों के सामने हल्के भी नहीं पड़ते और ये दिखाता है कि फिल्म में जान है.
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इस फिल्म में कोई विलेन नहीं है लेकिन ऐसे किरदार हैं जो अपने आप में ग़लत हैं. ऐसा ही एक किरदार है आशुतोष राणा का, एक पुलिसवाले के किरदार में वो वास्तविकता के बेहद करीब हैं. वो फिल्म में जब आते हैं अपने हिसाब से सीन के मूड को बदल लेते हैं. वो खतरनाक और खूंखार दिखने वाले किरदारों के मास्टर बन चुके हैं लेकिन इस बार वो अपनी छवि से और बेहतर लगते हैं.

रणवीर शौरी को और स्क्रीन टाइम दिया जा सकता था लेकिन जितना समय उनको दिया गया वो अपना काम बखूबी कर गए. पेडनेकर इस फिल्म की मुख्य किरदार हैं तो भले ही इस फिल्म में आधा दर्जन बड़े नाम हैं, आप उनके किरदार को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाएंगे.

सोनचिड़िया अपने सारे खून खराबे के बाद भी एक बेहतरीन फिल्म है जो अपने मैसेज को रखने में कामयाब होती है. लेकिन मेरे लिए फिल्म का हाई प्वाइंट कुछ और रहा. मुझे लगता है कि ये फिल्म साबित करती है कि अभिषेक चौबे को बागियों की ज़िंदगी पर पकड़ है और वो इस जॉनर के सबसे अच्छे निर्देशक हैं. 143 मिनट की ये फिल्म सोनचिड़िया आपको निराश नहीं करेगी.

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डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3/5
स्क्रिनप्ल :
4/5
डायरेक्शन :
4/5
संगीत :
3/5
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