सूरमा
4/5
पर्दे पर : 13 जुलाई 2018
डायरेक्टर : शाद अली
संगीत : शंकर-एहसान-लॉय
कलाकार : दिलजीत, तापसी पन्नू, अंगद बेदी, विजय राज, सतीश कौशिक
शैली : बायोपिक
यूजर रेटिंग :
0/5
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Soorma Movie Review: सूरमा मूवी रिव्यू - जरूर देखें, सच्ची और अच्छी बायोपिक कम ही देखने को मिलती हैं

सूरमा मूवी रिव्यू (Soorma Movie Review) - 'सूरमा' के कई सूरमा पर्दे के पीछे छिपे हुये हैं. पढ़िये किन वजहों से दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू स्टारर यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिये.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: July 13, 2018, 1:16 PM IST
Soorma Movie Review: सूरमा मूवी रिव्यू - जरूर देखें, सच्ची और अच्छी बायोपिक कम ही देखने को मिलती हैं
सूरमा मूवी रिव्यू (Soorma Movie Review) - 'सूरमा' के कई सूरमा पर्दे के पीछे छिपे हुये हैं. पढ़िये किन वजहों से दिलजीत दोसांझ, तापसी पन्नू स्टारर यह फिल्म आपको जरूर देखनी चाहिये.
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: July 13, 2018, 1:16 PM IST
'सूरमा' हॉकी खिलाड़ी और पूर्व हॉकी कप्तान संदीप सिंह की कहानी है. संदीप सिंह के बारे में आप गूगल कर जितनी जानकारी जुटा पायेंगे फिल्म में वे सभी जानकारियां हैं. हाल ही में आई संजय दत्त की बायोपिक 'संजू' से लोगों को यह शिकायत रही थी कि उन्हें जो संजय दत्त के बारे में पढ़ने को मिला है, 'संजू' से ज्यादातर गायब है. उनकी समस्या का निदान 'सूरमा' अपनी सच्चाई से कर देती है. दो नई बातें उनके परिवार की आर्थिक स्थिति और प्रेम संबंधों को लेकर उजागर होती है. जिन्हें फिल्म में खूबसूरती से बिना किसी अतिश्योक्ति के पिरोया गया है.

संदीप सिंह के जीवन का सबसे कठिन और प्रेरणादायक पहलू उनका शताब्दी एक्सप्रेस में गोली लगने और लगभग आधे शरीर में लकवा मार जाने के बाद उससे उबरकर दोबारा हॉकी खेलना रहा है. सूरमा में शाद अली ने बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के इस घटना को दिखाया है. जो उनकी फिल्म को मैच्योर बनाने वाली बात है. संदीप सिंह न ही अपनी मोहब्बत के चलते अचानक व्हीलचेयर से उठ खड़े होते हैं और न ही मोहब्बत के चलते अचानक फिल्म में गोल करते हैं. यह बात फिल्म को रियलिस्टिक बनाती है और एक स्पोर्ट्समैन के दिल-ओ-दिमाग में झांकने का स्पेस दर्शकों को देती है.

स्पोर्ट्स से जुड़ी फिल्मों में, खासकर उनमें जिनमें खिलाड़ी किसी अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म पर देश का प्रतिनिधित्व कर रहा हो, देशभक्ति का तड़का देना एक नॉर्म रहा है. पर शाद अली जो फिल्म लेखक और निर्देशक दोनों हैं बिना 'भारत के लिये - देश के लिये' की क्लीशे लाइन घिसे देशभक्ति और एक खिलाड़ी का देश के प्रति कमिटमेंट फिल्म में पिरोया है. इन्हें डायलॉग के जरिये नहीं बल्कि सीन के जरिये दिखाया गया है. इससे शाद अली कई महान डायरेक्टरों की कही इस बात को भी साबित करते हैं कि सिनेमा एक विजुअल मीडियम है और इसमें डायलॉग्स का महत्व बहुत ज्यादा नहीं होता.

फिल्म के सभी किरदारों ने इतना मंझा अभिनय किया है कि 131 मिनट की फिल्म में कहीं ऊब नहीं होती. वैसे निस्संदेह इसका काफी श्रेय निर्देशक शाद अली और एडिटर फारुख हुंडेकर को भी जायेगा. जिनकी एडिटर के तौर पर यह पहली बेहतरीन फिल्म होगी. इससे पहले उन्होंने दो फिल्में एडिट की हैं, जिनपर दर्शकों का ध्यान ही नहीं गया है. फिल्म की कास्टिंग मुकेश छाबड़ा ने की है. पिछले कुछ सालों में हर दूसरी अच्छी फिल्म में मुकेश छाबड़ा का नाम सुनने को आता है. खुद मशहूर डायरेक्टर अनुराग कश्यप कई मंचों से उनका नाम ले चुके हैं. मात्र 38 साल के मुकेश अब जीनियस लगने लगे हैं.



एक्टिंग की बात करें तो दिलजीत दोसांझ तो संदीप सिंह के किरदार में दिल जीतते ही हैं. उन्होंने किरदार के लिये हॉकी खेलकर और कसरत करके जो शरीर बनाया है दर्शकों को पसंद आता है. तापसी पन्नू भी अच्छा करती हैं. उन्होंने अपने पिछले कई किरदारों से खुद को साबित किया है. हालांकि जुड़वा 2 का उनका किरदार चौंकाने वाला था. लेकिन यह उनकी अपनी च्वाइस है. दो दिन पहले ही एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा था कि वे जेनिफर लॉरेंस जैसा करियर चाहती हैं. संदीप सिंह के भाई विक्रम के किरदार में अंगद बेदी चमकते हैं. कुलभूषण खरबंदा, सतीश कौशिक और विजय राज फिल्म में हैं तो जाहिर है कि एक्टिंग का स्तर वैसे ही बढ़ ही जाना था. खासकर अपनी हर फिल्म की तरह ही विजय राज और उनके डायलॉग दर्शकों को फिल्म देखकर निकलने के बाद भी याद आते रहते हैं.

अक्सर भारतीय कॉमर्शियल फिल्मों में देखा जाता है कि चाहे मदुरै की कहानी हो, पटियाला की या लखनऊ की, सारे शहर एक से ही दिखते हैं पर सूरमा में ऐसा नहीं है. कॉस्ट्यूम हो, आर्ट डायरेक्शन हो या सिनेमैटोग्राफी; 'सूरमा' हर क्षेत्र में सूरमा साबित हुई है. हरियाणा का शाहाबाद और पंजाब का पटियाला बेहद रियल लगते हैं. पर रियल होने के बावजूद भी सीन में खूबसूरती कम नहीं होती, बढ़ जाती है. दर्शक फिल्म से, उसके किरदारों से कनेक्ट करता है. उसे संदीप सिंह के नया घर छोड़कर बिना प्लास्टर के पुराने घर वापस जाने पर दुख होता है. फिल्म के सिनेमैटोग्राफर चितरंजन दास काफी फिल्में कर चुके हैं पर निस्संदेह 'सूरमा' उनके करियर में एक मील का पत्थर बनेगी.

फिल्म का म्यूजिक दिया है शंकर-एहसान-लॉय ने और गीत लिखे हैं गुलजार ने. जिन्होंने इस टीम के पिछले काम को फॉलो किया है वे समझ ही गये होंगे कि फिल्म का म्यूजिक और गीत कैसे होंगे. माने फिल्म देखने के बाद आप कम से कम इसके गाने 'इश्क दी बाजियां...' को लूप में जरूर सुनना चाहेंगे.



अंत में बस इतना ही कि सूरमा के असली सूरमा दिलजीत के अलावा फिल्म में स्क्रीन के पीछे काम कर रही टीम भी है. शाद अली हैं जो 'साथिया' (2002) और 'बंटी और बबली' (2005) के बाद एक-एक के बाद एक कई फ्लॉप दे चुके थे, 'सूरमा' बनाकर उन्होंने फिल्म के एंथम 'पीछे मेरे अंधेरा, आगे अंधी आंधी है, मैंने ऐसी आंधी में दिया जलाया है...' को अपने डायरेक्शन से सफल कर दिया है. आशा है उनका जलाया यह दिया आगे उनके लिये सूरज बनकर चमकेगा. फिल्म जरूर देखी जानी चाहिये. इसलिये वक्त निकालिये और हॉकी के जांबाज खिलाड़ी पर बनी बायोपिक देखने जाइये. कई सालों बाद कोई सच्ची बायोपिक फिल्म आई है.

यह भी पढ़ें : 'सूरमा' देखकर बोले सचिन तेंदुलकर- संदीप सिंह के बारे में मुझे भी नहीं पता था!

डिटेल्ड रेटिंग

कहानी :
3.5/5
स्क्रिनप्ल :
4/5
डायरेक्शन :
4.5/5
संगीत :
4/5
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